जब चुनाव से पहले पप्पू यादव ने भाजपा की तरफ बढ़ाया था दोस्ती का हाथ!

Pappu Yadav Meet Narendra Modi News

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पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव, जो अपनी बीजेपी विरोधी राजनीति के लिए जाने जाते हैं, एक समय ऐसा भी था जब उन्होंने बीजेपी से दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाया था। 2015 में, जब वे आरजेडी के सांसद थे और पार्टी से नाराज चल रहे थे, तब उन्होंने दो बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की...

पटना: पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव पिछड़ावाद की लहर पर सवार हो कर राजनीति में आये। भाजपा विरोध उनकी राजनीति का आधार था। लेकिन इसके बावजूद एक समय वह भी था, जब उन्होंने भाजपा से दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाया था। राजनीति संभावनाओं का खेल है। जिसकी कल्पना नहीं कर सकते, वह भी घटित हो सकता है। जैसे 2015 में पप्पू यादव ने दो बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की थी। उस समय पप्पू यादव राजद के सांसद थे और पार्टी से नाराज चल रहे थे। इस मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था, 'लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के बाद नरेन्द्र मोदी सबसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री मोदी में सबको साथ लेकर चलने का असाधारण गुण है। देश के विकास के लिए उनका दृष्टिकोण बेहद सराहनीय है।' उस समय पप्पू यादव नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक क्षमता के कायल थे। अगर 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का पप्पू यादव के साथ चुनावी समझौता हो गया होता तो क्या लालू -नीतीश के गठजोड़ को एक हद तक चुनौती दी जा सकती थी ? पप्पू यादव ने नरेन्द्र मोदी की तारीफ की पप्पू यादव की प्रधानमंत्री मोदी से पहली मुलाकात 26 फरवरी 2015 को दिल्ली में हुई थी। तब उन्होंने पीएम मोदी की बहुत तारीफ की थी। इस मुलाकात के बाद यह चर्चा होने लगी कि विधानसभा चुनाव में एक अप्रत्याशित गठबंधन होने वाला है। इसके बाद लालू यादव, पप्पू यादव को लेकर सशंकित हो गये। उन्होंने पप्पू यादव पर भाजपा के साथ सांठगांठ का आरोप लगा दिया। आखिर पप्पू यादव ने क्यों धुर विरोधी नरेन्द्र मोदी से क्यों मुलाकात की? क्या अचानक उनकी भाजपा के प्रति सोच बदल गयी थी ? दरअसल पप्पू यादव को उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इस रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया था। वे खुद को लालू यादव के बाद यादवों का दूसरा सबसे बड़ा नेता मानते थे। इसकी वजह से वह स्वयं को लालू यादव का उत्तराधिकारी भी मानते थे। लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव के पहले लालू यादव ने तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया तो पप्पू यादव को जोर का झटका लगा। लालू विरोध का एक