राजस्थान के कोटा के इटावा कस्बे में 78 वर्षीय रिटायर्ड टीचर अब्दुल शकूर 51 सालों से रामलीला में केवट का किरदार निभा रहे हैं। मुस्लिम होने के बावजूद, उन्होंने गंगा-जमुनी तहजीब का उदाहरण पेश करते हुए, रामलीला में अपनी भूमिका से धार्मिक सौहार्द का संदेश दिया है। वे रामायण की चौपाइयों और भजनों के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते हैं और लोगों को एकता का संदेश देते हैं।
कोटा : राजस्थान के कोटा का दशहरा मेला दुनियाभर में अपनी खास पहचान रखता है। इस शहर के इटावा कस्बे से भारत की पहचान को दुनिया से अलग बनाने वाली कहानी सामने आई है, जो ना सिर्फ गंगा जमुनी तहजीब परपंरा को बताती है, बल्कि मर्यादापुरुषोत्तम राम के प्रति लोगों के सम्मान को भी झलकाती है। दरअसल, कोटा के इटावा कस्बे की रामलीला में केवट का रोल 78 साल के रिटायर्ड टीचर अब्दुल शकूर करते हैं। जिनका आदर्श रामलीला संस्थान इटावा ने रामलीला मंचन के दौरान सम्मान किया है। रिटायर्ड टीचर अब्दुल शकूर भगवान राम के केवट बनते आ रहे हैं। शकूर यहां ना सिर्फ अपने किरदार बल्कि रामायण की चौपाइयां का उच्चारण करके रामलीला में मौजूद श्रद्धालुओं और दर्शकों को मंत्रमुग्धकर देते हैं। 78 के शकूर 51 सालों से बन रहे केवट इटावा में आदर्श रामलीला संस्थान की ओर आयोजित रामलीला मंचन में केवट बने 78 साल के अब्दुल शकूर नाव से भगवान राम को गंगा पार करवाते है। इटावा की रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा जमुनी तहजीब की मिशाल है। रामलीला मंचन में 51 सालों से केवट का पात्र बनते है। अब्दुल शकूर द्वारा केवट के पात्र के मंचन को देखने बड़ी संख्या में लोग आते है और इनके अभिनय को देखकर भाव विभोर हो जाते है। शकूर को लोग यहां केवट चाचा के नाम से भी पुकारते है अब्दुल शकूर का कहना है कि रामलीला में किरदार निभाते हुए उन्हें बहुत अच्छा लगता है। मुस्लिम होने के बाद भी हिन्दूओं की धार्मिक आस्थाओं के केंद्र रामलीला में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे। शकूर को धार्मिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रहे हैं। कई लोग तो उन्हें केवट चाचा के नाम से ही पुकारते हैं। अब्दुल शकूर अपने पात्र के मंचन के दौरान रामायण की चौपाई और भजनों की बड़ी ही मनमोहक प्रस्तुति देते हैं। कस्बे में मुस्लिम और हिन्दू-समुदाय की एकता का एक अनूठा संदेश लोगों तक पंहुच रहा हैं।एक दूसरे के त्यौहारों में खुशी में शामिल हों: अब्दुल शकूर अब्दुल शकूर ने बताया कि कुछ साल पहले दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे, ठीक होने में लंबा समय लगा। 78 साल की उम्र ओर स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बाद भी उन्होंने रामलीला में केवट का पात्र निभाकर लोगों को कौमी एकता का संदेश दिया। अब्दुल शकूर कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग मिलजुल कर रहें। एक दूसरे के त्यौहारों में खुशी के साथ शामिल हों, ताकि हमारा देश प्रगति के पथ पर चलता रहे।.
कोटा: राजस्थान के कोटा का दशहरा मेला दुनियाभर में अपनी खास पहचान रखता है। इस शहर के इटावा कस्बे से भारत की पहचान को दुनिया से अलग बनाने वाली कहानी सामने आई है, जो ना सिर्फ गंगा जमुनी तहजीब परपंरा को बताती है, बल्कि मर्यादापुरुषोत्तम राम के प्रति लोगों के सम्मान को भी झलकाती है। दरअसल, कोटा के इटावा कस्बे की रामलीला में केवट का रोल 78 साल के रिटायर्ड टीचर अब्दुल शकूर करते हैं। जिनका आदर्श रामलीला संस्थान इटावा ने रामलीला मंचन के दौरान सम्मान किया है। रिटायर्ड टीचर अब्दुल शकूर भगवान राम के केवट बनते आ रहे हैं। शकूर यहां ना सिर्फ अपने किरदार बल्कि रामायण की चौपाइयां का उच्चारण करके रामलीला में मौजूद श्रद्धालुओं और दर्शकों को मंत्रमुग्धकर देते हैं। 78 के शकूर 51 सालों से बन रहे केवटइटावा में आदर्श रामलीला संस्थान की ओर आयोजित रामलीला मंचन में केवट बने 78 साल के अब्दुल शकूर नाव से भगवान राम को गंगा पार करवाते है। इटावा की रामलीला सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा जमुनी तहजीब की मिशाल है। रामलीला मंचन में 51 सालों से केवट का पात्र बनते है। अब्दुल शकूर द्वारा केवट के पात्र के मंचन को देखने बड़ी संख्या में लोग आते है और इनके अभिनय को देखकर भाव विभोर हो जाते है। शकूर को लोग यहां केवट चाचा के नाम से भी पुकारते है अब्दुल शकूर का कहना है कि रामलीला में किरदार निभाते हुए उन्हें बहुत अच्छा लगता है। मुस्लिम होने के बाद भी हिन्दूओं की धार्मिक आस्थाओं के केंद्र रामलीला में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे। शकूर को धार्मिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रहे हैं। कई लोग तो उन्हें केवट चाचा के नाम से ही पुकारते हैं। अब्दुल शकूर अपने पात्र के मंचन के दौरान रामायण की चौपाई और भजनों की बड़ी ही मनमोहक प्रस्तुति देते हैं। कस्बे में मुस्लिम और हिन्दू-समुदाय की एकता का एक अनूठा संदेश लोगों तक पंहुच रहा हैं।एक दूसरे के त्यौहारों में खुशी में शामिल हों: अब्दुल शकूरअब्दुल शकूर ने बताया कि कुछ साल पहले दुर्घटना में वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे, ठीक होने में लंबा समय लगा। 78 साल की उम्र ओर स्वास्थ्य ठीक नहीं होने के बाद भी उन्होंने रामलीला में केवट का पात्र निभाकर लोगों को कौमी एकता का संदेश दिया। अब्दुल शकूर कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग मिलजुल कर रहें। एक दूसरे के त्यौहारों में खुशी के साथ शामिल हों, ताकि हमारा देश प्रगति के पथ पर चलता रहे।
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