विधायक अलका लांबा की शॉपिंग लिस्ट में नेपाल के चौकीदार हैं. एक फ़्लाइट अटेंडेंट नेपाल जाने वाली फ़्लाइट को घरेलू उड़ान बताता है. क्या नेपाल के बारे में भारतीयों को नज़रिया बदलने की ज़रूरत है?
नेपाल एक स्वतंत्र देश है जहाँ का अलग संविधान, अलग प्रधानमंत्री, अलग संसद और अलग सेना है. पर एक स्वतंत्र देश से दूसरे स्वतंत्र देश के बीच आ रही फ़्लाइट को जैसे वो फ़्लाइट अटेंडेंट घरेलू उड़ान मानकर चल रहा था उसी तरह आम आदमी की पार्टी की विधायक अलका लांबा को भी लगता है कि"चौकीदार तो हम नेपाल से मँगा लेंगे.
" नेपाल के त्रिभुवन हवाई अड्डे में तैनात वो नेपाली इमिग्रेशन अफ़सर शायद ऐसे कई भारतीयों से मिलता रहा होगा जिसने मुझ पर कटाक्ष किया --"तपाईँ को मुलुक ठुलो, र तपाईँ को जुंगापनि ठुलो" यानी तुम्हारा देश भी बहुत बड़ा है और तुम्हारी मूछें यानी अहम भी बहुत बड़ा है. फ़्लाइट में कई घंटे की देरी होने पर मैं उस अफ़सर से शिकायत करना चाह रहा था पर वो अधिकारी भरा बैठा था. नेपालियों को वाक़ई लगता है कि भारत बड़ा मुल्क है इसलिए भारतीयों का अहम भी बहुत बड़ा है. कई बार भारतीयों को ये एहसास ही नहीं होता कि नेपाल के बारे में जो कुछ कह या सोच रहे हैं वो नेपाल के लोगों को पसंद नहीं आता. उनका मासूम सवाल होता है कि हम तो नेपाल को अपना मानते हैं फिर क्या समस्या है?नेपाल की बिपाशी तुलाधार पेशे से पायलट हैं और साथ ही पेशेवर वेटलिफ्टर हैं काठमांडू पहुँचने के तुरंत बाद मैंने भी ऐसी ही उत्तर भारतीय नादानी में नेपाली साथियों से कहा - नेपाल बिल्कुल घर जैसा लगता है. बिना एक पल गँवाए बातचीत में शामिल एक नेपाली साथी ने तुरंत कहा -"हाँ, आपके प्रधानमंत्री मोदी जी भी ऐसा ही कहते हैं." मुझे तुरंत समझ में आ गया कि प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की पहली यात्रा के दौरान जो नेपाली नागरिक मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए सड़कों पर उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े थे वो आज क्यों मोदी का ज़िक्र आते ही सवालों की झड़ी क्यों लगा देते हैं. इस तरह के वाक्यों से नेपाल के लोगों को लगता है कि भारतीय लोग नेपाल के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते, बल्कि उसे अपनी छत्रछाया में रखना चाहते हैं. धुर आज़ाद ख़याल नेपालियों को भारतीयों की ऐसी मोहब्बत क़तई पसंद नहीं आती. बल्कि इसमें उन्हें 'सांस्कृतिक विस्तारवाद' की बू आती है.तीन महीने तक काठमांडू में रहकर काम करने और नेपाल के कई शहरों और गाँवों में घूमने के बाद मुझे एक बार नहीं कई बार ऐसे सवालों का सामना करना पड़ा. बसों में, दुकानों में, होटलों में, सड़क पर बातचीत करते लोगों ने मुझसे बार बार एक ही सवाल किया - मोदी जी ने हमें ख़ून के आँसू रुला दिए, मगर क्यों? नेपाल के लोग, ख़ास तौर पर पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले लोग 2015 के उन दिनों तो भूले नहीं हैं जब नरेंद्र मोदी सरकार ने नेपाल की 'अघोषित आर्थिक नाकेबंदी' कर दी थी और लोग पेट्रोल, डीज़ल, गैस जैसी चीज़ों के मोहताज हो गए थे. कई लोग अपनी कारों और मोटरसाइकिलों को ताला लगातर साइकिल ख़रीदने पर मजबूर हो गए थे. पर नेपाल की नाकेबंदी कोई पहली बार नहीं हुई थी राजीव गाँधी जब प्रधानमंत्री थे तब भी भारत ने नेपाल का घेराव किया था. काठमांडू से कुछ दूर चितलांग गाँव में पोखरा से अपने छात्र-छात्राओं के साथ आए एक अध्यापक ने मुझसे पूछा - नाकेबंदी करके क्या मोदी जी हमें जानबूझ कर चीन की ओर नहीं धकेल रहे हैं? मैं क्या जवाब देता.(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप
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