Nitish Kumar Story: एक समय ऐसा भी था जब नीतीश कुमार और लालू यादव की मित्रता थी। एक ही आंदोलन की उपज थे दोनों। लेकिन ललन सिंह के साथ लालू यादव ने कुछ ऐसा किया जिसके बाद बिहार की राजनीति में दो धुरियां बन गईं। पढ़िए ये किस्सा...
पटना: बिहार की सियासत में एक दौर ऐसा भी था जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव ने एक साथ अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की थी। लालू प्रसाद यादव रेस में आगे निकल गए और बिहार में 15 साल तक राज किया। लेकिन जब नीतीश कुमार की बारी आई तो उन्होंने सारे कीर्तिमान ही ध्वस्त कर दिए।बीच के कुछ सालों को छोड़ दें को राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह हमेशा नीतीश कुमार के साथ परछाई की तरह डटे रहे। आज ललन सिंह नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार के राजनीतिक गुरु की भूमिका में हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब नीतीश के सामने लालू प्रसाद यादव ने ललन सिंह को अपने कमरे से बाहर निकाल दिया था। ये बात नीतीश को कलेजे में तीर की तरह चुभ गई थी और वहीं से बिहार की राजनीति ने वो मोड़ लिया जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। नीतीश और लालू तब मित्र हुआ करते थेलालू प्रसाद के राजनीतिक मित्र और राजद नेता शिवानंद तिवारी ने इसके बारे में विस्तार से लिखा है। उन्होंने शुरुआत कुछ यूं की है कि ' नीतीश कुमार की राजनीति की संपूर्ण यात्रा को दो खंड में देखा जा सकता है। पहला खंड वह है जब वे सत्ता के बाहर थे। विधानसभा सदस्य वे 1985 में बने। उसके बाद तो उनकी राजनीति सरपट दौड़ी। 1989 में बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद बने। 1990 में वीपी सिंह की सरकार में कृषि और सहकारिता राज्यमंत्री बने। वह सरकार सिर्फ पंद्रह महीने ही चल पाई। 1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में नीतीश जी पुनः बाढ़ से सांसद बने।'90 के दशक में कैसा था लालू और नीतीश का मिजाज शिवानंद तिवारी ने आगे लिखा है कि '1991 के लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद की एक चर्चित घटना है। चर्चित इस अर्थ में कि कई लोगों ने उस घटना के बारे में अपने-अपने तरीके से लिखा है। संकर्षण ठाकुर की किताब में शायद वह घटना सबसे पहले आई थी। मैंने उसको पढ़ा नहीं है। लेकिन वह घटना लालू और नीतीश दोनों के मिजाज और चरित्र को जरूर दर्शाती है।'वो घटना, जिसने लालू और नीतीश की राहें कर दीं जुदा इसी के बाद शिवानंद तिवारी ने उस घटना का जिक्र किया, जिसके बाद नीतीश और लालू यादव के रास्ते अलग-अलग हो गए। शिवानंद तिवारी के मुताबिक '91 के मध्यावधि चुनाव में वृष्णि पटेल भी सिवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा आए थे। बिहार भवन में उनको कमरा मिला था। दिल्ली में उन दिनों मेरा मुकाम नीतीश का ही घर हुआ करता था। जिस दिन की यह घटना है, उस दिन हम लोग यानी नीतिश कुमार, ललन सिंह, वृष्णि पटेल और मैं, पटेल साहब के कमरे में टेलीविजन पर कोई फिल्म देख रहे थे।'ललन सिंह लालू के पास नहीं जाना चाहते थे- शिवानंदशिवानंद के अनुसार 'फिल्म समाप्त होने के बाद जब हम बाहर निकले, तो पता चला कि लालू जी भी दिल्ली आ गए हैं और नीचे मुख्यमंत्री कक्ष में हैं। नीतीश कुमार ने ही कहा कि चलिए, मुख्यमंत्री जी से मिल लिया जाए। लेकिन ललन पता नहीं क्यों जाने को इच्छुक नहीं थे। नीतीश ने कहा कि- अरे चलिए, ऐसा क्या है। लेकिन तब भी ललन जाने में संकोच कर रहे थे। तब मैंने ललन सिंह से कहा कि जब नेता कह रहा है तो चलो , क्या हर्ज है। मैंने नीतीश के लिए नेता शब्द का इस्तेमाल किया है। हम लोग नीतीश को ही अपनी जमात का नेता मानते थे। यह जयप्रकाश आंदोलन और लोहिया विचार मंच के जमाने से ही था।'सब बैठे, लेकिन ललन खड़े रहे- शिवानंदबकौल शिवानंद तिवारी 'हम लोग मुख्यमंत्री कक्ष के ड्राइंग रूम में पहुंचे। वहां देखा कि तीन लोगों के बैठने वाले लंबे सोफे पर बीच में लालू यादव बैठे हुए हैं। सामने एक लंबा टेबल था, जिस पर एक खुली हुई फाइल रखी थी.
