Teacher Day: जिस लड़के को पुजारी बनाना चाहते थे पिता, वो बना देश का सबसे महान शिक्षक... और फिर राष्ट्रपति

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Teacher Day: जिस लड़के को पुजारी बनाना चाहते थे पिता, वो बना देश का सबसे महान शिक्षक... और फिर राष्ट्रपति
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About Sarvepalli Radhakrishnan in Hindi: डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन कौन थे? 5 सितंबर को उनके जन्मदिन पर शिक्षक दिवस क्यों मनाते हैं? कैसा था उनका जीवन? पढ़िए राधाकृष्णन की कहानी।

ये कहानी है एक महान शिक्षक की। भारत के दूसरे राष्ट्रपति की। देश के सबसे प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक की। उस बच्चे की जिसे उसके पिता इंग्लिश न पढ़ाकर पुजारी बनाना चाहते थे, लेकिन वो खूब पढ़ना चाहता था। बस आगे बढ़ना चाहता था। उस छात्र की जिसे खुद फिलॉसफी ने चुना। उस लड़के की जिसकी शादी 16 साल की उम्र में ही कर दी गई। ये कहानी है डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की।राधाकृष्णन का जन्म और शुरुआती जीवन राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतानी में हुआ था। ये जगह वर्तमान के चेन्नई शहर से करीब 64 किमी दूर है। वो एक मध्यम वर्गीय तेलुगु ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। जहां उनके पिता एक स्थानीय जमींदार के यहां राजस्व देखने का काम करते थे। वो नहीं चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजी पढ़े। बल्कि वो तो उसे एक पुजारी बनाना चाहते थे। लेकिन राधाकृष्णन ने पढ़ना नहीं छोड़ा। सर्वपल्ली राधाकृष्णन की शिक्षा उनकी प्राथमिक शिक्षा भी Tirutani के प्राइमरी बोर्ड हाई स्कूल से हुई थी। फिर 1896 में वो तिरुपति के Hermansburg Evangelical Lutheran Mission School चले गए। हायर एजुकेशन के लिए उन्होंने पहले वूरी कॉलेज वेल्लौर में दाखिला लिया था। लेकिन फिर 17 साल की उम्र में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज चले गए। 1906 में वहीं से फिलॉसफी में मास्टर डिग्री ली। सर्वपल्ली सिर्फ 20 साल के थे जब उनकी एमए थीसिस प्रकाशित हुई थी। पूरी एकेडेमिक लाइफ में उन्हें ढेरों स्कॉलरशिप्स मिलीं।Philosophy से राधाकृष्णन का नाता फिलॉसफी में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का काम अतुलनीय रहा है। लेकिन ये विषय उनकी पहली पसंद नहीं था। ओडिशा सरकार की ओडिशा रिव्यू मैगजीन में छपे लेख के अनुसार, इस सब्जेक्ट से उन्हें किस्मत ने जोड़ा। उस वक्त राधाकृष्णन आर्थिक रूप से मजबूत नहीं थे। इसलिए जब उनके एक कजिन ने उसी कॉलेज से पढ़ाई पूरी की तो अपनी किताबें सर्वपल्ली को दे दी। ये फिलॉसफी की किताबें थीं, क्योंकि कजिन ने उसी विषय की पढ़ाई की थी। तभी राधाकृष्णन ने फिलॉसफी की पढ़ाई करने का फैसला किया था।Sarvapalli Radhakrishnan: 16 साल में शादी, 6 बच्चे ​ओडिशा रिव्यू मैगजीन के अनुसार, वर्ष 1904 में राधाकृष्णन की शादी उनकी दूर की कजिन शिवकामु से कर दी गई। तब वो 16 साल के थे। उनके 6 बच्चे हुए- 5 बेटियां और एक बेटा। उनके बेटे का नाम सर्वपल्ली गोपाल था। वो भी एक जाने माने इतिहासकार रहे हैं।सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक टीचर के रूप में 1918 में राधाकृष्णन को मैसूर यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी का प्रोफेसर नियुक्त किया गया था। तब तक वो ढेरों लेख और जर्नल्स लिख चुके थे। अपनी पहली किताब 'द फिलॉसफी ऑफ रबींद्रनाथ टैगोर' भी पूरी कर ली थी। दो साल बाद 1921 में वो कलकत्ता यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी के प्रोफेसर बने। यहां से उनके विदेश जाने का रास्ता खुला। 1929 में उन्हें मैनचेस्टर कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में खाली पद पर बुलाया गया। उन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स को लेक्चर देने का मौका मिला। अपनी उपलब्धियों से इतर वो अपने पढ़ाने और सिखाने के तरीकों के लिए अपने छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय थे।नाम से बड़ा स्वाभिमान शिक्षा में उनके योगदान के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1931 में उन्हें नाइटहुड दिया। लेकिन उन्होंने कभी भी अपने नाम में 'सर' टाइटल का प्रयोग नहीं किया। बल्कि नाम में 'डॉक्टर' लगाने को प्राथमिकता दी। 1931 से 1936 तक वो आंध्र यूनिवर्सिटी के वीसी रहे। 1939 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने उन्हें उनके बाद बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के कुलपति बनने का आमंत्रण दिया। राधाकृष्णव 1948 तक बीएचयू के वीसी रहे। भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन 1947 में जब भारत आजाद हुआ, डॉ राधाकृष्णन ने यूनेस्को में देश का प्रतिनिधित्व किया। बाद में सोवियत यूनियन में भारत के राजदूत रहे। संविधान सभा के लिए भी चुने गए। 1952 में डॉ राधाकृष्णन को भारत के उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया। फिर 1962 में वो देश के दूसरे राष्ट्रपति बने। एक शिक्षाविद् का इस पद पर आसीन होना देश के लोकतंत्र के लिए गौरव की बात थी। वो चाहते थे कि उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए।.

