नजरिया: हिमालय में बढ़ रहा भूस्खलन का खतरा, जनजीवन अस्त-व्यस्त

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नजरिया: हिमालय में बढ़ रहा भूस्खलन का खतरा, जनजीवन अस्त-व्यस्त
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उत्तराखंड में बारिश के कारण पहाड़ दरक रहे हैं जिससे चार धाम यात्रा बाधित हो रही है और जोशीमठ जैसे शहरों पर खतरा मंडरा रहा है। भूस्खलन संभावित क्षेत्रों में विकास कार्य चिंता का विषय है। हर साल नए भूस्खलन जोन बन रहे हैं जिससे राज्य को भारी नुकसान हो रहा...

पंकज चतुर्वेदी। अभी तो बरसात शुरू हुई है, लेकिन उत्तराखंड में पहाड़ों के रौद्र रूप से वहां कई जगह जीवन थम गया। चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग आदि में बरसात के साथ पहाड़ लुढ़क रहे हैं। चार धाम यात्रा का मार्ग बार-बार पत्थर-पहाड़ गिरने से बाधित हो रहा है। जोशीमठ जैसे कस्बों पर धंसने का संकट नए सिरे से खड़ा हो गया है। सरकार की चिंता है कि भू विज्ञानियों ने जो इलाके नए भूस्खलन संभावित क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किए हैं, वहां सड़क, बिजली, रेल जैसी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। चारधाम यात्रा रूट पर भूस्खलन जोन सिरदर्द बनते जा रहे हैं। ऋषिकेश से बदरीनाथ यात्रा रूट पर कुल 54 लैंडस्लाइड जोन हैं। यहां कई बार भूस्खलन की घटनाएं हो चुकी हैं। बेहतर सड़कों, सुविधाओं के कारण यहां भीड़ आ रही है, जो और बढ़ती रहेगी। उत्तराखंड जैसी स्थिति हिमाचल प्रदेश की भी है। हाल में मंडी में भूस्खलन की खौफनाक घटनाएं सामने आईं। एक तरफ प्रधानमंत्री का ‘10 सूत्रीय डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ अर्थात आपदा में न्यूनतम जोखिम कार्यक्रम है तो दूसरी तरफ हिमालय की गोद में बसे पर्वतीय प्रदेशों में मूलभूत ढांचे का निर्माण है। उत्तराखंड की आबादी करीब सवा करोड़ है, लेकिन यहां तीर्थ और पर्यटन के लिए आने वालों की संख्या बहुत है। फिर यह चीन जैसे धूर्त और शत्रु देश से लगी सीमा का प्रांत है। ऐसे में बेहतर सड़क और यातायात तंत्र अनिवार्य है, लेकिन जब ऐसे विकास के कारण प्रकृति पर ही संकट खड़ा हो जाए तो पुनर्विचार करना ही होगा। इस बात को सरकार और समाज, दोनों को गंभीरता से लेना होगा कि जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक असर हिमालय पर्वत पर है और इसी के चलते उत्तराखंड विकट चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसी चुनौतियों से हिमाचल भी दो-चार होता दिख रहा है। संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र, अप्रत्याशित मौसम और बादल फटने, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट की बढ़ती घटनाएं उत्तराखंड को असुरक्षित बना रही है। बाढ़, भूस्खलन, अतिवृष्टि और वनाग्नि जैसी प्राकृतिक आपदाओं से राज्य को हर साल जन-धन की काफी हानि हो रही है। हर साल राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा आपदाओं से नष्ट संरचनाओं को दुरुस्त करने में ही व्यर्थ जाता है। यहां जुलाई, अगस्त और सितंबर में मानसून के कारण हुए नुकसान को लेकर एसडीसी फाउंडेशन ने उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में हर साल नए भूस्खलन जोन यानी लैंडस्लाइड जोन विकसित हो रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के डाटा के अनुसार 1988 से 2023 के बीच उत्तराखंड में भूस्खलन की 12,319 घटनाएं हुईं। 2018 में प्रदेश में भूस्खलन की 216 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2023 में यह संख्या पांच गुना बढ़कर 1,100 पहुंच गई। 