जानिए कैसे और क्यों बंट गई है दुनिया की ताकतें वेनेजुएला की वजह से

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जानिए कैसे और क्यों बंट गई है दुनिया की ताकतें वेनेजुएला की वजह से
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वेनेजुएला के संकट पर दुनिया की बड़ी ताकतें एक दूसरे के खिलाफ आ गई हैं जिसकी झलक संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में देखने को मिली.

फिलहाल भारत में सभी का ध्यान पाकिस्तान और उसके खिलाफ कार्रवाई करने को लेकर हैं. दुनिया की निगाहें भी भारत और पाकिस्तान पर हैं कि दोनों देशों के बीच तनाव क्या रंग ला रहा है. वहीं दूसरी ओरऔर उत्तर कोरिया प्रमुख किम जोंग उन के बीच हनोई वार्ता असफल होने से पूर्वी एशिया को लेकर दुनिया में एक निराशा भी है.

लेकिन इन सबके बीच संयुक्त राष्ट्र से ऐसी खबर आई है जिसने दुनिया के शक्ति संतुलन का मजबूत दस्तावेज जाहिर किया है. हम बात कर रहे हैं संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में को लेकर पेश किए गए प्रस्तावों और उनके हश्रों की. इन प्रस्तावों को लेकर हुए घटनाक्रम ने बता दिया है कि दुनिया में इस समय का शक्ति संतुलन क्या है.इस सवाल के जवाब की हल्की सी झलक हमें हाल ही में वेनेजुएला संकट के कारण संयुक्त राष्ट्र के ताजा घटनाक्रम में मिलती है. वेनेजुएला में इस समय राष्ट्रपति निकोलस मादुरो अपने देश में घोर विरोध का सामना कर रहे हैं. पेट्रोलियम के सबसे ज्यादा ज्ञात भंडारों होने के बाद भी देश में खाद्यों की खासी कमी है महंगाई बेलगाम ऊंचाइयों पर है. मादुरो का विरोध चरम पर है, विरोधी दल के नेता जुआन गुएडो ने खुद को वेनेजुएला का राष्ट्रपति घोषित कर दिया है.देश के इस आंतरिक संघर्ष पर दुनिया भी दो पक्ष में बंट गईं है. एक ओर जुआन गुएडो के अमेरिका और यूरोपीय देशों सहित कई लोग आए हैं. अमेरिका ने वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगाते हुए वहां राहत सामग्री भेजने की कोशिश की जिसका विरोध राष्ट्रपति मादुरो कर रहे हैं. वहीं मादुरो को चीन, रूस, जैसे देशों का समर्थन मिला है. अमेरिका राष्ट्रपति मादुरो को उनके पद से हटाना चाहता है तो वहीं चीन और रूस ने कहा है कि वेनेजुएला के आंतरिक मामलों में दखल देने का विरोध किया है. मामला संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पहुंच गया.क्या हुआ सुरक्षा परिषद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वेनेजुएला संकट को लेकर दो प्रस्ताव पेश किए गए. इनमें से एक अमेरिका ने पेश किया और दूसरा रूस ने पेश किया. ये दोनों देश इस संकट को लेकर आमने सामने नजर आए. 15 सदस्यीय परिषद में अमेरिका के प्रस्ताव में मांग की गई थी वेनेजुएला में जल्दी ही स्वतंत्र और निष्पक्ष राष्ट्रपति चुनाव कराए जाएं और वहां निर्बाध रूप से मानवीय सहायता पहुंचाई जाए. इस प्रस्ताव को रूस और चीन ने वीटो कर खारिज करवा दिया. इसके बाद रूस ने एक प्रस्ताव रखा इस प्रस्ताव में मांग की गई थी कि इस मामले का राजनैतिक समाधान निकाला जाए और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए वेनेजुएला सरकार को माध्यम बनाया जाए. रूस के प्रस्ताव को बहुमत नहीं मिला और अमेरिका को वीटो करने की जरूरत ही नहीं पड़ी.