किसे है किताबों के मेले से भी बैर और क्यों?

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किसे है किताबों के मेले से भी बैर और क्यों?
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उत्तराखंड में ‘संस्कृति’, और ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर जैसी जैसी गतिविधियां चल रही हैं, किताबों से समाज को जोड़ने के प्रयास ‘किताब कौतिक’ पर हमला उनके उसी एजेंडे का विस्तार है।

उत्तराखंड के श्रीनगर शहर में 15-16 फरवरी, 2025 को प्रस्तावित ‘किताब कौतिक’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने नहीं होने दिया। उन्होंने प्रशासन पर दबाव डालकर आयोजन स्थल की पूर्व स्वीकृति रद्द करवा दी। आयोजकों ने तीन-तीन स्थानों पर पुस्तक मेला लगाने की लिखित अनुमति प्राप्त कर ली थी लेकिन तीनों ही जगह अनुमति ‘ऊपरी दबाव’ का उल्लेख करके वापस ले ली गई। किताब कौतिक के पोस्टरों पर ‘संघ’ के लोगों ने उसी स्थल पर अपना ‘विद्यार्थी एकत्रीकरण’ आयोजित करने के स्टिकर तक चिपका दिए। आयोजकों ने विद्यार्थी परिषद और ‘संघ’ के स्थानीय लोगों से बात भी की कि वे अपना आयोजन थोड़ा आगे-पीछे कर लें ताकि किताब कौतिक हो सके लेकिन उन्हें साफ मना कर दिया गया। कहा गया कि आप लोग गांधी, नेहरू आंबेडकर की पुस्तकें और वामपंथी साहित्य बिकवाते हो, आदि-आदि। .

