चुनावी बॉन्ड पर सुनवाई: गुमनाम दानकर्ताओं के जरिए चुनावों में पारदर्शिता कैसे होगी संभव-Navbharat Times

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चुनावी बॉन्ड पर सुनवाई: गुमनाम दानकर्ताओं के जरिए चुनावों में पारदर्शिता कैसे होगी संभव via NavbharatTimes LokSabhaElections2019 ElectionsWithTimes SupremeCourt

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में आज चुनावी बॉन्ड को लेकर महत्वपूर्ण सुनवाई है। चुनावी बॉन्ड के रूप में चंदे के तौर पर मिलनेवाली रकम के दानकर्ताओं का नाम गुप्त रहने के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। 2018 में एक मनी बिल में बदलाव कर विदेशी कंपनियों को भी चुनावी बॉन्ड खरीदने की सुविधा दे दी गई है। इसके खिलाफ एनजीओ असोसिएशन ऑफ डैमोक्रेटिक राइट्स और सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन ने याचिका दायर की है। केंद्र सरकार का यह है पक्ष केंद्र सरकार ने गुमनाम रहकर चंदे देने के पक्ष में तर्क दिया है कि चुनावी जिम्मेदारी तय करने के लिहाज से यह ठीक कदम है। केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि चुनाव सुधार और काले धन पर लगाम लगाने के लिए चुनावी बॉन्ड का प्रयोग किया जा रहा है। पढ़ें: चुनाव से संबंधित सभी खबरें पढ़ें एक साथ यहां चुनाव सुधार से जुड़े लोगों की आपत्ति 2018 के वक्त जब यह बिल लाया गया था तो तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि इस प्रक्रिया के तहत चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित करना मुश्किल है। चुनाव आयोग ने कहा था कि जब पार्टी के खर्चों पर कोई लगाम नहीं रहेगी और चुनाव आयोग उनकी निगरानी भी नहीं कर सकेगा। आयोग यह कैसे सुनिश्चित कर सकता है कि चुनाव प्रचार के लिए आई धनराशि ब्लैक मनी नहीं है जबकि दानकर्ता की पहचान भी गुप्त रखी जा रही है। चुनाव आयोग ने विदेशी कंपनियों के चंदा देने की अनुमति और मरनासन्न हालात में जो कंपनियां है उनसे भी चंदा लेने की छूट पर भी आपत्ति दर्ज की थी। चुनाव सुधारकों का कहना है कि पहली नजर में देखकर यही कहा जा सकता है कि अगर सरकार का उद्देश्य चुनावों में काले धन के प्रयोग को रोकना भी है तो यह इस तरह के प्रावधानों के बाद संभव नहीं हो सकेगा। सरकार के विचार और हकीकत में है फासला चुनावी बॉन्ड की शुरुआत 2018 में पार्टियों को कैशलेस डोनेशन के तौर पर की गई। दानकर्ताओं के नाम गुप्त रखे गए ताकि उन्हें राजनीतिक वैमनस्य का सामना न करना पड़े। हालांकि, सरकार के इस तर्क के विरोध का सबसे मजबूत तर्क है कि इन बॉन्ड खरीदारों की पहचान पूरी तरह से गुप्त नहीं है। बॉन्ड खरीदनेवालों के नाम जाहिर नहीं किए जाते, लेकिन बैंक के पास उनके नाम हैं। ऐसे में जिस पार्टी की सरकार है, वह बैंकों के जरिए इन दानकर्ताओं तक पहुंच सकती है और पता लगा सकती है कि उन्होंने किस पार्टी को चंदा दिया। चुनावी बॉन्ड का सबसे अधिक फायदा बीजेपी को चुनावी बॉन्ड के जरिए अब तक सबसे अधिक फायदा बीजेपी को हुआ है। 2017-2018 के आंकड़ों के अनुसार बीजेपी के 210 करोड़ रुपये इन चुनावी बॉन्ड के जरिए मिले हैं। यह लगभग 94.

5% का हिस्सा है। कुल 222 करोड़ के चुनावी बॉन्ड की बिक्री हुई। दानकर्ताओं की पहचान गुप्त रहने के कारण यह नहीं पता है कि बीजेपी को किन लोगों या कंपनियों ने चंदा दिया है।

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