2022 की तुलना में भी 2023 में करीब साढ़े चार गुना की वृद्धि भूस्खलन की घटनाओं में देखी गई है। पिछले साल अगस्त तक बरसात के दौरान भूस्खलन की 2,946 घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें कई लोग मारे गए थे। इस मानसून सीजन में 500 नए भूस्खलन जोन चिह्नित हुए हैं। उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग और विश्व बैंक के 2018 के एक अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड में 6,300 से अधिक स्थान भूस्खलन जोन के रूप में चिह्नित किए गए हैं। रिपोर्ट कहती है कि राज्य में चल रही हजारों करोड़ की विकास परियोजनाएं पहाड़ काट कर या जंगल उजाड़ कर बन रही हैं और इसी से भूस्खलन जोन की संख्या बढ़ रही है। भूस्खलन का प्रभाव क्षेत्र बढ़ने का एक बड़ा कारण इंडियन प्लेट्स का लगातार गतिमान होना है। इस हलचल से चट्टानों में मौजूद दरारें भी सक्रिय हो जाती हैं। बरसात में मिट्टी की पकड़ ढीली होने पर यह भूवैज्ञानिक गतिविधि और तेज हो जाती है। उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पर्वतीय इलाकों में हरियाली कम होने से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो रही है, ऊपर से मौसमी बदलाव के चलते अचानक अधिक बरसात होने और फिर तत्काल बाद तेज धूप आने से भूस्खलन की प्रक्रिया को बल मिलता है। बिना भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण वाली परियोजनाओं के लिए हो रही तोड़फोड़ हिम-पर्वत के अनुकूल नहीं। जिस परियोजना के लिए सिलक्यारा सुरंग बनाई जा रही, उसके पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की अनिवार्यता से बचने के लिए उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में दिखाया गया। हिमालय में भूगर्भीय उठापटक चलती रहती है। यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यह जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है। जब पहाड़ों पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैं और जब उनके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ होती है तो दिल्ली तक भूकंप की आशंका तो बढ़ती ही है, यमुना में कम पानी का संकट भी खड़ा होता है। पहले उत्तराखंड में भूस्खलन की तीन चौथाई घटनाएं बरसात के कारण होती थीं, लेकिन अब बरसात के बाद भी यह आपदा नहीं रुक रही। पिछले साल सर्दियों और इस साल गर्मी में भी कई बड़े भूस्खलन हुए। ऐसे में विकास में पर्यावरण संरक्षण, नैसर्गिक विकास और आस्था में सुख को त्यागने की भावना पैदा करने के लिए आमंत्रित भी कर रही है और चेता भी रही है। इस चेतावनी को हिमाचल समेत अन्य पर्वतीय इलाकों को भी ध्यान से सुनना चाहिए।.

पंकज चतुर्वेदी। अभी तो बरसात शुरू हुई है, लेकिन उत्तराखंड में पहाड़ों के रौद्र रूप से वहां कई जगह जीवन थम गया। चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी, रुद्रप्रयाग आदि में बरसात के साथ पहाड़ लुढ़क रहे हैं। चार धाम यात्रा का मार्ग बार-बार पत्थर-पहाड़ गिरने से बाधित हो रहा है। जोशीमठ जैसे कस्बों पर धंसने का संकट नए सिरे से खड़ा हो गया है। सरकार की चिंता है कि भू विज्ञानियों ने जो इलाके नए भूस्खलन संभावित क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किए हैं, वहां सड़क, बिजली, रेल जैसी परियोजनाओं पर काम चल रहा है। चारधाम यात्रा रूट पर भूस्खलन जोन सिरदर्द बनते जा रहे हैं। ऋषिकेश से बदरीनाथ यात्रा रूट पर कुल 54 लैंडस्लाइड जोन हैं। यहां कई बार भूस्खलन की घटनाएं हो चुकी हैं। बेहतर सड़कों, सुविधाओं के कारण यहां भीड़ आ रही है, जो और बढ़ती रहेगी। उत्तराखंड जैसी स्थिति हिमाचल प्रदेश की भी है। हाल में मंडी में भूस्खलन की खौफनाक घटनाएं सामने आईं। एक तरफ प्रधानमंत्री का ‘10 सूत्रीय डिजास्टर रिस्क रिडक्शन’ अर्थात आपदा में न्यूनतम जोखिम कार्यक्रम है तो दूसरी तरफ हिमालय की गोद में बसे पर्वतीय प्रदेशों में मूलभूत ढांचे का निर्माण है। उत्तराखंड की आबादी करीब सवा करोड़ है, लेकिन यहां तीर्थ और पर्यटन के लिए आने वालों की संख्या बहुत है। फिर यह चीन जैसे धूर्त और शत्रु देश से लगी सीमा का प्रांत है। ऐसे में बेहतर सड़क और यातायात तंत्र अनिवार्य है, लेकिन जब ऐसे विकास के कारण प्रकृति पर ही संकट खड़ा हो जाए तो पुनर्विचार करना ही होगा। इस बात को सरकार और समाज, दोनों