फाइल में सिर्फ एक पन्ना नज़र आ रहा था। लालू यादव के हाथ में खुली हुई कलम थी. नजर फाइल पर. लालू ने हम लोगों पर नजर भी नहीं उठाई। हम लोग अंदर गए और जिसे जहां जगह मिली, वहां बैठ गए या खड़े हो गए। एक दूसरा लंबा सोफा था। नीतीश और पटेल साहब उस पर बैठ गए। सामने एक गोदरेज की टेबल थी, जिस पर टेक लगाकर ललन खड़े हो गए। मैं लालू यादव के बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गया।'ललन सिंह को इशारा कर लालू ने कमरे से बाहर निकाल दियालालू यादव ने बगैर कुछ कहे, अपनी कलम बंद की, फाइल को एक तरफ रखा और सीधे ललन की ओर देखा और उंगली के इशारे से उसको कमरे से बाहर का रास्ता दिखाया। सब लोग हतप्रभ हो गए। ललन भी पहले उस इशारे को नहीं समझ पाए। तब लालू ने दोबारा उनको बाहर जाने का इशारा किया। ललन चुपचाप सिर झुकाकर वहां से बाहर निकल गए। मैंने नीतीश कुमार और पटेल साहब के चेहरे की ओर नजर उठाई। ललन के साथ इस व्यवहार को देखकर दोनों का चेहरा उतर गया था। ललन अपनी मर्जी से लालू के यहां नहीं गया था, एक तरह से नीतीश ही दबाव देकर उनको वहां ले गए थे। सरयू राय का नाम लेकर लालू ने दी गाली- शिवानंदशिवानंद तिवारी ने इसके बाद बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने आगे बताया है कि 'इसके बाद लालू यादव ने सरयू राय का नाम लेकर गाली गलौज करना शुरू कर दिया। लालू सरयू राय को क्यों गलिया रहे हैं हम लोग इससे बिल्कुल अनभिज्ञ थे। बाद में पता चला कि राय जी ने पटना के नवभारत टाइम्स में एक लेख लिखा था। उन्होंने लालू सरकार पर आरोप लगाया था कि बिहार के हित के विरुद्ध इसने सोन नहर के पानी को भारत सरकार के तत्कालीन बिजली मंत्री कल्पनाथ राय के क्षेत्र में दे दिया है। विधानसभा का सत्र चल रहा था। विपक्ष ने उस खबर पर विधानसभा में शोरशराबा मचाया था। सरयू राय , नीतीश कुमार के मित्र हैं। इसी पृष्ठभूमि में लालू यादव अत्यंत आक्रोश में थे और सरयू राय के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी की कृपा से राजनीति नहीं कर रहे हैं। मैं जानता हूं कि यह सब कौन करा रहा है। उनका इशारा नीतीश कुमार की ओर था।' जब शिवानंद ने लालू यादव को दिखाया रौद्र रूपइसके बाद शिवानंद तिवारी से चुप नहीं रहा गया। उनके मुताबिक 'यह सब सुनकर मेरे धैर्य का बांध टूट गया। मैंने खड़े होकर कहा कि आपको यह गलतफहमी हो गई है कि बाकी लोग आपकी कृपा से राजनीति कर रहे हैं। मैंने उन्हें उनके पुराने दिनों की याद दिलाई और कहा कि मेरे जीप पर पीछे लटकने के लिए बेचैन रहते थे, वह दिन भूल गये! मैंने नीतीश को कहा उठो , इस आदमी के साथ बैठना अपना अपमान करवाना है। गुस्से से मेरी आवाज कांप रही थी। नीतीश और पटेल साहब उठकर खड़े हो गए।'