एक ऐसा प्रयोग जिसके बाद 24 घंटे के लिए गायब हुआ समुद्री जहाज, लेकिन जब मिला तो मुर्दा पुतले बन गए थे सैकड़ों लोग KhatarnakScience
का मकसद था, दुश्मन के लड़ाकू विमान से समुद्री जहाजों को बचाना. वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक ऐसी टेक्नॉलॉजी विकसित की जिससे जहाज कुछ देर के लिए बिलकुल 'अदृश्य' हो गया. आज खतरनाक साइंस की सीरीज़ में हम आपको इतिहास में किए गए सबसे रहस्यमयी प्रयोग के बारे में बताएंगे.
हालांकि, अमेरिकी नेवी इसे एक मनगंढ़त कहानी बताकर ऐसे किसी प्रयोग के किए जाने की बात से इनकार करती है. लेकिन, क्या सचमुच ये एक सिर्फ एक कहानी थी या ऐसा सच जिसे दबाया गया? विश्व युद्ध के दौरान नाज़ियों ने समुद्र में मैग्नेटिक माइंस बिछा रखे थे. इन माइंस से जहाजों को बचाने के लिए अमेरिका कई तरह के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा था. समुद्री जहाजों को बचाने के लिए वैज्ञानिक कई तरह के प्रयोग कर रहे थे. इनमें से एक था- फिलाडेल्फिया एक्सपेरिमेंट. इस प्रयोग के लिए वैज्ञानिकों ने सर आइंस्टीन और निकोला टेस्ला के रिसर्च की मदद ली, जो कई सालों से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. इस प्रयोग के लिए वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और रडार वेव्स टेक्नोलॉजी की मदद ली, जिससे समुद्र से जहाज को कुछ देर के लिए गायब किया जा सके. जहाज के अंदर निकोला टेस्ला के ज़ीरो टाइम रेफरेंस जनरेटर का भी इस्तेमाल किया गया. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये तकनीक धरती के मैग्नेटिक फील्ड को लॉक कर देती है, जिसकी वजह से किसी भी ट्रैकिंग डिवाइस से इसे ढूंढ़ पाना मुश्किल था. इससे पहले ये प्रयोग निकोला टेस्ला ने एक छोटे जहाज पर भी किया था, जिसमें उन्हें सफलता भी मिली. लेकिन जब इस प्रयोग को एक बड़े लड़ाकू जहाज पर आजमाने की बारी आई तो वह पीछे हट गए.24 अक्टूबर 1943 में वैज्ञानिकों ने इस एक्सपेरिमेंट को एक लड़ाकू जहाज यूएसएस-एल्ड्रिज पर करने की ठानी. इस प्रयोग को फिलाडेल्फिया डॉकयार्ड पर किया गया. वैज्ञानिकों ने इस जहाज के चारों तरफ कई हजार वोल्ट के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक कॉइल लगा दिए ताकि नाज़ी के बिछाए मैग्नेटिक माइंस को चकमा दिया जा सके. धीरे-धीरे उस जहाज पर लगाए हुए जनरेटर की मदद से बिजली की वोल्टेज बढ़ाई जाने लगी. जैसे ही बिजली साढ़े तीन मिलियन के पार पहुंची तो एक हरे रंग की रौशनी हुई और जहाज पूरी तरह से 'अदृश्य' हो गया. यहां तक कि वह जहाज रडार से भी गायब हो गया. हालांकि, कुछ लोगों का कहना है कि गायब होने के कुछ देर बाद जहाज को वर्जीनिया में देखा गया जहां से वह फिर गायब हो गया.24 घंटो के बाद जहाज दोबारा फिलाडेल्फिया डॉकयार्ड पर दिखा. लेकिन, जब लोग उस जहाज के करीब पहुंचे तो नज़ारा दिल दहला देने वाला था.जहाज में मौजूद ज्यादातार क्रू-मेंबर्स मरे पड़े थे. कुछ उस जहाज की दीवारों में जमे हुए पाए गए थे. साथ ही, जो लोग सही-सलामत थे उनकी दिमागी हालात इतनी खराब हो गई कि वे पागल चुके थे. ऐसा माना जाने लगा कि ये सभी समय की यात्रा करके आए हैं. कुछ लोगों ने इस बात का खुलासा भी किया कि गायब होने के दौरान ये जहाज 1983 के समय में चली गई थी. जहां वो सभी लॉन्ग आईलेंड में बसे एक खुफिया स्थल पर जा पहुंचे थे.