इस बार बीजेपी के लिए आसान नहीं है गोरखपुर की राह!
गोरखपुर में वर्षों बाद इस बार सियासी लड़ाई बेहद दिलचस्प नजर आ रही है. आमतौर पर यहां पर सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ के कारण एक तरफा जीत हासिल करने वाली बीजेपी के लिए इस बार की लड़ाई बेहद कठिन मानी जा रही है.
1998 में पहली बार इस सीट पर जीत हासिल करने वाले योगी आदित्यनाथ के लिए ये लिए लड़ाई बेहद अहम है. योगी खुद तो मैदान में नहीं हैं लेकिन उनपर यहां पर बीजेपी की वापसी कराने की बड़ी जिम्मेदारी है. 21 साल पहले पहली बार चुनावी जंग में उतरे योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर में करीब 26 हजार वोटों से जीत मिली थी, लेकिन इसके बाद वो इस सीट पर मजबूत होते गए और हर बार जीत का अंतर बढ़ता गया.2017 में योगी के प्रदेश की कमान संभालने के बाद से गोरखपुर में बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ती गईं. इसका पहला नतीजा 2018 के उपचुनाव में मिला जब महागठबंधन ने यह सीट बीजेपी से छिनी. आमतौर पर यह सीट बीजेपी के लिए सुरक्षित रही है. 1998 से 2014 तक योगी आदित्यनाथ के इस सीट से चुनाव लड़ने के कारण बीजेपी यहां से अपनी जीत के प्रति आश्वस्त रही. हर चुनाव में लड़ाई बस इस बात की होती थी कि जीत का अंतर क्या होगा. लेकिन 2018 उपचुनाव के नतीजों के बाद से यहां पर माहौल एकदम अलग है. योगी आदित्यनाथ और बीजेपी उम्मीदवार रवि किशन शुक्ला जीत का दावा जरूर करते हैं, लेकिन असल में उन्हें भी ये पता है कि इस बार यहां की लड़ाई कठिन है. गोरखपुर की राजनीति को करीब से जानने वाले लोगों की मानें तो यहां पर इस बार बीजेपी की लड़ाई आसान नहीं है. इस बार कांटे का मुकाबला है. कौन जीतेगा ये कहना मुश्किल है. लड़ाई बराबरी की है. वहीं एक स्थानीय नेता भी ऐसी ही बातें कहते नजर आए. उनके मुताबिक यहां पर इस बार का चुनाव बेहद दिलचस्प है. हालांकि जीत बीजेपी की होगी, लेकिन वोटों का अंतर 10 से 20 हजार से ज्यादा का नहीं होगा. वहीं राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यहां पर लड़ाई 60-40 फीसदी की है. 60 फीसदी गठबंधन के पक्ष में तो 40 फीसदी बीजेपी के पक्ष में. 2018 के उपचुनाव में गठबंधन प्रत्याशी प्रवीण निषाद की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले निषाद वोटर्स इस बार भी गठबंधन प्रत्याशी रामभुआल निषाद के पक्ष में जाते दिख रहे हैं. माना जा रहा है 80 फीसदी निषाद वोटर्स गठबंधन को अपना वोट दे सकते हैं, वहीं 20 फीसदी बीजेपी के पक्ष में जा सकते हैं. 20 फीसदी भी बीजेपी के साथ जाने का कारण बीते दिनों निषाद नेताओं को अपने पाले में करना माना जा रहा है. बता दें कि हाल ही में गोरखपुर के मौजूदा सांसद प्रवीण निषाद बीजेपी में शामिल हुए. बीजेपी ने उनको संतकबीरनगर से टिकट दिया है. वहीं जमुना निषाद के बेटे अमरेंद्र निषाद को भी बीजेपी अपने पाले में करने में कामयाब हुई. हालांकि बाद में वह पार्टी से अलग हो गए और फिर से समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. प्रवीण निषाद के बीजेपी के साथ आने से निषादों में ये मैसेज गया कि हां, बीजेपी निषादों के लिए सोच रही है. ये वही 20 फीसदी वोटर्स हो सकते हैं जो बीजेपी को अपना वोट दे सकते हैं. बता दें कि गोरखपुर में निषाद समुदाय के लोग किसी भी उम्मीदवार की जीत में अहम भूमिका निभाते हैं. यहां पर करीब 3.5 लाख निषाद वोटर्स हैं. 