शिवानंद का गुस्सा देख लालू हड़केशिवानंद तिवारी आगे बताते हैं कि 'लालू मुझे अपने स्कूल के दिनों से जानते थे। मेरी इस प्रतिक्रिया से स्थिति अचानक बदल गई। लालू यादव तुरंत उठे, मुझे पकड़कर शांत करने लगे और बाहर आवाज लगाई 'अरे कहां मर गया सब। जल्दी बाबा के लिए चाय ले आओ। दूसरी ओर नीतीश को कहा, बैठिए नीतीश जी, बाबा चाय पी कर जायेंगे। नीतीश ठस से बैठ गए। चाय आई। अब चाय गले के नीचे उतर रही है! किसी तरह चाय गले से नीचे उतार कर हम लोग वहा से बाहर निकले। बिहार भवन के बिलकुल नजदीक ही नीतीश कुमार का सरकारी आवास था। वातावरण गंभीर था। घर पहुंचते ही नीतीश कुमार ने अपने स्टाफ को आदेश दिया कि किसी का फोन नहीं देना है। किसी से मिलना नहीं है। पटना सरयू राय को फोन लगाइए। राय जी को फोन गया कि शाम जहाज से दिल्ली पहुंचिए।'वो डेढ़ पेज वाली चिट्ठी शिवानंद तिवारी के मुताबिक इसके बाद मानों नीतीश कुमार ने बहुत कुछ तय कर लिया था। 'शाम तक राय जी दिल्ली हाजिर हो गए। पूरी घटना पर चर्चा हुई, तय हुआ कि बिहार भवन में जो कुछ भी हुआ, उसके विरोध में लालू यादव को कड़ी चिट्ठी लिखी जाए। राय जी चिट्ठी का मजमून तैयार करें। दो ढाई पेज का मजमून राय जी ने तैयार किया। नीतीश कुमार ने राय जी को सुझाया कि इसको थोड़ा छोटा कर दें। राय जी ने फिर लिखने में हाथ लगाया। इधर नीतीश ने कहा कि वे शरद जी से मिल आते हैं। मैंने कहा कि शरद जी से मिलने जाओगे तब तो चिट्ठी नहीं जाएगी। नीतीश जी ने झुंझला कर जवाब दिया कि शरद जी नेता हैं, उनसे क्यों नहीं मिलें। मैंने जवाब दिया कि जरूर मिलो. मैं तो सिर्फ उस मुलाकात के नतीजे की बात कर रहा हूं। नीतीश शरद जी से मिल कर आये, इस बीच राय जी ने ढाई पेज को डेढ़ पेज में संक्षिप्त कर दिया था. नीतीश जी ने कहा कि इसको और छोटा कर दीजिए. इसको पटना पहुंचने के बाद लालू जी को भेजा जाएगा। अंततोगत्वा समझा जाए कि उस चिट्ठी का कोई औचित्य नहीं रहा। लेकिन वह मूल चिठ्ठी छपी हुई है, श्री कांत की किताब चिठ्ठियों की राजनीति में।'
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