सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की उस पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया है, जिसमें किसानों को भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा और ब्याज देने से जुड़े उसके 2019 के फैसले की समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की उस पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया है, जिसमें किसानों को भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा और ब्याज देने से जुड़े उसके 2019 के फैसले की समीक्षा की मांग की गई है। अब यह मामला 11 नवंबर को खुले न्यायालय में सुनवाई के लिए तय किया गया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने मंगलवार को याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कहा, मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर को दोपहर तीन बजे होगी। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस फैसले का असर देशभर में लगभग 32 हजार करोड़ रुपये तक हो सकता है। पहले एनएचएआई ने अपने आवेदन में इसका अनुमान 100 करोड़ रुपये बताया था। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 4 फरवरी को एनएचएआई की एक याचिका खारिज करते हुए अपने 2019 के तरसेम सिंह फैसले को बरकरार रखा था। उस फैसले में कहा गया था कि जिन किसानों की जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम के तहत अधिगृृहीत की गई है, उन्हें भी भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के तहत मिलने वाले ‘सोलाटियम’ और ब्याज का लाभ मिलेगा। एनएचएआई का तर्क था कि यह फैसला केवल भविष्य के मामलों में लागू होना चाहिए ताकि पहले से निपटे मामलों को दोबारा न खोला जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में कहा था कि ऐसा करने से समान परिस्थिति वाले किसानों के बीच असमानता उत्पन्न होगी। अधिगृृहीत जमीन पर सभी को समान मुआवजा और ब्याज की है मांग अदालत ने 2019 में स्पष्ट किया था कि धारा 3, जो भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मिलने वाले लाभों को बाहर करती है, संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है। इसलिए, जिन किसानों की जमीन 1997 से 2015 के बीच एनएचएआई ने अधिगृृहीत की, उन्हें भी समान रूप से मुआवजा और ब्याज मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि फैसला केवल आगे से लागू किया गया, तो 31 दिसंबर 2014 को जिनकी जमीन ली गई, उन्हें लाभ नहीं मिलेगा, जबकि 1 जनवरी 2015 को जिनकी जमीन अधिगृृहीत हुई, उन्हें लाभ मिल जाएगा, जो अन्यायपूर्ण स्थिति होगी। अब एनएचएआई की पुनर्विचार याचिका पर खुले न्यायालय में होने वाली सुनवाई से यह मामला फिर एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। अदालत के आगामी फैसले का असर देशभर के हजारों किसानों और सरकार दोनों पर पड़ सकता है।.
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की उस पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया है, जिसमें किसानों को भूमि अधिग्रहण पर मुआवजा और ब्याज देने से जुड़े उसके 2019 के फैसले की समीक्षा की मांग की गई है। अब यह मामला 11 नवंबर को खुले न्यायालय में सुनवाई के लिए तय किया गया है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने मंगलवार को याचिका पर नोटिस जारी करते हुए कहा, मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर को दोपहर तीन बजे होगी। सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि इस फैसले का असर देशभर में लगभग 32 हजार करोड़ रुपये तक हो सकता है। पहले एनएचएआई ने अपने आवेदन में इसका अनुमान 100 करोड़ रुपये बताया था। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 4 फरवरी को एनएचएआई की एक याचिका खारिज करते हुए अपने 2019 के तरसेम सिंह फैसले को बरकरार रखा था। उस फैसले में कहा गया था कि जिन किसानों की जमीन राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम के तहत अधिगृृहीत की गई है, उन्हें भी भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के तहत मिलने वाले ‘सोलाटियम’ और ब्याज का लाभ मिलेगा। एनएचएआई का तर्क था कि यह फैसला केवल भविष्य के मामलों में लागू होना चाहिए ताकि पहले से निपटे मामलों को दोबारा न खोला जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में कहा था कि ऐसा करने से समान परिस्थिति वाले किसानों के बीच असमानता उत्पन्न होगी। अधिगृृहीत जमीन पर सभी को समान मुआवजा और ब्याज की है मांग अदालत ने 2019 में स्पष्ट किया था कि धारा 3, जो भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मिलने वाले लाभों को बाहर करती है, संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है। इसलिए, जिन किसानों की जमीन 1997 से 2015 के बीच एनएचएआई ने अधिगृृहीत की, उन्हें भी समान रूप से मुआवजा और ब्याज मिलना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि फैसला केवल आगे से लागू किया गया, तो 31 दिसंबर 2014 को जिनकी जमीन ली गई, उन्हें लाभ नहीं मिलेगा, जबकि 1 जनवरी 2015 को जिनकी जमीन अधिगृृहीत हुई, उन्हें लाभ मिल जाएगा, जो अन्यायपूर्ण स्थिति होगी। अब एनएचएआई की पुनर्विचार याचिका पर खुले न्यायालय में होने वाली सुनवाई से यह मामला फिर एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। अदालत के आगामी फैसले का असर देशभर के हजारों किसानों और सरकार दोनों पर पड़ सकता है।
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