वेनेजुएला के पूरे सकंट को अगर अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की जाए तो मूल संकट के अलावा कई पहलू निकल कर सामने आते हैं. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस संकट को इतनी अहमियत क्यों दी जा रही है इसका कारण यहां के तेल व्यवसाय से जुडा़ है. वेनेजुएला ऐसा देश हैं जहां प्राकृतिक तेल का दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञात भंडार है. यहां का तेल निर्यात ही है जिसपर दुनिया के तमाम देशों की नजर लगी हुई है. आज दुनिया में सबसे बड़ी ताकत वही है जिसके नियंत्रण में संसार का सबसे ज्यादा ऊर्जा स्रोत नियंत्रण है. यही अमेरिका सहित रूस चीन और दुनिया के बाकी देशों की इतनी दिलचस्पी की वजह है और वेनेजुएला के संकट से निपटने के तरीके पर इतने बड़े विवाद का कारण भी. वेनेजुएला ने 1998 में 2,243.900 बैरल प्रति दिन की दर से कच्चे तेल निर्यात किया था. 2011 तक यह गिरता रहा इसके बाद थोड़े से उछाल के बाद 2013 में 1,528.000 बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया. इसके बाद इस निर्यात में जबर्दस्त उछाल आया और 2015 में 1974.200 बैरल प्रति दिन तक पहुंचने के बाद से इसमें गिरावट शुरू हो गई और दिसंबर 2017 में यह निर्यात 1,596.400 प्रति बैरल रह गया एक अपुष्ट आंकड़े के मुताबिक अमेरिका ने जब से वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगाए हैं उसका निर्यात करीब 40 प्रतिशत तक गिर गया है.जाहिर है इस वक्त हर शक्तिशाली देश चाहता है कि वेनेजुएला में शासन उसकी सहुलियतों में सहायक होने वाला हो. रूस और चीन अमेरिका के इस इरादे को रोकने की कोशिश कर रहे हैं वहीं अमेरिका भी वेनेजुएला के स्थानीय लोगों की परेशानियों की दुहाई दे रहा है जो कि गलत नहीं है. सारा झगड़ा समस्या सुलझाने के तरीके पर हो रहा है. यही वजह है चीन ने कहा है कि वह चाहता है कि वेनेजुएला के राजनैतिक संकट का फैसला वहां के लोग करें और वहां अंतरराष्ट्रीय दखल न हो. एक अमेरिकी आंकलन के मुताबिक रूसी तेल कंपनियों ने पिछले पांच सालों में 13 बिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश किया है. मादुरो शासनकाल में यह निवेश ज्यादा सुरक्षित माना जा रहा है. कुछ इसी तरह का नजरिया रूस का यूक्रेन में अमेरिका को लेकर है. इसी तरह चीन वेनेजुएला में अमेरिका के संभावित बढ़ते वर्चस्व के खतरे को देख रहा है इसलिए वह वेनेजुएला में अमेरिका का किसी भी तरह का दखल नहीं चाहता. कुल मिलाकर भले ही रूस और चीन वेनेजुएला में दखल देने की स्थिति में न हों लेकिन वे नहीं चाहते के वहां अमेरिका का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दखल हो.यह बात हैरान करने वाली है कि भारत ही वह देश है जो वेनेजुएला से सबसे ज्यादा तेल खरीदता है और अभी तक की भारतीय अंतरराष्ट्रीय कूटनीति किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं चाहता. इसके अलावा भारत फिलहाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य नहीं है. भारत चाहता है कि वेनेजुएला में शांति रहे. वहां की सरकार से भारत के ऐसे संबंध रहें कि भारत इस देश से कच्चा तेल उसी तरह से आयात कर सके जैसा करता आया है. वेनेजुएला में निष्पक्ष लोकतंत्र का भारत हमेशा ही स्वागत करेगा.

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