पिछले दो वर्ष में उत्तराखंड के 12 नगरों-कस्बों में किताब कौतिक हो चुके हैं जिसकी शुरुआत दिल्ली में कार्यरत कुछ उत्साही उत्तराखंडी युवकों ने अपनी ‘घर वापसी’ के एक विचार के रूप में शुरू की थी। उन्होंने पहले ‘क्रिएटिव उत्तराखंड’ नाम से एक ग्रुप बनाया और कोरोना काल में सोशल मीडिया पर ‘म्यर पहाड़, म्येरि पछ्याण’ शीर्षक से विविध क्षेत्रों में कार्यरत उत्तराखंड के विशिष्ट व्यक्तियों से अपनी बोली में बातचीत की शुरुआत की। फिर कम चर्चित नगरों-कस्बों में जनता को, विशेष रूप से युवाओं और बच्चों को साहित्य-संस्कृति से जोड़ने के लिए ‘किताब कौतिक’ की योजना बनाई। पहला दो दिवसीय कौतिक दिसंबर 2022 में टनकपुर में आयोजित किया गया जिसमें अपने चुनाव क्षेत्र का दौरा कर रहे उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी शामिल हुए और उन्होंने बड़े उत्साह के साथ घोषणा की थी कि राज्य के प्रत्येक जिले और नगर में किताब कौतिक आयोजित कराए जाएंगे। तब उन्होंने टनकपुर में पुस्तकालय खोलने की भी घोषणा की थी। .टनकपुर जैसे उत्तराखंड के कम चर्चित और छोटे शहर में जनता ने पुस्तक मेले का खूब स्वागत किया। पुस्तक मेले के अतिरिक्त स्कूली बच्चों से विशेषज्ञों की बातचीत, कॅरिअर काउंसलिंग और तड़के ‘नेचर वॉक’ जैसे कार्यक्रम लोकप्रिय हुए। इसकी चर्चा हुई तो कई जगहों से किताब कौतिक लगाने के आग्रह आने लगे। आयोजन समिति के एक प्रमुख सदस्य हेम पंत बताते हैं कि हमारी योजना एक वर्ष में एक या दो किताब कौतिक लगाने की थी, क्योंकि दूर-दराज इलाकों में ऐसे आयोजन करना आसान नहीं होता। किंतु यह इतना लोकप्रिय हुआ कि पिछले दो वर्षों में कुमाऊं के बारह स्थानों पर तीन दिन के किताब कौतिक आयोजित हो चुके हैं। पहले दिन विभिन्न विषय-विशेषज्ञ इलाके के स्कूलों में जाकर विद्यार्थियों से संवाद करते हैं। इसी दौरान स्कूलों में अभिव्यक्ति कार्यशालाएं भी होती हैं, जिसमें छात्र-छात्राएं अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं, अब तक जिसका एक प्रकाशन भी ‘न्योली’ नाम से हो चुका है। बहुत शीघ्र किताब कौतिक की चर्चा ‘जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल’ में भी हो गई। दिल्ली, लखनऊ और अन्य शहरों के अलावा उत्तराखण्ड के रचनाकार भी उसमें शामिल होने लगे। आयोजकों के अनुसार इन कौतिकों में करीब 60 प्रकाशकों की लगभग साठ हजार किताबें उपलब्ध होती हैं। पिथौरागढ़ शहर में पठन-पाठन की रुचि विकसित करने में लगी और पुस्तकालय चलाने वाली, युवाओं की संस्था ‘आरम्भ’ हर कौतिक में पुस्तकों का अपना विशाल संग्रह लेकर शामिल होती है। ‘आरम्भ’ के महेंद्र रावत बताते हैं कि किताब कौतिक ने छोटे-छोटे शहरों में जनता में पुस्तकों के प्रति रुचि विकसित की है और पढ़ने वालों के लिए किताबें उपल्बध कराई हैं। नए-नए लोग, विशेष रूप से युवा व बच्चे, आते हैं और किताबों से जुड़ते हैं, खरीदते भी हैं। ‘आरम्भ’ के ही अभिषेक पुनेठा खुशी व्यक्त करते हैं कि इस बहाने हम कई नए पाठकों तक पहुंचे हैं। ऐसा ही अनुभव रुद्रपुर के नवीन चिलाना का है जो ‘बुक ट्री’ नाम से पुस्तकों की दुकान चलाते हैं। अब तक प्रत्येक किताब कौतिक में अपना स्टाल लगा चुके नवीन बताते हैं कि युवा पीढ़ी का किताबों के प्रति झुकाव देखना सुखद है। किताब कौतिक का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है। .किताबों की उपलब्धता के अलावा, किताब कौतिक में लेखकों, यायावरों, संस्कृतिकर्मियों से बातचीत, विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के व्याख्यान, कॅरिअर उपयोगी सत्र, सांस्कृतिक प्रदर्शन और नेचर वॉक भी होते हैं। इससे विभिन्न रुचियो के लोग कौतिक में आने को उत्सुक होते हैं और किताबों से उनका परिचय बढ़ता है। स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों की भागीदारी बड़ी संख्या में होती है। छोटे शहरों-कस्बों में वैसे भी इस प्रकार के आयोजन दुर्लभ होते हैं। कुमाऊं के बारह स्थानों पर सफलतापूर्वक किताब कौतिक के आयोजन के बाद श्रीनगर का आयोजन गढ़वाल क्षेत्र में पहला ही होना था, जिसे ‘संघ’ और विद्यार्थी परिषद के लोगों ने होने नहीं दिया। इसकी चौतरफा निंदा हुई है। निंदा करने वालों में संघ और भाजपा के समर्थक भी शामिल हैं। किताब कौतिक के विरुद्ध साजिश बड़ी आबादी को नागवार गुजरी है। व्यापक निंदा के बाद फेसबुक पर ‘भारत विचार’, ‘एबीवीपी’ और किसी जसवंत सिंह राणा की एक पोस्ट दिखी, जिसमें लिखा गया है कि “दरअसल इस तथाकथित किताब कौथिक में पूर्व में प्रदर्शित किताबों के शीर्षक वामपंथी विचारधारा से प्रेरित हैं तो कुछ के लेखक इस विचारधारा से ग्रसित।” पोस्ट में जिन दो पुस्तकों का उल्लेख है वे हैं- ‘हिन्दू फासीवाद’ और ‘सावरकर एक विवादित विरासत’। आगे यह भी कहा गया है कि “अभी तक हुए सभी किताब कौथिक कार्यक्रमों में अधिकांश किताबें केवल महात्मा गांधी जी और जवाहर लाल नेहरू जी और उनके महिमामण्डन तक ही सीमित रखी गई हैं।” .यह लेखक स्वयं किताब कौतिकों में शामिल हुआ है। वहां सभी तरह का साहित्य उपलब्ध रहता है- प्रगतिशील, वामपंथी साहित्य से लेकर हिंदू धर्म-संस्कृति के ग्रंथ और दक्षिणपंथी साहित्य भी। आयोजकों का संबंध भी किसी वामपंथी संगठन से नहीं है। आयोजन-प्रमुख हेम पंत एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते हुए अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत की ओर आकृष्ट हुए हैं। उनसे अच्छे सबंध के कारण ही मुख्यमंत्री धामी टनकपुर किताब कौथिक में शामिल हुए थे। सच यह है कि ‘संघ’ और उसके अनुषांगिक संगठनों को पढ़ने-लिखने और मानव विवेक जाग्रत होने से ही बैर है क्योंकि तब मिथ्या प्रचार और अफवाहों के बल पर जनता को कूप-मंडूक नहीं बनाए रखा जा सकता। वे पूरे उत्तराखंड को जिस तरह नफरती विचार से आक्रांत करने में लगे हैं, उसमें किताब कौतिक जैसे आयोजन कैसे पच सकते हैं! हाल में सम्पन्न श्रीनगर के मेयर पद के चुनाव में एक निर्दलीय प्रत्याशी के हाथों बीजेपी प्रत्याशी की पराजय की खिसियाहट तो होगी ही। लेखक वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं।.Google न्यूज़, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ेंप्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia

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