ट्रंप के 'धोखे' से पहले लंदन की सड़कों पर उमड़ी 'खून की प्यासी' भीड़ से भारतीय प्रवासियों को क्यों चिंतित होना चाहिए?

Anti-Immigrant Rally In London News

ट्रंप के 'धोखे' से पहले लंदन की सड़कों पर उमड़ी 'खून की प्यासी' भीड़ से भारतीय प्रवासियों को क्यों चिंतित होना चाहिए?
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अमेरिका का वीजा संकट नया है। भारतीय प्रवासियों से नफरत की आग यूरोप से लग चुकी है। लंदन की सड़कों उमड़ा जन-सैलाब भारतीय प्रवासियों के लिए खतरनाक सिग्नल है। पश्चिम में जिस तरह से दक्षिणपंथी ताकतें बढ़ रही है, प्रवासियों के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है।

नई दिल्लीः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दोस्त बताने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने समर्थकों के दवाब में एच 1-बी वीजा पर भारतीयों को झटका दिया है। अमेरिकियों को नौकरियों में प्राथमिकता देने के सवाल पर ट्रंप ने वीजा वाला दांव खेला है, जिससे सबसे अधिक भारतीय प्रभावित हुए हैं। लेकिन इससे पहले ही नौकरियों को लेकर असुरक्षा की आग का धुआं लंदन में दिख चुका है। लंदन की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब चिंताजनक?पिछले वीकेंड लंदन के बीचों-बीच प्रवासी विरोधी एक बड़ी रैली में गूंजे नारे, 'उन्होंने हमारी नौकरियां छीन लीं' और 'हमें अपना देश वापस चाहिए', सिर्फ प्रवासियों पर निशाना नहीं थे। ब्रिटेन की आप्रवासी आबादी, खासकर भारतीय मूल के समुदाय के लिए, यह एक खतरनाक बात याद दिलाने जैसा है कि इस देश में उनकी जगह कभी भी पूरी तरह पक्की नहीं मानी जाती। इतिहास गवाह है कि चाहे अल्पसंख्यक समुदाय कितना भी सफल और कर्मठ क्यों न हो जाए, जब आक्रमकता और राजनीति का मेल होता है, तो उनकी नागरिकता भी सवालों के घेरे में आ सकती है।सफलता कभी भी सुरक्षा की गारंटी नहींलंदन में सीनियर इंडियन जर्नलिस्ट सईद जुबैर अहमद एनडीटीवी पर लिखते हैं, ब्रिटेन में भारतीय समुदाय गहराई से रचा-बसा है। तीसरी पीढ़ी राजनीति, कारोबार, डॉक्टर-लॉ और संस्कृति तक में सफल है। देश को एक प्रधानमंत्री भी भारतीय मूल से मिला है। लेकिन इतिहास बताता है कि सफलता कभी भी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। 1972 में युगांडा के भारतीयों को रातों-रात देश से निकाल दिया गया था। इंडोनेशिया में 1998 के दंगों में चीनी मूल के नागरिकों को, पीढ़ियों से वहीं रहने के बावजूद, निशाना बनाया गया। फ्रांस में उत्तर अफ्रीकी और मुस्लिम समुदाय आज भी भेदभाव का शिकार हैं। खुद ब्रिटेन में ‘विंडरश कांड’ में कैरिबियाई परिवारों को नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया, जबकि वे दशकों से यहां रह रहे थे।आखिर ब्रिटिश नागरिक डरे हुए क्यों हैं?आज भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिकों को भी यही डर सता रहा है। वे चाहे कितने भी सफल क्यों न हों, नस्लवादी हमलों से अछूते नहीं हैं। 1.

