आडवाणी: दो सांसदों वाली पार्टी को पहुंचाया बुलंदियों पर, आज बन गए इतिहास - Amarujala

United States News News

आडवाणी: दो सांसदों वाली पार्टी को पहुंचाया बुलंदियों पर, आज बन गए इतिहास - Amarujala
United States Latest News,United States Headlines
  • 📰 Amar Ujala
  • ⏱ Reading Time:
  • 210 sec. here
  • 5 min. at publisher
  • 📊 Quality Score:
  • News: 87%
  • Publisher: 51%

आडवाणी: दो सांसदों वाली पार्टी को पहुंचाया बुलंदियों पर, आज बन गए इतिहास 2019LokSabhaelections LokSabha BJPFirstList LKAdvani Gandhinagar PMModi BJPKilist2019

जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है। जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है।.

जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है। जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है।

We have summarized this news so that you can read it quickly. If you are interested in the news, you can read the full text here. Read more:

Amar Ujala /  🏆 12. in İN

 

United States Latest News, United States Headlines

Similar News:You can also read news stories similar to this one that we have collected from other news sources.

दो दिन में कांग्रेस को दूसरा झटका, शशि थरूर के चाचा-चाची भाजपा में शामिलदो दिन में कांग्रेस को दूसरा झटका, शशि थरूर के चाचा-चाची भाजपा में शामिलथरूर की चाची शोभना शशिकुमार और उनके पति शशिकुमार ने कहा कि वे लंबे वक्त से भाजपा के समर्थक रहे हैं।
Read more »

राजस्थान के बीजेपी नेता देवी सिंह भाटी ने दिया इस्तीफा, मेधवाल को बताया कांग्रेस एजेंटराजस्थान के बीजेपी नेता देवी सिंह भाटी ने दिया इस्तीफा, मेधवाल को बताया कांग्रेस एजेंटभारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता देवी सिंह भाटी ने शुक्रवार को पार्टी से इस्तीफा दे दिया. उन्होंने बीकानेर से मौजूदा सांसद और केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को टिकट नहीं देने की मांग को लेकर इस्तीफा दिया है.
Read more »

भाजपा की आज अहम बैठक, पहले दौर के उम्मीदवारों के नामों पर लग सकती है मुहर- Amarujalaभाजपा की आज अहम बैठक, पहले दौर के उम्मीदवारों के नामों पर लग सकती है मुहर- Amarujalaभाजपा की आज अहम बैठक, पहले दौर के उम्मीदवारों के नामों पर लग सकती है मुहर narendramodi AmitShah BJPLive Elections2019 LokSabhaElection2019
Read more »

BJP को दी नई पहचान तो मंत्री को 'ईनाम', कहा- कोई भी सीट चुन लोBJP को दी नई पहचान तो मंत्री को 'ईनाम', कहा- कोई भी सीट चुन लोLok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): असम बीजेपी चीफ ने इस बारे में कहा,'पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने मुझसे कहा था कि वह चाहते हैं कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए हेमंत देश में कोई भी संसदीय सीट चुन सकते हैं। मैंने फौरन इसके जवाब में कहा कि यह कमाल का निर्णय है।'
Read more »

भारत की पाकिस्तान को दो टूक- आतंकवाद पर सख्त तो दाऊद, सलाउद्दीन को सौंपेभारत की पाकिस्तान को दो टूक- आतंकवाद पर सख्त तो दाऊद, सलाउद्दीन को सौंपेभारत ने पाकिस्तान को कड़ा संदेश देते हुए कहा है कि अगर वो सच में आतंकवाद को लेकर गम्भीर है तो उसे दाऊद इब्राहिम और सैयद सलाउद्दीन को भारत को सौंप देना चाहिए.
Read more »

तमिलनाडु में AIDMK-DMK ने जारी किया घोषणापत्र, किए गए बड़े ऐलानतमिलनाडु में AIDMK-DMK ने जारी किया घोषणापत्र, किए गए बड़े ऐलानतमिलनाडु में कांग्रेस की साथी डीएमके ने मंगलवार को अपना घोषणापत्र जारी किया. डीएमके ने वादा किया है कि वह NEET परीक्षा को खत्म कर देगी.
Read more »

शिवपाल यादव की पार्टी और पीस पार्टी में हुआ गठबंधन, अपना दल का भी मिला साथशिवपाल यादव की पार्टी और पीस पार्टी में हुआ गठबंधन, अपना दल का भी मिला साथउत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के लिए प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) और पीस पार्टी के बीच मंगलवार को गठबंधन हो गया. इसकी घोषणा प्रसपा प्रमुख शिवपाल यादव व पीस पार्टी प्रमुख डॉ. अय्यूब ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेस के जरिए की. इस दौरान प्रसपा प्रमुख शिवपाल यादव ने कहा कि भाजपा को हराने के लिए हम सभी सेकुलर दलों से गठबंधन करने को तैयार थे, लेकिन कई दलों ने अपने निजी स्वार्थ के चलते गठबंधन से मना कर दिया.
Read more »

अरुणाचल में BJP को बड़ा झटका, दो मंत्रियों सहित 12 विधायकों ने छोड़ी पार्टी– News18 हिंदीअरुणाचल में BJP को बड़ा झटका, दो मंत्रियों सहित 12 विधायकों ने छोड़ी पार्टी– News18 हिंदीराज्य की 60 विधानसभा सीटों में से 54 के लिए प्रत्याशियों के नामों पर बीजेपी के संसदीय बोर्ड ने रविवार को मुहर लगाई. राज्य में 11 अप्रैल को लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं.
Read more »

अरुणाचल में BJP दो फाड़, ऐसे पूर्वोत्तर में बढ़ा पार्टी का संकटअरुणाचल में BJP दो फाड़, ऐसे पूर्वोत्तर में बढ़ा पार्टी का संकट2014 में हुए आम चुनाव में बीजेपी ने नॉर्थ ईस्ट में काफी अच्छा प्रदर्शन किया था. पीएम मोदी ने आते ही एक्ट ईस्ट पॉलिसी का नारा दिया था. इसी का परिणाम था कि यहां कांग्रेस के आखिरी किले मिजोरम को भी बीजेपी ने 2018 के चुनाव में ढहा दिया. लेकिन इसके बाद के कुछ घटनाक्रम ऐसे हुए, जिनसे लग रहा है कि यहां बीजेपी की पकड़ कमजोर होती जा रही और क्षेत्रीय दल मजबूत हो रहे हैं.
Read more »



Render Time: 2026-04-01 22:50:20