आडवाणी: दो सांसदों वाली पार्टी को पहुंचाया बुलंदियों पर, आज बन गए इतिहास 2019LokSabhaelections LokSabha BJPFirstList LKAdvani Gandhinagar PMModi BJPKilist2019
जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है। जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है।.
जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है। जाता है तो वह हैं राजनीति के लौहपुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। भाजपा के उफान में उनका योगदान सबसे ज्यादा रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के जरिए आडवाणी ने पूरे देश में भाजपा को एक अलग पहचान दिलाई थी। यहीं से भाजपा ने मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ाने शुरू किए और फिर एक दिन वह कांग्रेस को चुनौती देने वाली प्रमुख पार्टी में तब्दील हो गई।8 नवंबर 1927 को आडवाणी कराची में पैदा हुए थे। यानि अब वह 91 साल के हैं बावजूद राजनीति में पूरी तरह सक्रिय नजर आते हैं। उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के सहायक के तौर जनसंघ में राजनीति का कामकाज देखना शुरू किया था। 1977 में बनी जनता पार्टी की सरकार में सूचना एवं प्रसारण मंत्री बने थे। अटल के साथ आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी ने भाजपा का गठन किया था।आडवाणी का नाम आज चर्चा में है क्योंकि वह पहली बार गुजरात के गांधीनगर की अपनी परंपरागत सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। उन्हें गांधीनगर से इस बार टिकट नहीं मिला है। वह लगातार छह बार यहां से जीतकर संसद पहुंचते रहे हैं। आइए नजर डालते हैं आडवाणी के राजनीतिक सफरनामे पर। आडवाणी की राजनीतिक यात्रा में गांधीनगर का सबसे अहम योगदान है। वह पहली बार राज्यसभा सांसद बने थे। 1970 से लेकर 1989 तक 19 साल वह राज्यसभा से ही चुने जाते रहे। नौंवीं लोकसभा में 1989 में उन्होंने पहली बार नई दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीता। 1991 में 10वीं लोकसभा में उन्होंने गुजरात के गांधीनगर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। जैन हवाला कांड में नाम आने के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने 1996 में चुनाव नहीं लड़ने फैसला करते हुए एलान किया कि जब तक कि हवाला कांड से नाम नहीं हट जाता चुनाव लड़ेंगे। क्लीन चिट मिलने के बाद 1998 में गांधीनगर से चुनाव जीतकर फिर संसद पहुंचे। इसके बाद से 19 साल तक वह इसी सीट से जीतकर संसद पहुंचते रहे। आडवाणी ने इसके बाद 1999, 2004, 2009, और 2014 में लोकसभा चुनाव जीता। इस समय वह सातवीं बार लोकसभा सांसद के रूप में सक्रिय हैं। इनमें से छह बार वह गांधीनगर से सांसद चुने गए। 90 के दशक का नारा था- भाजपा की तीन धरोहर, अटल,आडवाणी, मुरली मनोहर। आडवाणी ने राजनीतिक जीवन में हमेशा परिवारवाद का विरोध किया। बेटा, बेटी दोनों राजनीति में नहीं हैं। आडवाणी ने उनकी एंट्री नहीं कराई। कभी कहा जाता था कि भाजपा का संगठन आडवाणी की मुटठी में है और अब 91 साल के आडवाणी का इस तरह से राजनीतिक जीवन से संन्यास का रास्ता आगे बढ़ रहा है।
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