जमीन का हक और महिलाएं

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जमीन का हक और महिलाएं
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पितृसत्तात्मक व्यवस्था में यह सोच बहुत गहरे पैठी हुई है कि जमीन पुरुषों के नाम ही होनी चाहिए। नौकरी के लिए पुरुषों के शहरी क्षेत्रों में प्रवास के बाद पूरे एशिया में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। बावजूद इसके अभी भी जमीन का मालिकाना हक महिलाओं के नाम नहीं के बराबर है। यही नहीं, विवाहित महिलाओं से उनके पीहर पक्ष द्वारा निरंतर दबाव बनाया जाता है कि वे पैतृक संपत्ति पर अपना अधिकार छोड़ दें।

आधी आबादी के समान अधिकारों को वास्तविक रूप देना जटिल और चुनौती भरा काम है। देका जाए तो यह अधूरा मानव अधिकार संघर्ष है। वैश्विक महामारी कोरोना ने इस अधूरे संघर्ष को और मुश्किल बना दिया है। महामारी का सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर इसलिए हुआ है कि दुनिया भर में उनकी आर्थिक स्थिति हमेशा से हाशिए पर रही है। महिला सशक्तिकरण के तमाम दावे इस सत्य की अवहेलना करते आए हैं कि बगैर आर्थिक सुदृढ़ीकरण के महिला सशक्तिकरण की हर परिभाषा और कोशिश अधूरी है। अनौपचारिक अर्थ अर्जन में संलग्न अधिकांश महिलाएं अर्थव्यवस्था की विपरीत लहर आते ही अपने रोजगार खो देती हैं। भूमि का अधिकार विश्व के अधिकांश देशों में आर्थिक स्थिरता का सबसे मजबूत साधन माना गया है। विभिन्न देशों में हुए अध्ययन बताते हैं कि जहां भी महिलाओं के पास भूमि संबंधी अधिकार होते हैं, वहां उनका परिवार पर प्रभाव होता है। वे अपने विचारों को आत्मविश्वास के साथ रख पाती हैं और इन सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि वे घरेलू हिंसा की भी बहुत कम शिकार होती हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि जिसके पास अचल संपत्ति के अधिकार होते हैं, उसका प्रभुत्व परिवार और समाज में कहीं अधिक होता है, बनिस्बत उनके जिनके पास संपत्ति नहीं है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा रिपोर्ट बताती है कि दुनिया भर में आर्थिक समानता में महिलाओं की संख्या अट्ठावन फीसद है। लेकिन पुरुषों के बराबर आने में उन्हें अभी सदियां लग जाएंगी। एक सौ छप्पन देशों में हुए इस अध्ययन में महिला आर्थिक असमानता में भारत का स्थान एक सौ इक्यावनवां है। यानी महिलाओं को आर्थिक आजादी और अचल संपत्ति का हक देने के मामले में एक तरह से हम दुनिया में सबसे नीचे आते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि आखिर ऐसा क्यों है कि शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं को भूमि पर अधिकार हासिल नहीं हैं, जबकि कानून में महिलाओं को संपत्ति पर पुरुषों के समकक्ष अधिकार हासिल होने का दावा किया जाता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य से इस संपूर्ण संदर्भ को देखें तो पाएंगे कि दो प्रकार के व्यवधान महिलाओं को संपत्ति का अधिकारी होने से वंचित करते हैं। पहला तो पुरुष सत्तात्मक समाज प्रभुत्व के सबसे महत्त्वपूर्ण साधन यानी भूमि को किसी भी स्थिति में महिलाओं को सौंपने को तैयार नहीं होता। दूसरा कारण यह कि महिलाएं स्वयं अपने अधिकारों को भावनात्मक कारणों से छोड़ देती हैं। परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा निरंतर उन्हें इस बात के लिए बाध्य किया जाता है कि अगर वे संपत्ति पर अधिकार के लिए कानून का सहारा लेंगी तो उन्हें पारिवारिक संबंधों को छोड़ना पड़ेगा। इन वास्तविकताओं के साथ ही अगर तथ्यात्मक बिंदुओं का विवेचन किया जाए और आंकड़ों पर ध्यान दिया जाए तो जनगणना के आंकड़ों के अनुसार कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी एक तिहाई है। लेकिन उनके नाम मात्र भूमि मात्र तेरह फीसद ही है। 2017-18 का श्रम बल सर्वे बताता है कि 73.