2018 उपचुनाव में जीतने वाले प्रवीण निषाद रामभुआल निषाद के मुकाबले बहुत बड़ा चेहरा नहीं थे. प्रवीण निषाद के मुकाबले रामभुआल निषादों के बड़े नेता माने जाते हैं, और पूर्व की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. ऐसे में रामभुआल के नाम का फायदा गठबंधन को जरूर मिलेगा.उपचुनाव की तरह इस बार भी बीजेपी ने यहां से ब्राह्मण चेहरे को उतारा है. 2018 में जहां बीजेपी ने उपेंद्र दत्त शुक्ला को टिकट दिया तो इस बार रवि किशन शुक्ला मैदान में हैं. आमतौर पर अगड़ी जाति को बीजेपी का ही वोटबैंक माना जाता है. और माना जा रहा है कि इस बार भी वे बीजेपी के ही साथ जाएंगे. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक रवि किशन को योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के नाम पर वोट मिलेगा. ऐसा नहीं है कि रवि किशन शुक्ला के नाम पर ब्राह्मण वोटर्स उनके पास जाएंगे. ना ही उनके स्टारडम से उनको फायदा मिलेगा, क्योंकि रवि किशन भोजपुरी फिल्मों के अभिनेता हैं. और अपरकास्ट भोजपुरी में ज्यादा रूचि नहीं रखता है. वहीं कांग्रेस ने भी यहां से ब्राह्मण चेहरे को उतारकर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ाई हैं. माना जा रहा है कि कांग्रेस के मधुसूदन त्रिपाठी यहां पर बीजेपी का ब्राह्मण वोट काट सकते हैं. रवि किशन के मुकाबले मधुसूदन त्रिपाठी गोरखपुर में ब्राह्मणों के बीच अच्छी खासी पहचान रखते हैं. वो गोरखपुर में कई वर्षों से वकालत कर रहे हैं. वह गोरखपुर के एक बड़े ब्राह्मण नेता का कानून से जुड़ा मामला भी देखते हैं. ऐसे में उनको जो भी वोट मिलेगा वो बीजेपी का ही ब्राह्मण वोट मिलेगा.योगी आदित्यनाथ अपने गढ़ में बीजेपी की वापसी कराने के लिए जमकर प्रचार कर रहे हैं. वो यहां पर कई सभाएं कर रहे हैं. वो किसी भी हाल में यहां से बीजेपी को हारते हुए नहीं देखना चाहते हैं. रवि किशन के लिए योगी के प्रचार से जनता में ये संदेश देने की भी कोशिश जा रही है कि प्रदेश के मुखिया बीजेपी के उम्मीदवार के साथ खड़े हैं, क्योंकि गोरखपुर में बीजेपी से ज्यादा योगी का बोलबाला रहा है. इस क्षेत्र में योगी का कद बीजेपी से बड़ा है. इसका नतीजा 2002 के विधानसभा चुनाव में देखा जा चुका है, जब उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी शिव प्रताप शुक्ला के मुकाबले निर्दलीय उम्मीदवार डॉ.राधा मोहन दास अग्रवाल का समर्थन किया था. योगी के समर्थन से ही राधामोहन दास अग्रवाल को चुनाव में जीत मिली थी. हालांकि बाद में राधामोहन दास अग्रवाल बीजेपी में शामिल हो गए थे. ऐसे में ये साफ है कि जब तक गोरखपुर के लोगों को इस बात का अहसास नहीं होगा कि रवि किशन योगी आदित्यनाथ के ही उम्मीदवार हैं तब तक उनको चुनावी जीत हासिल करना मुश्किल होगा.
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