5 लाख लोगों की भागीदारी वाली ‘यूनाइट द किंगडम’ रैली से पता चलता है कि माहौल कितना गंभीर है। यह कोई हाशिये का आंदोलन नहीं, बल्कि मुख्यधारा की नाराजगी का प्रदर्शन था। इसमें आम लोग भी बड़ी संख्या में शामिल थे। ऐसे माहौल में कोई भी नागरिकता प्रमाणपत्र या परिवार का इतिहास आपको बचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस रैली की तस्वीरें बहुत कुछ बयां कर रही थीं। लोगों ने कंधों पर झंडे ओढ़ रखे थे, पोस्टर पर प्रवासियों के खिलाफ नारे लिखे थे और भीड़ बार-बार चिल्ला रही थी कि ब्रिटेन उनसे छिन गया है। इस भीड़ में सिर्फ स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के दक्षिणपंथी नेता भी मौजूद थे। एलन मस्क ने बड़े स्क्रीन पर जुड़कर कहा कि 'हिंसा भड़कने वाला है, या तो लड़ो या मरो।' उनकी बातें खतरनाक थीं, लेकिन भीड़ को और भड़काने का काम किया।यूरोप में दक्षिणपंथी ताकतों का उभारजुबैर अहमद बताते हैं कि यह प्रवृत्ति सिर्फ ब्रिटेन तक सीमित नहीं है। पूरे यूरोप में दक्षिणपंथी ताकतें उभर रही हैं। जर्मनी में AfD, फ्रांस में मैरीन ले पेन, इटली में जॉर्जिया मेलोनी और नीदरलैंड्स में गीर्ट विल्डर्स। स्कैंडिनेविया जैसे क्षेत्र भी अब दक्षिणपंथ की ओर झुक रहे हैं। ब्रिटेन को लगता था कि ब्रेक्सिट के साथ यह दौर गुजर गया, लेकिन लंदन की रैली बताती है कि लहर अभी खत्म नहीं हुई। स्टारमर के लिए बड़ी गंभीर चुनौतीप्रधानमंत्री कीर स्टारमर के लिए यह गंभीर चुनौती है। उनकी सरकार अभी नया ही है, लेकिन उन पर पहले से ही ‘जनता से कटे हुए अभिजात वर्ग’ का ठप्पा लगने लगा है। उनकी सावधानी भरी राजनीति ने कंजरवेटिव हमलों को तो रोका, लेकिन लोगों की नाराजगी को कोई जवाब नहीं दिया। इसी खालीपन को भरने के लिए नाइजेल फराज और टॉमी रॉबिन्सन जैसे नेता सामने आ रहे हैं। असल समस्या आप्रवासन है। जनता इसे आर्थिक संकट, नौकरियों की कमी और सामाजिक दबाव से जोड़ रही है। कई कस्बों में स्थानीय लोग शिकायत करते हैं कि पूरे-के-पूरे होटल शरणार्थियों के लिए लिए जा रहे हैं। सरकार की 'स्टॉप द बोट्स' वाली योजनाएं कामयाब नहीं हो रहीं। इस लिहाज से 'उन्होंने हमारी नौकरियां छीन लीं' जैसे नारे लोगों को आसानी से प्रभावित करते हैं।चिंताओं को नजरअंदाज़ नहीं कर सकतेस्टारमर के सामने कठिन रास्ता है। वे इन चिंताओं को पूरी तरह नजरअंदाज़ नहीं कर सकते, लेकिन उनका समर्थन करना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ होगा। उन्हें ऐसा रास्ता दिखाना होगा जिसमें प्रवासन नियंत्रित भी हो और समाज की विविधता भी बनी रहे। लेकिन फिलहाल उनकी सरकार सिर्फ संकट टालने में लगी है, कोई बड़ा विजन सामने नहीं रख रही।आक्रमकता की राजनीति जुबैर अहमद का मानना है कि खतरा यह है कि अगर इन नारों और गुस्से को रोका नहीं गया, तो कल यह राजनीति की मुख्यधारा बन जाएगा। नाइजेल फराज का नाम पहले से ही प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवारों में लिया जा रहा है। इतिहास गवाह है कि आक्रमकता कितनी जल्दी विचारधारा और फिर सत्ता में बदल जाता है। ब्रिटेन ने पहले भी ऐसे दौर देखे हैं। 1930 के दशक में फासीवाद को सिर्फ पुलिस ने नहीं, बल्कि समाज ने मिलकर रोका था। 1970-80 के दशक में नेशनल फ्रंट जैसी पार्टियों को समुदायों की एकजुटता ने पीछे धकेला। आज का खतरा उतना साफ दिखाई नहीं देता, लेकिन धीरे-धीरे भाषा और राजनीति में घुसपैठ कर रहा है। ‘यूनाइट द किंगडम’ रैली हमें याद दिलाती है कि यह संकट केवल प्रवासियों का मुद्दा नहीं है। यह ब्रिटेन की राजनीतिक पहचान का सवाल है। क्या देश समावेशी लोकतंत्र बना रहेगा या यूरोप में उठ रही कट्टर राष्ट्रवाद की लहर में बह जाएगा? भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिकों के लिए भी यह बड़ा सबक है कि सफलता और नागरिकता कभी भी अंतिम सुरक्षा कवच नहीं होती। इतिहास यही बताता है।

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