दुनियाभर में कई ऐसे लोग हैं जो यह दावा कर चुके हैं कि वो समय की यात्रा करके आये हैं. लेकिन, अभी तक विज्ञान के पास भी ऐसा कोई तर्क या यंत्र नहीं है जो इंसान को किसी दूसरे युग या काल में एक ही समय में ले जाए. हालांकि, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि सर आइंस्टीन की एक थ्योरी टाइम ट्रैवल की गुत्थी सुलझा सकती है.1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक थ्योरी दी थी, जिसका नाम था 'थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी'. इस थ्योरी में समय और गति के बीच के संबंध को समझाया गया था. साथ ही, निकोल्स टेस्ला ने भी ये दावा किया था कि उन्होंने एक ही समय में भूत, भविष्य और वर्तमान देखा है . इसके लिए उन्होंने एक टाइम मशीन भी बनाई थी, जिसमें कथित तौर पर वह सफल भी हुए थे.इस एक्सपेरिमेंट को लेकर पहला खुलासा कार्ल एलेंडे नाम के एक व्यक्ति ने किया था. 1956 में कार्ल एलेंडे ने इस एक्सपेरिमेंट का खुलासा करते हुए एक वैज्ञानिक मौरिस. के. जेसप को 50 खत लिखे. अपनी बातों की सत्यता साबित करने के लिए एलेंडे ने उस खत में दो ऐसे लोगों की नाम का भी जिक्र किया, जो इस घटना के चश्मदीद थे.साथ ही, कॉर्ल ऐलेंडे का ये भी मानना था कि इस एक्सपेरिमेंट में आइंस्टीन की अनफील्ड थ्योरी का इस्तेमाल किया गया था. हालांकि, कार्ल एलेंडे द्वारा किए गए इस दावे को लेकर कोई ठोस सबूत नहीं मिला. जिसके बाद इसे एक मनगढ़ंत कहानी समझकर भूला दिया गया.इसके बाद साल 1983 में एक अमेरिकी नेवल ऑफिसर एल-बीलेक ने ये दावा किया कि वह उस एक्सपेरिमेंट के दौरान उस जहाज पर मौजूद थे और वह समय की यात्रा भी करके आए हैं. उनका दावा था कि वो अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे टाइम ट्रैवल से जुड़े कई प्रोजेक्टस में भी काम कर चुके हैं. जनवरी 1988 में जब ' द फिलाडेल्फिया एक्सपेरिमेंट' नाम की एक फिल्म बनी, तो उनकी याददाश्त वापस आने लगी. इसके साथ ही एल-बीलेक ने अपने कई इंटरव्यू में इस एक्सपेरिमेंट से जुड़े कई दिल दहला देने वाली बातों का भी खुलासा किया. लेकिन, लोगों का मानना था कि एल-बीलेक की बातों में कोई सच्चाई नहीं है, उन्हें एक पागल-सनकी समझा जाने लगा. साल 2011 में उनकी मृत्यु हो गई. फिलाडेल्फिया एक्सपेरिमेंट को लेकर अबतक कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं. नेवल ऑफिसर एल-बीलेक द्वारा किए गए दावों के बाद इसको लेकर जांच भी करवाई गई, लेकिन इस प्रयोग से जुड़े कोई भी दस्तावेज़ या सबूत नहीं मिले. साथ ही, अमेरिकी नेवी ने ये दावा भी किया कि इस तरह का कोई प्रयोग कभी किया ही नहीं गया है. इस घटना के बाद लोगों ने इसे एक मनगढ़त कहानी समझकर भुला दिया. लेकिन, क्या ये सचमुच कोई कहानी थी, या वो सच जिसपर से कभी पर्दा नहीं उठ पाएगा ?ये भी पढ़ें:
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