कुमार विश्वास दिल्ली से करीब 45 किलोमीटर दूर हापुड़ जिले के पिलखुआ में रहते हैं। उनके महल जैसे घर का नाम केवी कुटीर है। उन्होंने आज के दौर के बजाय वैदिक परंपरा से घर बनवाना उचित समझा। यही कारण है कि आज उनके घर को लोग देखने के लिए पहुंच रहे हैं। यहां लोगों को प्रकृति का सुकून मिलता...
रामबाबू मित्तल, हापुड: दिल्ली से 45 किलोमीटर दूर सवा घंटे के सफर के बाद हापुड़ के हाईवे पर जब रफ्तार थोड़ी धीमी होती है, तब समझ आता है कि पिलखुआ करीब है। वो कस्बा जो हैंडलूम और प्रिंटिंग उद्योग के लिए पूरे देश में मशहूर रहा है, लेकिन बीते वर्षों में यह जगह एक नई वजह से भी चमकी है। हिन्दी कविता के लोकप्रिय कवि, वक्ता और लेखक डॉ.
कुमार विश्वास का शांत, धीर, देसी-सुगंध वाला निवास केवी कुटीर के नाम से भी प्रसिद्ध होने लगा।एक सामान्य रास्ते से असाधारण दुनिया तकसुबह की गरमाहट लिए सूरज जब पिलखुआ की गलियों को छूता है, तो दूर एक सादी-सी कोठी दिखाई देती है। न कोई भारी गेट, न कोई बनावटी चमक। पेड़ों की कतारें और हरियाली के बीच खड़ा है केवी कुटीर एक घर, जिसे देखकर लगता है कि मानो किसी कवि ने अपने शब्दों को ईंटों की जगह लगाकर यह रूप दिया हो।गाजियाबाद में रहने वाले कुमार विश्वास अपने पैतृक गांव पिलखुआ में इस घर को बनवाने का सपना कई सालों से देखते रहे, पर यह सपना सीमेंट, कंक्रीट और आयरन से पूरा नहीं हुआ। उन्होंने चुनी प्राचीन भारतीय निर्माण परंपरा, जिसे आज की भाषा में वैदिक प्लास्टर कहा जाता है।सीमेंट नहीं मिट्टी, आंवला, गूलर और दालों से बना घरकेवी कुटीर का सबसे अनोखा हिस्सा उसका निर्माण है। यह घर सीमेंट-बजरी से नहीं, बल्कि पीली मिट्टी, गेहूं-दालों की चूनी, गोबर, चूना, रेत और आंवला, गूलर, शीशम जैसे पेड़ों के अवशेषों से तैयार हुआ है। यह वही तकनीक है, जिससे सदियों पहले भारत में घर बनते थे प्राकृतिक, एंटी-बैक्टीरियल और तापमान नियंत्रित। गर्मियों की तीखी धूप में भी यह घर बाहर की गर्मी को भीतर आने नहीं देता। कुमार विश्वास की माने तो उन्हें इस विचार की प्रेरणा E.B. Howell की एक पुरानी किताब से मिली, जिसमें इस तरह के घरों का ज़िक्र था। पढ़ते ही उन्होंने मन बना लिया घर तो ऐसा ही होगा, जो प्रकृति के करीब हो।लाइब्रेरी, स्टूडियो और शब्दों का शांत आश्रयकेवी कुटीर केवल रहने की जगह नहीं। यह वह जगह है, जहां किताबें सांस लेती हैं, शब्द गूंजते हैं और रचनात्मकता दरवाज़ा खटखटाए बिना भीतर आ जाती है। घर में एक विशाल लाइब्रेरी है, दीवार भर किताबें, बीच में शांत बैठने की जगह और वह मेज जहां कई रचनाएं जन्म लेती हैं। इसके साथ एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो भी बनाया गया है, जहां वे गीत, कविताएं और अपने शो के लिए रिकॉर्डिंग करते हैं। देशभर के लेखक, कवि और विद्यार्थी अक्सर यहां आते हैं सिर्फ मिलने नहीं, बल्कि उस वातावरण को महसूस करने, जहां शब्द सहज रूप से बहते हैं।प्रकृति की गोद में बसा पूरा संसारघर के सामने एक छोटा-सा तालाब है, जिसमें बतखें तैरती दिख जाती हैं। लॉन में औषधीय पौधे, किनारों पर फलदार पेड़ और पीछे की ओर एक छोटी जैविक खेती गन्ना से लेकर लौकी-तोरई तक। कुमार विश्वास की मानें तो वो शांत स्वभाव का व्यक्ति हैं, प्रकृति से जुड़कर ही खुद को पूरा महसूस करते हैं, इसलिए वे शहर के मुकाबले अपना ज़्यादा समय इसी कुटीर में बिताते हैं, जहां न भीड़ है, न शोर, सिर्फ हवा और शब्दों का संगीत।केवी कुटीर: घर से अधिक एक दर्शनस्थानीय लोग कहते हैं कि पिलखुआ के बीच यह कोठी उस सोच की पहचान है, जो कहती है जड़ों से जुड़े रहो, अपनी मिट्टी से प्रेम करो और अपनी दुनिया को खुद गढ़ो। यह कुटीर एक घर नहीं, एक विचार है एक संदेश कि आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ रह सकती हैं और शायद इसी वजह से केवी कुटीर सिर्फ कुमार विश्वास का घर नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए एक तीर्थ-स्थली बन चुका है।
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