2 फीसद ग्रामीण महिलाएं खेती करती हैं, लेकिन जमीन सिर्फ 12.8 फीसद महिलाओं के पास ही है। पितृ सत्तात्मक व्यवस्था में यह सोच बहुत गहरे पैठी हुई है कि जमीन पुरुषों के नाम ही होनी चाहिए। नौकरी के लिए पुरुषों के शहरी क्षेत्रों में प्रवास के बाद पूरे एशिया में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। बावजूद इसके अभी भी जमीन का मालिकाना हक महिलाओं के नाम नहीं के बराबर है। यही नहीं, विवाहित महिलाओं से उनके पीहर पक्ष द्वारा निरंतर दबाव बनाया जाता है कि वे पैतृक संपत्ति पर अपना अधिकार छोड़ दें। जमीन के मालिकाना हक में बहुत बड़ी असमानताएं हैं। किसान की परिभाषा जमीन के मालिकाना हक से जुड़ी है। इसलिए खेतिहर महिलाएं किसान की परिभाषा के दायरे से ही बाहर हो जाती हैं। कहने को केंद्र की 2007 की राष्ट्रीय किसान नीति को ज्यादा व्यापक और समावेशी बनाया गया। इस नीति दस्तावेज में किसान की परिभाषा ऐसे व्यक्ति की है जो फसल उगाने और दूसरी प्रमुख कृषि उपज की गतिविधि से आजीविका और आर्थिक उपार्जन के लिए जुड़ा है। लेकिन वास्तविकता के धरातल पर महिलाओं के हाथ में कुछ भी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक जबरन बेदखली या गरीबी के खतरे को कम कर के प्रत्यक्ष और सुरक्षित भूमि अधिकार महिलाओं को घर में उनकी सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाते हैं और उनकी सार्वजनिक भागीदारी के स्तर में सुधार करते हैं। परंतु जमीन पर अधिकार न होने का खमियाजा महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक जीवन के सभी स्तरों पर भुगतना पड़ता है। सरकारी योजनाओं और अन्य सुविधाओं पर महिलाओं की पहुंच तब और कम हो जाती है जब जमीन उनके नाम पर नहीं हो, क्योंकि राजस्व विभाग एक किसान को भूमि के रिकॉर्ड के आधार पर परिभाषित करता है और कृषि विभाग राजस्व विभाग की परिभाषाओं का पालन करता है। इसलिए अधिकांश योजना के लाभार्थियों के आधार को सीमित करके भूमि शीर्षक रिकॉर्ड जमा कराने की आवश्यकता होती है। संस्थागत ऋण की पहुंच भी भूमि के स्वामित्व के साथ सीमित है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि अब किसान की पहचान को रेखांकित किया जाए और उसमें जमीन के अधिकार को भी सम्मिलित किया जाए, क्योंकि हर स्थिति में यह निर्णायक तत्त्व सिद्ध होता है। जमीन को लेकर बने नियमों में लैंगिक गणना की आवश्यकता है, ताकि क्रियान्वयन में जो कमियां हैं उनकी पहचान कर दूर किया जा सके। फरवरी, 2019 में हुए एक अध्ययन के मुताबिक जमीन पर अधिकार देने से न सिर्फ महिलाओं को बल्कि समुदायों को भी जलवायु परिवर्तन के असर से बचाया जा सकता है। दुनिया भर में जितने लोग अपनी आजीविका के लिए जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह निर्भर हैं, उनमें आधी से ज्यादा आबादी महिलाओं की है। बावजूद इसके अपनी जमीन से जीविका चलाने वाले किसानों में सिर्फ चालीस फीसद महिलाएं हैं। अफ्रीका और पूर्वी एशिया में ऐसी महिलाओं की संख्या और भी कम है। परिवार और सामुदायिक दोनों ही स्तरों पर महिलाएं एक बेहतर प्रबंधक की भूमिका निभाती हैं। ऐसे में आवश्यकता है उनकी इस भूमिका को मान्यता देने की। जब महिलाओं को अधिकार दिए जाते हैं तो इससे उनके पूरे समुदाय को लाभ मिलता है। इनमें खाद्य सुरक्षा, बच्चों के लिए स्वास्थ्य व शिक्षा में निवेश और भूमि का बेहतर प्रबंधन शामिल हैं। भारत में विरासत के निर्धारित नियम हैं। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम कहता है कि भूमि को मृतक की विधवा माता और उसके बच्चों में विभाजित किया जाएगा। परंतु वास्तविकता में ऐसा नहीं होता। अधिकतर पितृसत्तात्मक और सामाजिक मान्यताएं कानूनी अधिकारों पर भारी पड़ जाती हैं। 2017-18 के आर्थिक सर्वेक्षण के बाद पुरुषों के गांव से शहर चले जाने के कारण खेतों का स्त्रीकरण बहस का बिंदु बन गया। देश में नब्बे फीसद से अधिक मामलों में खेती योग्य जमीन विरासत के जरिए ही हस्तांतरित की जा रही है। यहां महिलाओं को अपने ही परिवार में गंभीर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यह एक विचारणीय प्रश्न है कि कृषि गतिविधियों में संलग्न होकर जो महिलाएं आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, फिर भी हमारा तंत्र उनके योगदान को क्यों नहीं मान्यता देता। हम इस तथ्य को अस्वीकार नहीं कर सकते कि जिन महिलाओं के पास जमीन है, उनके पास बेहतर आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा है, ठीक वैसे ही जैसे सदियों से यह सुरक्षा पुरुषों को मिलती आई है। स्त्री के श्रम को नकारते हुए आज भी दुनिया भर में ऐसे पुरुषों का बहुतायत है जो जमीन पर अपना एकाधिकार मानते हैं। इन परिस्थितियों को बदलना होगा, क्योंकि जैसे-जैसे देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को कोरोना संकट से निकालने की कोशिश में आगे बढ़ेंगे, वैसे वैसे पहले से ज्यादा सामुदायिक संस्थानों के निजीकरण की आवश्यकता होगी। इससे उन ग्रामीण समुदाय को नुकसान होगा जिनके पास आधिकारिक रूप से जमीन नहीं हैं।

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