को गंभीरता से लेना होगा कि जलवायु परिवर्तन का सर्वाधिक असर हिमालय पर्वत पर है और इसी के चलते उत्तराखंड विकट चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसी चुनौतियों से हिमाचल भी दो-चार होता दिख रहा है। संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र, अप्रत्याशित मौसम और बादल फटने, भूस्खलन, अचानक बाढ़ और ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट की बढ़ती घटनाएं उत्तराखंड को असुरक्षित बना रही है। बाढ़, भूस्खलन, अतिवृष्टि और वनाग्नि जैसी प्राकृतिक आपदाओं से राज्य को हर साल जन-धन की काफी हानि हो रही है। हर साल राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा आपदाओं से नष्ट संरचनाओं को दुरुस्त करने में ही व्यर्थ जाता है। यहां जुलाई, अगस्त और सितंबर में मानसून के कारण हुए नुकसान को लेकर एसडीसी फाउंडेशन ने उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में हर साल नए भूस्खलन जोन यानी लैंडस्लाइड जोन विकसित हो रहे हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के डाटा के अनुसार 1988 से 2023 के बीच उत्तराखंड में भूस्खलन की 12,319 घटनाएं हुईं। 2018 में प्रदेश में भूस्खलन की 216 घटनाएं हुई थीं, जबकि 2023 में यह संख्या पांच गुना बढ़कर 1,100 पहुंच गई। 2022 की तुलना में भी 2023 में करीब साढ़े चार गुना की वृद्धि भूस्खलन की घटनाओं में देखी गई है। पिछले साल अगस्त तक बरसात के दौरान भूस्खलन की 2,946 घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें कई लोग मारे गए थे। इस मानसून सीजन में 500 नए भूस्खलन जोन चिह्नित हुए हैं। उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग और विश्व बैंक के 2018 के एक अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड में 6,300 से अधिक स्थान भूस्खलन जोन के रूप में चिह्नित किए गए हैं। रिपोर्ट कहती है कि राज्य में चल रही हजारों करोड़ की विकास परियोजनाएं पहाड़ काट कर या जंगल उजाड़ कर बन रही हैं और इसी से भूस्खलन जोन की संख्या बढ़ रही है। भूस्खलन का प्रभाव क्षेत्र बढ़ने का एक बड़ा कारण इंडियन प्लेट्स का लगातार गतिमान होना है। इस हलचल से चट्टानों में मौजूद दरारें भी सक्रिय हो जाती हैं। बरसात में मिट्टी की पकड़ ढीली होने पर यह भूवैज्ञानिक गतिविधि और तेज हो जाती है। उत्तराखंड और हिमाचल जैसे पर्वतीय इलाकों में हरियाली कम होने से मिट्टी की पकड़ कमजोर हो रही है, ऊपर से मौसमी बदलाव के चलते अचानक अधिक बरसात होने और फिर तत्काल बाद तेज धूप आने से भूस्खलन की प्रक्रिया को बल मिलता है। बिना भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण वाली परियोजनाओं के लिए हो रही तोड़फोड़ हिम-पर्वत के अनुकूल नहीं। जिस परियोजना के लिए सिलक्यारा सुरंग बनाई जा रही, उसके पर्यावरणीय प्रभाव आकलन की अनिवार्यता से बचने के लिए उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में दिखाया गया। हिमालय में भूगर्भीय उठापटक चलती रहती है। यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। यह जानना जरूरी है कि हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है। जब पहाड़ों पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैं और जब उनके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ होती है तो दिल्ली तक भूकंप की आशंका तो बढ़ती ही है, यमुना में कम पानी का संकट भी खड़ा होता है। पहले उत्तराखंड में भूस्खलन की तीन चौथाई घटनाएं बरसात के कारण होती थीं, लेकिन अब बरसात के बाद भी यह आपदा नहीं रुक रही। पिछले साल सर्दियों और इस साल गर्मी में भी कई बड़े भूस्खलन हुए। ऐसे में विकास में पर्यावरण संरक्षण, नैसर्गिक विकास और आस्था में सुख को त्यागने की भावना पैदा करने के लिए आमंत्रित भी कर रही है और चेता भी रही है। इस चेतावनी को हिमाचल समेत अन्य पर्वतीय इलाकों को भी ध्यान से सुनना चाहिए।

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