अफगानिस्तान: क्या 4 साल बाद भी अलग-थलग पड़ा हुआ है तालिबान?

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अफगानिस्तान: क्या 4 साल बाद भी अलग-थलग पड़ा हुआ है तालिबान?
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अफगानिस्तान में चार साल पहले तालिबान की सत्ता में दोबारा वापसी हुई थी. हालांकि देश अभी भी भीषण मानवीय संकट से जूझ रहा है, लेकिन चरमपंथियों ने अपने फायदे के लिए इस संकट को इस्तेमाल करने का तरीका खोज लिया है.

जब तालिबान अगस्त 2021 में अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हुआ, उसके बाद से जर्मनी ने दो बार अफगान नागरिकों को वापस भेजा हैअगस्त 2021 में अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस बुला ली थी. सेना के हटने के तुरंत बाद, काबुल की तत्कालीन सरकार गिर गई और सत्ता में तालिबान की वापसी हो गई.

चार साल बाद, अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान की पकड़ बहुत मजबूत लग रही है. वास्तव में, इतनी मजबूत कि जर्मनी सहित कुछ सरकारें, काबुल की मौजूदा सरकार के साथ चुपके से संबंध स्थापित कर रही है. जुलाई की शुरुआत में रूस तालिबान को आधिकारिक रूप से मान्यता देने वाला पहला देश बन गया. पेरिस स्थित इनाल्को यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर शोध करने वाले सरदार रहीमी कहते हैं,"चार साल पहले अमेरिका ने अपनी सेना हटाकर अफगानिस्तान में अपनी भूमिका खत्म कर दी थी. अब रूस उसी खाली जगह को भर रहा है और अफगानिस्तान में अमेरिका की भूमिका निभा रहा है.”चीन भी तालिबान सरकार के साथ घनिष्ठ आर्थिक और राजनीतिक संबंध बनाए हुए है. चीन ने तालिबान सरकार को आधिकारिक तौर पर मान्यता नहीं दी है, लेकिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जनवरी 2024 में राजनयिक प्रोटोकॉल के तहत निर्धारित पूरे सम्मान के साथ तालिबानी राजदूत के परिचय पत्रों को स्वीकार किया. दरअसल, चीन को अपनी वैश्विक बुनियादी ढांचा परियोजना ‘बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव ' के लिए अफगानिस्तान और वहां मौजूद कच्चे माल की जरूरत है. रहीमी के मुताबिक, पश्चिमी देशों को इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि अफगानिस्तान में सार्वजनिक जीवन के हर पहलू पर तालिबान का नियंत्रण है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया,"यही चीज अन्य देशों और तालिबान सरकार के बीच संबंधों की नींव भी है.”जब तालिबान अगस्त 2021 में अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हुआ, उसके बाद से जर्मनी ने दो बार अफगान नागरिकों को वापस भेजा है. इन दो उड़ानों में 109 लोगों को भेजा गया, जिनमें आधे से ज्यादा अपराधी थे. इसके लिए तालिबान के अधिकारियों को यह साबित करना होता है कि ये लोग अफगानिस्तान के नागरिक हैं. ऐसा करने के लिए उन्हें पासपोर्ट या कोई दूसरा यात्रा दस्तावेज देना होता है. इस वजह से, जर्मन अधिकारियों को तालिबान सरकार से खुलकर बात करनी पड़ रही है. जुलाई में जर्मन विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने पुष्टि की थी कि तालिबान के साथ तकनीकी स्तर पर बातचीत हुई. रेडाक्त्स्योन नेत्सवेर्क मीडिया समूह से बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से व्यावहारिक मामला है, इसके कोई राजनीतिक या कानूनी निहितार्थ नहीं हैं.उस समय उन्होंने कहा था,"जर्मन सरकार को कई ऐसी सरकारों के साथ बातचीत करनी पड़ती है जिनके विचारों और कार्यों को हम स्वीकार नहीं करते. फिर भी, कभी-कभी अपने फायदे के लिए हमें उनसे संपर्क बनाए रखना पड़ता है. इसके बिना काम नहीं चल सकता.” प्रो असाइल जैसे मानवाधिकार समूह निर्वासन उड़ानों यानी लोगों को वापस उनके देश भेजे जाने की कड़ी निंदा करते हैं और इसे ‘अंतरराष्ट्रीय कानूनों का गंभीर उल्लंघन' बताते हैं. यूरोपीय कन्वेंशन ऑन ह्यूमन राइट्स नाम की एक अंतरराष्ट्रीय संधि के मुताबिक, ऐसे किसी भी देश में किसी व्यक्ति को वापस नहीं भेजा जा सकता जहां उसके साथ अमानवीय व्यवहार का खतरा हो.