सहरसा जिला 1 अप्रैल 2026 को अपना 73वां वर्षगांठ मनाएगा। 1954 में स्थापित इस जिले ने विकास के कई आयाम देखे हैं, जैसे पुल निर्माण और बिजली पहुंचना। हालांकि, कुसहा त्रासदी का प्रभाव, अधूरे विश्वविद्यालय परियोजनाएं, मेडिकल कॉलेज का अभाव, औद्योगिक पिछड़ापन और पलायन जैसी गंभीर समस्याएं आज भी बनी हुई...
संवाद सहयोगी, सहरसा। 1 अप्रैल 2026 को सहरसा जिला 72 वर्ष पूरा कर अपना 73 वां वर्षगांठ मनाएगा। एक अप्रैल 1954 को भागलपुर से अलग होकर सहरसा जिला के अस्तित्व में आया। विकास की संभावनाओं को तरजीह देने के कालक्रम में नौ मई 1981 को इससे अलग मधेपुरा और 14 मार्च 1991 सुपौल जिला बना। इन बीते वर्षों में सहरसा जिले का विकास नहीं हुआ यह कहना बेमानी होगा। जिले के दियारा इलाके में भी बड़े-बड़े पुल बने, आवागमन की सुविधा में काफी वृद्धि हुई। शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में भी काफी विकास हुआ, गांव- गांव तक बिजली पहुंच गई। परंतु, कोसी की पीड़ा झेल रहे सहरसा का कुसहा त्रासदी में जो स्वरूप बदला उसकी पूरी तरह भरपाई अबतक नहीं हो पाई। मंडन- भारती विवि का शिलान्यास 80 के दशक में हुआ, वह सपना अधूरा ही रह गया। अगवानपुर कृषि विवि घोषणा के अनुरूप अब तक विवि का रूप नहीं ले सका। विकृत जलवायु व प्रदूषित जल सेवन की मजबूरी के कारण बड़ी संख्या में लोग असाध्य रोग के शिकार होकर असमय काल कलवित हो रहे हैं, परंतु अबतक इस जिले में मेडिकल कॉलेज नहीं खुल सका है। हिमालय और गंगा के मध्य अवस्थित यह इलाका दुनिया के उर्वरतम इलाकों में एक है, परंतु बाढ़ और सुखाड़ दोनों की पीड़ा झेलने वाले इस जिले के किसानों की कृषि रोड मैप से भी हालात में अबतक कोई सुधार नहीं हो पाया है। रोजी के लिए सालोंभर दूसरे प्रदेश में भटकते हैं इलाके के मजदूर आजादी के लगभग आठ दशक और जिला बनने के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस जिले के दस में चार प्रखंड के अधिकांश लोग वर्ष में छह महीना बाढ़ व जलजमाव झेलने के लिए विवश है। इस जिले में एक भी उद्योग नहीं है। वर्ष 1971 में बैजनाथपुर पेपर मील की स्थापना की गई थी, जो धुंआ निकलने के पहले आखिरकार बंद हो गया। इसकी जमीन भी बियाडा द्वारा छोटे- छाेटे उद्योग लगाने वाले लोगों को आवंटित कर दिया गया। ऐसे में इस जिले के मजदूर सालोभर रोजी की खोज में विभिन्न प्रांतों में भटकते हैं। पलायन कर रहे मजदूरों की संख्या को देखते हुए इस इलाके से दूसरे राज्यों के कई ट्रेन भी चलाई गई। गरीबी के कारण इस इलाके से अब भी छोटे- छोटे बच्चे दलालों के माध्यम से दूसरे प्रदेशों में भेजे जाते हैं। आज भी यह बाल- बंधुआ मजदूरों का सघन इलाका माना जाता है। कई ऐसी समस्याएं है, जिसकी पीड़ा सहरसा जिले के लोग झेलने के लिए आज भी मजबूर हैं। बावजूद इसके विकास की गति बढ़ाने का इस वर्षगांठ में एकबार और संकल्प लिया जाएगा, क्योंकि जिंदगी न केवल जीने का बहाना, जिंदगी न केवल सांसों का खजाना, जिंदगी सिंदूर है पूरब दिशा का, जिंदगी का काम है हर दिन सूरज उगाना ।.