ये कहानी है एक महान शिक्षक की। भारत के दूसरे राष्ट्रपति की। देश के सबसे प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक की। उस बच्चे की जिसे उसके पिता इंग्लिश न पढ़ाकर पुजारी बनाना चाहते थे, लेकिन वो खूब पढ़ना चाहता था। बस आगे बढ़ना चाहता था। उस छात्र की जिसे खुद फिलॉसफी ने चुना। उस लड़के की जिसकी शादी 16 साल की उम्र में ही कर दी गई। ये कहानी है डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की।राधाकृष्णन का जन्म और शुरुआती जीवन राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुतानी में हुआ था। ये जगह वर्तमान के चेन्नई शहर से करीब 64 किमी दूर है। वो एक मध्यम वर्गीय तेलुगु ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। जहां उनके पिता एक स्थानीय जमींदार के यहां राजस्व देखने का काम करते थे। वो नहीं चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजी पढ़े। बल्कि वो तो उसे एक पुजारी बनाना चाहते थे। लेकिन राधाकृष्णन ने पढ़ना नहीं छोड़ा। सर्वपल्ली राधाकृष्णन की शिक्षा उनकी प्राथमिक शिक्षा भी Tirutani के प्राइमरी बोर्ड हाई स्कूल से हुई थी। फिर 1896 में वो तिरुपति के Hermansburg Evangelical Lutheran Mission School चले गए। हायर एजुकेशन के लिए उन्होंने पहले वूरी कॉलेज वेल्लौर में दाखिला लिया था। लेकिन फिर 17 साल की उम्र में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज चले गए। 1906 में वहीं से फिलॉसफी में मास्टर डिग्री ली। सर्वपल्ली सिर्फ 20 साल के थे जब उनकी एमए थीसिस प्रकाशित हुई थी। पूरी एकेडेमिक लाइफ में उन्हें ढेरों स्कॉलरशिप्स मिलीं।Philosophy से राधाकृष्णन का नाता फिलॉसफी में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का काम अतुलनीय रहा है। लेकिन ये विषय उनकी पहली पसंद नहीं था। ओडिशा सरकार की ओडिशा रिव्यू मैगजीन में छपे लेख के अनुसार, इस सब्जेक्ट से उन्हें किस्मत ने जोड़ा। उस वक्त राधाकृष्णन आर्थिक रूप से मजबूत नहीं थे। इसलिए जब उनके एक कजिन ने उसी कॉलेज से पढ़ाई पूरी की तो अपनी किताबें सर्वपल्ली को दे दी। ये फिलॉसफी की किताबें थीं, क्योंकि कजिन ने उसी विषय की पढ़ाई की थी। तभी राधाकृष्णन ने फिलॉसफी की पढ़ाई करने का फैसला किया था।Sarvapalli Radhakrishnan: 16 साल में शादी, 6 बच्चे ​ओडिशा रिव्यू मैगजीन के अनुसार, वर्ष 1904 में राधाकृष्णन की शादी उनकी दूर की कजिन शिवकामु से कर दी गई। तब वो 16 साल के थे। उनके 6 बच्चे हुए- 5 बेटियां और एक बेटा। उनके बेटे का नाम सर्वपल्ली गोपाल था। वो भी एक जाने माने इतिहासकार रहे हैं।सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक टीचर के रूप में 1918 में राधाकृष्णन को मैसूर यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी का प्रोफेसर नियुक्त किया गया था। तब तक वो ढेरों लेख और जर्नल्स लिख चुके थे। अपनी पहली किताब 'द फिलॉसफी ऑफ रबींद्रनाथ टैगोर' भी पूरी कर ली थी। दो साल बाद 1921 में वो कलकत्ता यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी के प्रोफेसर बने। यहां से उनके विदेश जाने का रास्ता खुला। 1929 में उन्हें मैनचेस्टर कॉलेज, ऑक्सफोर्ड में खाली पद पर बुलाया गया। उन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में स्टूडेंट्स को लेक्चर देने का मौका मिला। अपनी उपलब्धियों से इतर वो अपने पढ़ाने और सिखाने के तरीकों के लिए अपने छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय थे।नाम से बड़ा स्वाभिमान शिक्षा में उनके योगदान के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1931 में उन्हें नाइटहुड दिया। लेकिन उन्होंने कभी भी अपने नाम में 'सर' टाइटल का प्रयोग नहीं किया। बल्कि नाम में 'डॉक्टर' लगाने को प्राथमिकता दी। 1931 से 1936 तक वो आंध्र यूनिवर्सिटी के वीसी रहे। 1939 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने उन्हें उनके बाद बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के कुलपति बनने का आमंत्रण दिया। राधाकृष्णव 1948 तक बीएचयू के वीसी रहे। भारत के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन 1947 में जब भारत आजाद हुआ, डॉ राधाकृष्णन ने यूनेस्को में देश का प्रतिनिधित्व किया। बाद में सोवियत यूनियन में भारत के राजदूत रहे। संविधान सभा के लिए भी चुने गए। 1952 में डॉ राधाकृष्णन को भारत के उप-राष्ट्रपति पद के लिए चुना गया। फिर 1962 में वो देश के दूसरे राष्ट्रपति बने। एक शिक्षाविद् का इस पद पर आसीन होना देश के लोकतंत्र के लिए गौरव की बात थी। वो चाहते थे कि उनका जन्मदिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाए।

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