इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2025 मुंबई में एक्टिविस्ट योगेन्द्र यादव ने कहा कि बिहार में चल रहा SIR एक ऐसी दवा है जिसे बीमारी की तलाश है, ये एक ऐसी दवा है जो बीमारी से भी बदतर साबित होने जा रही है. वहीं वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि SIR पूरे देश में होना चाहिए और हर पांच साल पर होना चाहिए.
सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव ने शुक्रवार को भारत के चुनाव आयोग द्वारा बिहार की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की तुलना नोटबंदी से करते हुए कहा कि यह "बीमारी की तलाश में एक दवा है, एक ऐसी दवा जो बीमारी से भी बदतर साबित होती है.
" योगेन्द्र यादव ने कहा कि बिहार के 7.24 करोड़ वोटर्स में 215 नाम ही ऐसे हैं जो विदेशी हैं और मुस्लिम भी हैं. योगेन्द्र यादव ने इस बात को माना कि भारत में वोटर लिस्ट में गलतियां है और उसे ठीक करने की जरूरत है, चुनाव आयोग को अधिकार है और उसका कर्तव्य है कि वो इसकी गुणवत्ता को ठीक करे. लेकिन उन्होंने कहा कि ये विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान ठीक नोटबंदी की तरह है, ये एक ऐसी दवा है जिसे बीमारी की तलाश है, ये एक ऐसी दवा है जो बीमारी से भी बदतर साबित होने जा रही है.इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2025 मुंबई में शिरकत करते हुए योगेन्द्र यादव ने कहा कि लोगों को इस बात को समझने की जरूरत है कि लंबे समय में यह इस प्रक्रिया को ही बदल देगा कि इस देश में मतदान के अधिकार का फैसला कैसे किया जाएगा. ये बिहार के वोटर लिस्ट का रिवीजन नहीं है. ये जिन नियमों के आधार पर वोटिंग का अधिकार दिया जाएगा उसी को रिसेट करने यानी की बदलने की कोशिश है. Advertisement सुप्रीम कोर्ट में SIR की प्रक्रिया को चुनौती दे रहे योगेन्द्र यादव ने कहा कि वोटर लिस्ट को रिफाइन करने से किसी को दिक्कत नहीं है. लेकिन SIR ये नहीं है. SIR उस प्रक्रिया को ही बदलने वाला है जिससे यह तय होगा कि इस देश में मतदान कौन करेगा.उन्होंने कहा कि SIR की प्रक्रिया के जरिये तीन मौलिक बदलाव किए गए हैं जो इस देश में कभी नहीं हुआ है. पहला- वोटर लिस्ट में रहने की जिम्मेदारी स्टेट से हटाकर वोटर पर मढ़ दिया गया है. दूसरा- सभी मतदाताओं को दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए कहा गया है और ये माना गया है कि सरकार को ये पता नहीं है कि वो भारत का नागरिक है या नहीं और तीसरा- वो 12 दस्तावेज जिन्हें चुनाव आयोग पहले स्वीकार करता था अब इनकी संख्या 11 कर दी गई है. हर पांच साल में हो SIRकार्यक्रम के दौरान योगेन्द्र यादव के दावे का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और SIR का समर्थन कर रहे अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया पूरे देश के लिए जरूरी है और इसे पांच साल के नियमित अंतराल पर किया जाना चाहिए. अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि कोई भी व्यक्ति भारत में मतदान कर सके इसके लिए तीन शर्तें जरूरी है- व्यक्ति का भारत का नागरिक होना चाहिए, 18 साल की उम्र पूरी होनी चाहिए और जहां से वो व्यक्ति वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाना चाहता है उसका उसी इलाके में निवास होना चाहिए. Advertisement आधार के जरिये वोटर लिस्ट में शामिल होने के फैसले को गलत ठहराते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि आधार कार्ड में साफ लिखा रहता है कि आधार न तो नागरिकता का प्रमाण है, न निवास का प्रमाण है और न ही उम्र का प्रमाण है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में लगभग 30 PIL फाइल हुए हैं जिनमें कहा गया है कि यही नागरिकता का प्रमाण है, निवास का प्रमाण है और यही उम्र का भी प्रमाण है. उन्होंने कहा कि आधार को वोटर बनने के लिए प्रमाणित दस्तावेजों में शामिल करना सुप्रीम कोर्ट का अस्थायी फैसला है और जब 7 अक्तूबर को इस मामले सुप्रीम कोर्ट का आखिरी फैसला आएगा तो आधार को इस लिस्ट 12 दस्तावेजों की लिस्ट से बाहर कर दिया जाएगा.बता दें कि बिहार SIR के बाद मतदाता सूची की आखिरी लिस्ट 30 सितंबर को जारी होगी. जबकि सुप्रीम कोर्ट इस प्रक्रिया की वैधता पर अंतिम फैसला 7 अक्तूबर को सुनाएगा.अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि बिहार में जिन 65 लाख लोगों का नाम वोटर लिस्ट से कटा है उनमें से 6.5 हजार लोगों ने ही अपनी नागरिकता के प्रमाण पत्र जमा किए हैं. अगर उनके पास दस्तावेज है तो वे जमा क्यों नहीं कर रहे हैं? Advertisement वहीं इस मुद्दे पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा कि आमतौर पर नागरिकता साबित करने का भार चुनाव आयोग जनता पर नहीं छोड़ता है, चुनाव आयोग की मशीनरी यह स्वयं तय कर लेती है कि वोट देने योग्य सभी व्यक्तियों का नाम वोटर लिस्ट में आ जाए. उन्होंने कहा कि चुनाव से ठीक पहले इस तरह का गहन परीक्षण नहीं किया गया था. उन्होंने कहा कि अच्छी बात यह है कि आंकड़ों की तुलना करके किसी भी गड़बड़ी का पता लगाया जा सकता है.215 विदेशी मुस्लिम ही मिले चर्चा को आगे बढ़ाते हुए योगेन्द्र यादव ने कहा कि बिहार में कौन सी पार्टी बांग्लादेशी और रोहिंग्या के मुद्दे को सबसे ज्यादा उठा रही है. ये बीजेपी है. लेकिन बीजेपी ने इसे लेकर कितनी आपत्तियां जताई है- जीरो. बिहार में अबतक विदेशी वोटरों से जुड़े 987 आपत्तियां ही फाइल की गई हैं. बिहार में 7 करोड़ 24 लाख मतदाताओं में 987 शिकायतें ही विदेशी वोटरों के होने से जुड़ी हैं. योगेन्द्र यादव ने आगे कहा कि इनमें से कितने संभावित रूप से रोहिंग्या और बांग्लादेशी हो सकते हैं, क्योंकि इन्हें तो मुस्लिम होने चाहिए. तो ऐसे मात्र 215 मुस्लिम नाम हैं. इसलिए बिहार राज्य में जहां 7 करोड़ 24 लाख मतदाता हैं वहां 215 नाम ही ऐसे हैं जो मुस्लिम हैं और विदेशी हैं. Advertisement पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा कि चुनाव आयोग को पारदर्शी होना चाहिए और उसे सभी के सवालों का जवाब देना चाहिए.---- समाप्त ---- ये भी देखें
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