Success Story: कैंटीन में सिर्फ 90 रुपये की सैलरी पर करते थे नौकरी, आज 5000 करोड़ का साम्राज्‍य, कैसे पलटी किस्‍मत?

चंदूभाई विरानी कौन हैं News

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सिनेमा हॉल की कैंटीन में महीने के सिर्फ 90 रुपये कमाने से लेकर हजारों करोड़ का स्नैक एम्पायर बनाने तक चंदूभाई विरानी की कहानी कड़ी मेहनत और पक्के इरादे की मिसाल है। 10वीं पास चंदूभाई ने रोजाना की मुश्किलों को मौकों में बदला। भारत के लीडिंग स्नैक ब्रांड्स में से एक बालाजी वेफर्स को खड़ा...

नई दिल्‍ली: चंदूभाई विरानी की कहानी किसी फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट से कम नहीं है। सिनेमा हॉल की कैंटीन में कभी वह सिर्फ 90 रुपये महीने की नौकरी करते थे। आज वह 5,000 करोड़ रुपये के बालाजी वेफर्स साम्राज्य के मालिक हैं। यह कहानी उनकी कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और साधारण शुरुआत से एक विशाल व्यवसाय बनाने की प्रेरणादायक यात्रा को दिखाती है। आइए, यहां चंदूभाई विरानी के बारे में जानते हैं।सिर्फ 10वीं क्‍लास तक पढ़े सिर्फ 10वीं क्‍लास तक पढ़े' imgsize='24252' >चंदूभाई विरानी की कहानी कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। एक साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उन्होंने एक विशाल व्यवसाय खड़ा किया। वह मात्र 10वीं कक्षा तक पढ़े। उन्होंने अपनी साधारण शुरुआत को अवसरों में बदला और बालाजी वेफर्स की स्थापना की। बालाजी वेफर्स आज भारत के प्रमुख स्नैक ब्रांडों में से एक है। इसकी वर्तमान कीमत लगभग 5,000 करोड़ रुपये है। यह साबित करता है कि बड़े सपने देखने के लिए बड़ी शुरुआत की जरूरत नहीं होती है।15 साल की उम्र में शुरू किया कारोबार 15 साल की उम्र में शुरू किया कारोबार ' imgsize='32652' >चंदूभाई विरानी 1972 में 15 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ राजकोट से लगभग 79 किलोमीटर दूर जामनगर जिले के धुंडोराजी चले गए। उनके दो भाई थे। मेघजीभाई और भिखूभाई। उनके पिता स्वर्गीय पोपट विरानी ने अपनी बंजर जमीन बेच दी थी। उन्होंने अपने बेटों को अपना जीवन शुरू करने में मदद करने के लिए 20,000 रुपये दिए थे। इस पैसे का इस्‍तेमाल करके भाइयों ने राजकोट में कृषि उत्पादों और फार्म उपकरणों के व्यापार का एक छोटा व्यवसाय शुरू किया।