यूनुस के राज में बांग्लादेश में कट्टरपंथियों को कानून का कोई खौफ नहीं है. हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों के बीच देश लौटे खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान को पहले ही दिन जान से मारने की धमकी दे दी गई है.
ढाका: बांग्लादेश में हालात यूनुस के कंट्रोल से इस कदर बाहर हो चुके हैं कि एक और हिंदू युवक को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला है. दीपू दास के बाद अब अमृत मंडल की मॉब लिंचिंग ने पूरे देश को हिला दिया है. ऐसे में माहौल में खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे हैं और अपने वतन लौटते ही उन्होंने राजनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है.
तारिक की पहली रैली में भीड़ देखकर जमात-ए-इस्लामी संगठन ने उन्हें पहले ही दिन ‘मौत’ की धमकी दे डाली है. इस पार्टी से जुड़े एक शख्स ने तारिक का भारत कनेक्शन खोड़ निकाला है. तारिक रहमान को खुलेआम जान से मारने की धमकी ये कारनामा है जमात-ए-इस्लामी संगठन से जुड़े वकील बैरिस्टर शाहरियार कबीर का, जिन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान तारिक रहमान को पहले ही दिन खुलेआम जान से मारने की धमकी दे डाली है. उन्होंने वीडियो में कहा कि ‘तारिक रहमान भारत की शर्तें मानकर आए हैं और वो अपने पिता के साथ विश्वासघात कर रहे हैं. उन्हें भारत का साथ नहीं देना चाहिए, अगर आप भारत के साथ कोई डील करके आए हैं तो आपकी मौत करीब है’. शाहरियार ने बिना किसी सबूत के दावा कर डाला है कि तारिक की भारत के साथ कोई डील हुई है और इसके आधार पर वो तारिक को जान से मारने की धमकी तक दे रहे हैं. उन्होंने कहा है कि ‘मुझे लगता है कि आपने कभी मौत का दर्द महसूस नहीं किया है’. जमात-ए-इस्लामी के नेता की बे सिर-पैर की बातें ऊल-जलूल बातें करते हुए शाहरियार ने कहा कि ‘तलपत्ती द्वीप देने से मना करने पर आपके पिता की हत्या कर दी गई थी’. बता दें कि बांग्लादेश के कट्टरपंथी उनकी हत्या से भारत को जोड़ते हैं लेकिन असलियत में तारिक रहमान के पिता की मौत उनकी मौत सर्किट हाउस में अपनी ही सेना के हाथों हुई थी. फिर शाहरियार एक और कट्टरपंथी थ्योरी लेकर बकवास करने लगे. उनका दावा है कि तारिक के पिता फरक्का बैराज समझौते का विरोध कर रहे थे और मां ने इसे रद्द करने के लिए संयुक्त राष्ट्र से मदद मांगी थी, जिसके बाद उन्हें देश से निकाल दिया गया था. क्या थी असलियत? हालांकि, भारत और बांग्लादेश के बीच हुए फरक्का बैराज समझौते असलियत कुछ और ही है. असल में 1960 के दशक में हुगली नदी में गाद जमने लगी थी, जिससे जहाजों का आना-आना बंद हो रहा था. भारत ने कोलकाता बंदरगाह को बचाने के लिए गंगा के पानी को हुगली की तरफ मोड़ने के मकसद से यह बैराज बनाया लेकिन बांग्लादेश को डर था कि सूखा पड़ने पर भारत सारा पानी रोक लेगा और उनका देश प्यासा मर जाएगा. सालों के तनाव के बाद, 12 दिसंबर 1996 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच 30 साल का एक जल बंटवारा समझौता हुआ. इसमें तय किया गया कि सूखे के दिनों में गंगा का पानी किस अनुपात में दोनों देशों को मिलेगा. यानी दोनों देशों में से किसी को कोई नुकसान नहीं हुआ था.
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