यूरोप से जितने अफगान लोगों को वापस भेजा गया है, उसकी तुलना में ईरान और पाकिस्तान ने कहीं ज्यादा अफगान नागरिकों को वापस उनके देश भेजा है. संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी ‘यूएनएचसीआर' के मुताबिक, 2025 के पहले सात महीनों में ही इन दोनों देशों से 21 लाख से ज्यादा अफगानियों को निर्वासित किया गया है, यानी उन्हें वापस उनके देश भेजा गया है. एजेंसी के मुताबिक, इनमें से आधे लोगों को उनकी इच्छा के विपरीत जबरन उनके देश भेजा गया है. वापस लौटने वाले अफगानियों की भारी संख्या तालिबान सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि इनके पास अब न तो रहने को घर है, न ही कोई काम है और न ही कमाई का कोई साधन. हालांकि, यह मानवीय आपदा तालिबान के लिए फायदेमंद साबित हो रही है. वह इस स्थिति का इस्तेमाल अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कर रहा है. उसे लगता है कि पश्चिमी देश उससे बात करके अपना अपमान करवा रहे हैं. तालिबान के बीच यह धारणा बन रही है कि पश्चिमी देश उसके सामने झुक रहे हैं.स्वतंत्र निगरानी समूहों की रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान में मानवाधिकारों का लगातार और व्यवस्थित तरीके से उल्लंघन हो रहा है. पूर्व अफगान राजनयिक शुक्रिया बरकजई का कहना है कि खास तौर पर महिलाओं के अधिकारों को सौदेबाजी के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया,"तालिबान महिलाओं का इस्तेमाल अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए करता है. वे अपने शासन को वैध ठहराने के लिए महिलाओं पर नए प्रतिबंध लगाकर उन पर दबाव बढ़ाते हैं.” तालिबान के कब्जे के बाद से अफगानिस्तान में महिलाओं की सार्वजनिक जिंदगी लगभग पूरी तरह खत्म हो गई है. 12 साल और उससे ज्यादा उम्र की लगभग 14 लाख लड़कियों को अब स्कूल जाने की अनुमति नहीं है. हाई स्कूलों और विश्वविद्यालयों में युवतियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. मानवाधिकार संगठनों को यह साफ दिख रहा है कि पूरे देश में महिलाएं और लड़कियां लैंगिक हिंसा से जूझ रही हैं. साथ ही, सरकार के आलोचकों और पत्रकारों को इस्लामी शासन से उत्पीड़न का डर महसूस होने लगा है.रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के मुताबिक, 2024 में कम से कम 12 पत्रकारों को गोली मारी गई. तालिबान मीडिया संस्थानों पर छापे मारने, मीडिया कर्मचारियों को हिरासत में लेने, उन पर अत्याचार करने और उनकी रिपोर्टों को सेंसर करने के लिए जाना जाता है. प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में यह देश 180 देशों में 175वें स्थान पर है.यूरोपीय संघ के आंकड़ों के मुताबिक, अफगानिस्तान में इतनी ज्यादा गरीबी है कि करीब 2.3 करोड़ लोग विदेशी सहायता पर आश्रित हैं. यह देश की लगभग आधी आबादी है. संयुक्त राष्ट्र के विश्व खाद्य कार्यक्रम का अनुमान है कि हर चौथा अफगानी नागरिक भोजन की कमी से जूझ रहा है. हर तीसरा बच्चा कुपोषित है. पिछले महीने मानवीय संकट तब और बढ़ गया जब अमेरिका ने यूएनएड को भंग कर दिया. इससे 30 लाख लोगों को चिकित्सा सेवा से वंचित होना पड़ा और 420 क्लीनिक बंद हो गए. जर्मनी ने 2021 से अफगानिस्तान को 55.1 करोड़ यूरो यानी 64.4 करोड़ डॉलर दिए हैं. जर्मनी के आर्थिक विकास और सहयोग मंत्रालय के मुताबिक, यह फंड सीधे तालिबान सरकार को नहीं दिया गया है. इसके बजाय यह पैसा विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों और गैर-सरकारी संगठनों को भेजा गया है, ताकि यह पक्का हो सके कि फंड का इस्तेमाल सही जगह पर हो और तालिबान का इस पर कोई नियंत्रण न हो. हालांकि, नई जर्मन सरकार ने 2021 से पहले अफगानिस्तान में जर्मनी के लिए काम करने वाले अफगानों के लिए पुनर्वास कार्यक्रम रोक दिया है. इनमें से करीब 2,400 लोगों को जर्मनी में बसने की अनुमति तो मिल चुकी है, लेकिन उन्हें यात्रा के लिए आवश्यक वीजा नहीं मिल पा रहा है. नतीजतन, वे कानूनी पचड़े में फंसे हुए हैं. ईरान या पाकिस्तान में रहने को मजबूर हैं, जहां से उन्हें निर्वासित किए जाने का खतरा बना हुआ है. जुलाई की शुरुआत में, बर्लिन की एक अदालत ने फैसला सुनाया कि एक अफगान महिला और उसके परिवार को पाकिस्तान में एक साल से ज्यादा समय तक इंतजार करने के बाद जर्मन वीजा दिया जाना चाहिए. जर्मन जज के मुताबिक, अफगानों को पाकिस्तान में ‘जान-माल का खतरा' है. हालांकि, जर्मन सरकार ने इस आदेश का पालन करने से इनकार कर दिया है और इसके बजाय एक ऊपरी अदालत से इस फैसले की समीक्षा करने का अनुरोध किया है.

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