संवाद सहयोगी, सहरसा। 1 अप्रैल 2026 को सहरसा जिला 72 वर्ष पूरा कर अपना 73 वां वर्षगांठ मनाएगा। एक अप्रैल 1954 को भागलपुर से अलग होकर सहरसा जिला के अस्तित्व में आया। विकास की संभावनाओं को तरजीह देने के कालक्रम में नौ मई 1981 को इससे अलग मधेपुरा और 14 मार्च 1991 सुपौल जिला बना। इन बीते वर्षों में सहरसा जिले का विकास नहीं हुआ यह कहना बेमानी होगा। जिले के दियारा इलाके में भी बड़े-बड़े पुल बने, आवागमन की सुविधा में काफी वृद्धि हुई। शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के क्षेत्र में भी काफी विकास हुआ, गांव- गांव तक बिजली पहुंच गई। परंतु, कोसी की पीड़ा झेल रहे सहरसा का कुसहा त्रासदी में जो स्वरूप बदला उसकी पूरी तरह भरपाई अबतक नहीं हो पाई। मंडन- भारती विवि का शिलान्यास 80 के दशक में हुआ, वह सपना अधूरा ही रह गया। अगवानपुर कृषि विवि घोषणा के अनुरूप अब तक विवि का रूप नहीं ले सका। विकृत जलवायु व प्रदूषित जल सेवन की मजबूरी के कारण बड़ी संख्या में लोग असाध्य रोग के शिकार होकर असमय काल कलवित हो रहे हैं, परंतु अबतक इस जिले में मेडिकल कॉलेज नहीं खुल सका है। हिमालय और गंगा के मध्य अवस्थित यह इलाका दुनिया के उर्वरतम इलाकों में एक है, परंतु बाढ़ और सुखाड़ दोनों की पीड़ा झेलने वाले इस जिले के किसानों की कृषि रोड मैप से भी हालात में अबतक कोई सुधार नहीं हो पाया है। रोजी के लिए सालोंभर दूसरे प्रदेश में भटकते हैं इलाके के मजदूर आजादी के लगभग आठ दशक और जिला बनने के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इस जिले के दस में चार प्रखंड के अधिकांश लोग वर्ष में छह महीना बाढ़ व जलजमाव झेलने के लिए विवश है। इस जिले में एक भी उद्योग नहीं है। वर्ष 1971 में बैजनाथपुर पेपर मील की स्थापना की गई थी, जो धुंआ निकलने के पहले आखिरकार बंद हो गया। इसकी जमीन भी बियाडा द्वारा छोटे- छाेटे उद्योग लगाने वाले लोगों को आवंटित कर दिया गया। ऐसे में इस जिले के मजदूर सालोभर रोजी की खोज में विभिन्न प्रांतों में भटकते हैं। पलायन कर रहे मजदूरों की संख्या को देखते हुए इस इलाके से दूसरे राज्यों के कई ट्रेन भी चलाई गई। गरीबी के कारण इस इलाके से अब भी छोटे- छोटे बच्चे दलालों के माध्यम से दूसरे प्रदेशों में भेजे जाते हैं। आज भी यह बाल- बंधुआ मजदूरों का सघन इलाका माना जाता है। कई ऐसी समस्याएं है, जिसकी पीड़ा सहरसा जिले के लोग झेलने के लिए आज भी मजबूर हैं। बावजूद इसके विकास की गति बढ़ाने का इस वर्षगांठ में एकबार और संकल्प लिया जाएगा, क्योंकि जिंदगी न केवल जीने का बहाना, जिंदगी न केवल सांसों का खजाना, जिंदगी सिंदूर है पूरब दिशा का, जिंदगी का काम है हर दिन सूरज उगाना ।
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