2 साल के भीतर कारोबार फेल 2 साल के भीतर कारोबार फेल' imgsize='30722' >दुर्भाग्य से यह उद्यम दो साल के भीतर ही विफल हो गया। स्थिर आय के बिना जीवन बहुत कठिन होने लगा। भाइयों को कोई भी काम खोजने के लिए मजबूर होना पड़ा। व्यवसाय के पतन के बाद चंदूभाई और उनके भाइयों ने राजकोट के एस्ट्रां सिनेमा की कैंटीन में काम करना शुरू कर दिया। चंदूभाई को प्रति माह केवल 90 रुपये मिलते थे। वह दरवाजा संभालने से लेकर पोस्टर चिपकाने और दर्शकों को रास्ता दिखाने तक सब कुछ करते थे।किराया तक नहीं दे पाए किराया तक नहीं दे पाए ' imgsize='22090' >कभी-कभी चंदूभाई स्थानीय गुजराती स्नैक 'चोराफारी' की एक प्लेट के बदले सिनेमाघर की फटी सीटों की मरम्मत भी करते थे। विरानी परिवार को गंभीर वित्तीय तनाव का सामना करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब वह 50 रुपये का किराया नहीं दे पाने के कारण रात भर में अपना किराए का घर छोड़ने के लिए मजबूर हो गए थे। इस कठिनाई के बावजूद चंदूभाई ने बाद में बकाया राशि का भुगतान करने के लिए वापसी की, जो संकट के समय में भी उनके मजबूत मूल्यों को दर्शाता है।अवसर को ऐसे पहचाना अवसर को ऐसे पहचाना ' imgsize='19260' >सिनेमा कैंटीन में काम करते हुए चंदूभाई ने देखा कि आलू के वेफर्स फिल्म देखने वालों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने इस अवसर को पहचाना। उन्होंने अपने घर के आंगन में लगभग 10,000 रुपये के निवेश से एक छोटा सा शेड स्थापित किया। उन्होंने एक कमरे वाले घर में चिप्स बनाने के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया। उनके चिप्स जल्दी ही लोकप्रिय हो गए। यह लोकप्रियता न केवल सिनेमा हॉल के अंदर बल्कि बाहर भी फैली।50 लाख का लिया कर्ज 50 लाख का लिया कर्ज' imgsize='22860' >जैसे-जैसे मांग बढ़ी चंदूभाई ने 1989 में राजकोट के अजी जीआईडीसी में गुजरात की तत्कालीन सबसे बड़ी आलू वेफर निर्माण इकाई स्थापित की। इसके लिए उन्होंने 50 लाख रुपये का बैंक कर्ज लिया था। 1992 में तीनों भाइयों ने आधिकारिक तौर पर बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की। कंपनी का नाम उनके कमरे में रखी भगवान हनुमान की एक छोटी सी मूर्ति के नाम पर रखा गया था।आज बन चुकी है अलग पहचान आज बन चुकी है अलग पहचान' imgsize='36032' >आज बालाजी वेफर्स भारत के शीर्ष स्नैक ब्रांडों में से एक है। यह चार कारखानों का संचालन करती है। इनकी उत्पादन क्षमता बहुत ज्‍यादा है। कंपनी सालाना 65 लाख किलोग्राम आलू और 100 लाख किलोग्राम नमकीन का प्रसंस्करण करती है। यह हर घंटे 3,400 किलोग्राम चिप्स का उत्पादन करती है। भारत के 43,800 करोड़ रुपये के स्नैक बाजार में 12 फीसदी हिस्सेदारी के साथ बालाजी वेफर्स देश की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक कंपनी बन गई। कंपनी का कारोबार हजारों करोड़ में पहुंच चुका है।.