दूसरा कारण भी था। जब विधानसभा चुनाव से पहले राजद ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा मान लिया तो पप्पू यादव ने पार्टी के इस फैसले का विरोध किया। वे नीतीश कुमार की सार्वजनिक मंचों से आलोचना करने लगे। लालू यादव को जवाब देने की मंशाराजद सांसद रहते हुए भी पप्पू यादव अपनी स्वतंत्र राजनीति के लिए रास्ता तलाश रहे थे। लालू यादव को जवाब देने के लिए भाजपा से भी नजदीकी बढ़ाने में उन्हें कुछ भी हर्ज नहीं लगा। वैसे भी राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती। पप्पू यादव के भाजपा के प्रति बढ़ते झुकाव के कारण लालू यादव भड़क गये। अप्रैल 2015 में उन्हें दल विरोधी गतिविधियों के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। फिर मई 2015 में उन्हें राजद से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया गया। अगर एक दो चुनावों को छोड़ दिया जाय तो पप्पू यादव 1990 से ही कोसी-सीमांचल में अपनी राजनीतिक पैठ साबित करते रहे हैं। वे लालू यादव के विरोध में चुनाव लड़कर कर कई बार जीत चुके हैं। ताजा उदाहरण 2024 का लोकसभा चुनाव है। पीएम मोदी से दूसरी मुलाकात पप्पू यादव की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से दूसरी मुलाकात 13 अगस्त 2015 को संसद भवन स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई। करीब आधा घंटा तक बातचीत हुई। इस बातचीत के बारे में उन्होंने बताया था, 'मैं प्रधानमंत्री से मिलना चाहता था कि क्योंकि जल्द ही उनकी सहरसा में चुनावी सभा होने वाली है। मैंने उन्हें अपने क्षेत्र की समस्याओं से अवगत कराया। उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनी और कई मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया।' इस मुलाकात के बाद कई अटकलें लगायी जाने लगीं। एक चर्चा के मुताबिक, भाजपा का एक खेमा कोसी इलाके में पप्पू यादव के प्रभाव का फायदा उठाना चाहता था। उस समय तारिक अनवर एनसीपी में थे। विधानसभा चुनाव में लालू -नीतीश ने एनसीपी को केवल तीन सीटें दीं थीं। इससे वे नाराज होकर पप्पू यादव के साथ एक मोर्चा बनाना चाहते थे। भाजपा और पप्पू यादव , दोनों को नुकसान2015 के विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा, पप्पू यादव के साथ सीटों का समझौता करता तो, नतीजे कुछ और हो सकते थे। लेकिन भाजपा ने अपनी छवि को ध्यान में रख कर पप्पू यादव से समझौता नहीं किया। चुनाव से ठीक पहले पप्पू यादव ने जन अधिकार पार्टी बनायी। भाजपा से बात नहीं बनने के कारण उन्होंने एनसीपी, समाजवादी पार्टी, समाजवादी जनता दल, समरस समाज पार्टी जैसे दलों से गठबंधन किया। उन्होंने चुनाव में लालू -नीतीश के खिलाफ जमकर प्रचार किया। जन अधिकार पार्टी ने 243 में से कुल 64 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। इस चुनाव में भाजपा को भी बहुत नुकसान हुआ। 2010 में उसकी 91 सीटें थीं, जो अब घट कर 53 रह गयीं। तालमेल नहीं होने से दोनों को नुकसान हुआ।.