नई दिल्‍ली: चंदूभाई विरानी की कहानी किसी फिल्‍म की स्क्रिप्‍ट से कम नहीं है। सिनेमा हॉल की कैंटीन में कभी वह सिर्फ 90 रुपये महीने की नौकरी करते थे। आज वह 5,000 करोड़ रुपये के बालाजी वेफर्स साम्राज्य के मालिक हैं। यह कहानी उनकी कड़ी मेहनत, दृढ़ संकल्प और साधारण शुरुआत से एक विशाल व्यवसाय बनाने की प्रेरणादायक यात्रा को दिखाती है। आइए, यहां चंदूभाई विरानी के बारे में जानते हैं।सिर्फ 10वीं क्‍लास तक पढ़े सिर्फ 10वीं क्‍लास तक पढ़े' imgsize='24252' >चंदूभाई विरानी की कहानी कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। एक साधारण पृष्ठभूमि से उठकर उन्होंने एक विशाल व्यवसाय खड़ा किया। वह मात्र 10वीं कक्षा तक पढ़े। उन्होंने अपनी साधारण शुरुआत को अवसरों में बदला और बालाजी वेफर्स की स्थापना की। बालाजी वेफर्स आज भारत के प्रमुख स्नैक ब्रांडों में से एक है। इसकी वर्तमान कीमत लगभग 5,000 करोड़ रुपये है। यह साबित करता है कि बड़े सपने देखने के लिए बड़ी शुरुआत की जरूरत नहीं होती है।15 साल की उम्र में शुरू किया कारोबार 15 साल की उम्र में शुरू किया कारोबार ' imgsize='32652' >चंदूभाई विरानी 1972 में 15 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ राजकोट से लगभग 79 किलोमीटर दूर जामनगर जिले के धुंडोराजी चले गए। उनके दो भाई थे। मेघजीभाई और भिखूभाई। उनके पिता स्वर्गीय पोपट विरानी ने अपनी बंजर जमीन बेच दी थी। उन्होंने अपने बेटों को अपना जीवन शुरू करने में मदद करने के लिए 20,000 रुपये दिए थे। इस पैसे का इस्‍तेमाल करके भाइयों ने राजकोट में कृषि उत्पादों और फार्म उपकरणों के व्यापार का एक छोटा व्यवसाय शुरू किया।2 साल के भीतर कारोबार फेल 2 साल के भीतर कारोबार फेल' imgsize='30722' >दुर्भाग्य से यह उद्यम दो साल के भीतर ही विफल हो गया। स्थिर आय के बिना जीवन बहुत कठिन होने लगा। भाइयों को कोई भी काम खोजने के लिए मजबूर होना पड़ा। व्यवसाय के पतन के बाद चंदूभाई और उनके भाइयों ने राजकोट के एस्ट्रां सिनेमा की कैंटीन में काम करना शुरू कर दिया। चंदूभाई को प्रति माह केवल 90 रुपये मिलते थे। वह दरवाजा संभालने से लेकर पोस्टर चिपकाने और दर्शकों को रास्ता दिखाने तक सब कुछ करते थे।किराया तक नहीं दे पाए किराया तक नहीं दे पाए ' imgsize='22090' >कभी-कभी चंदूभाई स्थानीय गुजराती स्नैक 'चोराफारी' की एक प्लेट के बदले सिनेमाघर की फटी सीटों की मरम्मत भी करते थे। विरानी परिवार को गंभीर वित्तीय तनाव का सामना करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब वह 50 रुपये का किराया नहीं दे पाने के कारण रात भर में अपना किराए का घर छोड़ने के लिए मजबूर हो गए थे। इस कठिनाई के बावजूद चंदूभाई ने बाद में बकाया राशि का भुगतान करने के लिए वापसी की, जो संकट के समय में भी उनके मजबूत मूल्यों को दर्शाता है।अवसर को ऐसे पहचाना अवसर को ऐसे पहचाना ' imgsize='19260' >सिनेमा कैंटीन में काम करते हुए चंदूभाई ने देखा कि आलू के वेफर्स फिल्म देखने वालों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने इस अवसर को पहचाना। उन्होंने अपने घर के आंगन में लगभग 10,000 रुपये के निवेश से एक छोटा सा शेड स्थापित किया। उन्होंने एक कमरे वाले घर में चिप्स बनाने के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया। उनके चिप्स जल्दी ही लोकप्रिय हो गए। यह लोकप्रियता न केवल सिनेमा हॉल के अंदर बल्कि बाहर भी फैली।50 लाख का लिया कर्ज 50 लाख का लिया कर्ज' imgsize='22860' >जैसे-जैसे मांग बढ़ी चंदूभाई ने 1989 में राजकोट के अजी जीआईडीसी में गुजरात की तत्कालीन सबसे बड़ी आलू वेफर निर्माण इकाई स्थापित की। इसके लिए उन्होंने 50 लाख रुपये का बैंक कर्ज लिया था। 1992 में तीनों भाइयों ने आधिकारिक तौर पर बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की। कंपनी का नाम उनके कमरे में रखी भगवान हनुमान की एक छोटी सी मूर्ति के नाम पर रखा गया था।आज बन चुकी है अलग पहचान आज बन चुकी है अलग पहचान' imgsize='36032' >आज बालाजी वेफर्स भारत के शीर्ष स्नैक ब्रांडों में से एक है। यह चार कारखानों का संचालन करती है। इनकी उत्पादन क्षमता बहुत ज्‍यादा है। कंपनी सालाना 65 लाख किलोग्राम आलू और 100 लाख किलोग्राम नमकीन का प्रसंस्करण करती है। यह हर घंटे 3,400 किलोग्राम चिप्स का उत्पादन करती है। भारत के 43,800 करोड़ रुपये के स्नैक बाजार में 12 फीसदी हिस्सेदारी के साथ बालाजी वेफर्स देश की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक कंपनी बन गई। कंपनी का कारोबार हजारों करोड़ में पहुंच चुका है।

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