पटना: पूर्णिया के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव पिछड़ावाद की लहर पर सवार हो कर राजनीति में आये। भाजपा विरोध उनकी राजनीति का आधार था। लेकिन इसके बावजूद एक समय वह भी था, जब उन्होंने भाजपा से दोस्ती के लिए हाथ बढ़ाया था। राजनीति संभावनाओं का खेल है। जिसकी कल्पना नहीं कर सकते, वह भी घटित हो सकता है। जैसे 2015 में पप्पू यादव ने दो बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की थी। उस समय पप्पू यादव राजद के सांसद थे और पार्टी से नाराज चल रहे थे। इस मुलाकात के बाद उन्होंने कहा था, 'लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के बाद नरेन्द्र मोदी सबसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री मोदी में सबको साथ लेकर चलने का असाधारण गुण है। देश के विकास के लिए उनका दृष्टिकोण बेहद सराहनीय है।' उस समय पप्पू यादव नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक क्षमता के कायल थे। अगर 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का पप्पू यादव के साथ चुनावी समझौता हो गया होता तो क्या लालू -नीतीश के गठजोड़ को एक हद तक चुनौती दी जा सकती थी ?पप्पू यादव ने नरेन्द्र मोदी की तारीफ कीपप्पू यादव की प्रधानमंत्री मोदी से पहली मुलाकात 26 फरवरी 2015 को दिल्ली में हुई थी। तब उन्होंने पीएम मोदी की बहुत तारीफ की थी। इस मुलाकात के बाद यह चर्चा होने लगी कि विधानसभा चुनाव में एक अप्रत्याशित गठबंधन होने वाला है। इसके बाद लालू यादव, पप्पू यादव को लेकर सशंकित हो गये। उन्होंने पप्पू यादव पर भाजपा के साथ सांठगांठ का आरोप लगा दिया। आखिर पप्पू यादव ने क्यों धुर विरोधी नरेन्द्र मोदी से क्यों मुलाकात की? क्या अचानक उनकी भाजपा के प्रति सोच बदल गयी थी ? दरअसल पप्पू यादव को उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इस रास्ते पर चलने के लिए मजबूर कर दिया था। वे खुद को लालू यादव के बाद यादवों का दूसरा सबसे बड़ा नेता मानते थे। इसकी वजह से वह स्वयं को लालू यादव का उत्तराधिकारी भी मानते थे। लेकिन 2015 के विधानसभा चुनाव के पहले लालू यादव ने तेजस्वी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया तो पप्पू यादव को जोर का झटका लगा। लालू विरोध का एक दूसरा कारण भी था। जब विधानसभा चुनाव से पहले राजद ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा मान लिया तो पप्पू यादव ने पार्टी के इस फैसले का विरोध किया। वे नीतीश कुमार की सार्वजनिक मंचों से आलोचना करने लगे। लालू यादव को जवाब देने की मंशाराजद सांसद रहते हुए भी पप्पू यादव अपनी स्वतंत्र राजनीति के लिए रास्ता तलाश रहे थे। लालू यादव को जवाब देने के लिए भाजपा से भी नजदीकी बढ़ाने में उन्हें कुछ भी हर्ज नहीं लगा। वैसे भी राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती। पप्पू यादव के भाजपा के प्रति बढ़ते झुकाव के कारण लालू यादव भड़क गये। अप्रैल 2015 में उन्हें दल विरोधी गतिविधियों के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। फिर मई 2015 में उन्हें राजद से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया गया। अगर एक दो चुनावों को छोड़ दिया जाय तो पप्पू यादव 1990 से ही कोसी-सीमांचल में अपनी राजनीतिक पैठ साबित करते रहे हैं। वे लालू यादव के विरोध में चुनाव लड़कर कर कई बार जीत चुके हैं। ताजा उदाहरण 2024 का लोकसभा चुनाव है। पीएम मोदी से दूसरी मुलाकातपप्पू यादव की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से दूसरी मुलाकात 13 अगस्त 2015 को संसद भवन स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई। करीब आधा घंटा तक बातचीत हुई। इस बातचीत के बारे में उन्होंने बताया था, 'मैं प्रधानमंत्री से मिलना चाहता था कि क्योंकि जल्द ही उनकी सहरसा में चुनावी सभा होने वाली है। मैंने उन्हें अपने क्षेत्र की समस्याओं से अवगत कराया। उन्होंने धैर्यपूर्वक मेरी बात सुनी और कई मुद्दों पर त्वरित कार्रवाई का आश्वासन दिया।' इस मुलाकात के बाद कई अटकलें लगायी जाने लगीं। एक चर्चा के मुताबिक, भाजपा का एक खेमा कोसी इलाके में पप्पू यादव के प्रभाव का फायदा उठाना चाहता था। उस समय तारिक अनवर एनसीपी में थे। विधानसभा चुनाव में लालू -नीतीश ने एनसीपी को केवल तीन सीटें दीं थीं। इससे वे नाराज होकर पप्पू यादव के साथ एक मोर्चा बनाना चाहते थे। भाजपा और पप्पू यादव, दोनों को नुकसान2015 के विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा, पप्पू यादव के साथ सीटों का समझौता करता तो, नतीजे कुछ और हो सकते थे। लेकिन भाजपा ने अपनी छवि को ध्यान में रख कर पप्पू यादव से समझौता नहीं किया। चुनाव से ठीक पहले पप्पू यादव ने जन अधिकार पार्टी बनायी। भाजपा से बात नहीं बनने के कारण उन्होंने एनसीपी, समाजवादी पार्टी, समाजवादी जनता दल, समरस समाज पार्टी जैसे दलों से गठबंधन किया। उन्होंने चुनाव में लालू -नीतीश के खिलाफ जमकर प्रचार किया। जन अधिकार पार्टी ने 243 में से कुल 64 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। इस चुनाव में भाजपा को भी बहुत नुकसान हुआ। 2010 में उसकी 91 सीटें थीं, जो अब घट कर 53 रह गयीं। तालमेल नहीं होने से दोनों को नुकसान हुआ।

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