Sunday Interview: करोड़ों कमाना बहुत आसान है, पहला लाख कमाना मुश्किल होता है: तिग्मांशु धूलिया tigmanshudhulia TheGreatIndianMurder AjayDevgn ajaydevgn
में शुमार है। ‘क्रिमिनल जस्टिस’ के वह पारस पत्थर बने। और, अब वह लेकर आए हैं ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ जो विकास स्वरूप के उपन्यास ‘सिक्स सस्पेक्ट्स’ पर आधारित है। दिलचस्प बात ये है कि इस किताब पर निर्माता प्रीति सिन्हा पिछले पांच साल से फिल्म बनाने की कोशिश करती रही हैं। इसके लेखक विकास स्वरूप ने जो कहानी का ताना बाना बुना, उसमें प्रीति ने सीरीज बनाने के समय काफी फेरबदल किए हैं। इस सीरीज के कप्तान तिग्मांशु धूलिया से अमर उजाला के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक खास बातचीत। इस बातचीत के कुछ अंश शनिवार को अमर उजाला अखबार के सिने स्तंभ बिंदास में प्रकाशित हो चुके हैं। यहां पढ़िए इंटरव्यू विस्तार से। आशुतोष राणा के मुताबिक ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ सीरीज के लिए उन्होंने सिर्फ आपका नाम सुनकर हां कर दी? ऐसा क्या खास है इसमें? दर्शकों को क्या कुछ नया देखने को मिलेगा? नया क्या है, ये तो मैं कह नहीं सकता क्योंकि मैंने ऐसा कुछ बनाने की कोशिश की नहीं है जो पहले बन ना चुका हो। हां, मेरे लिए ये पहली बार है कि मैं किसी मर्डर सस्पेंस थ्रिलर पर काम कर रहा हूं। मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपने आप को रिपीट न करूं। जो ये थ्रिलर जॉनर है, प्लॉट ड्रिवेन मर्डर मिस्ट्री। ऐसा काम मैंने बहुत कम किया है। शायद ‘क्रिमिनल जस्टिस’ डिज्नी प्लस हॉटस्टार का मेरा एक शो था उसके शुरू के दो एपीसोड मैंने बनाए थे। इसके अलावा ऐसा कोई मैंने प्लॉट ड्रिवेन जिसमें कुछ किसी की पुरानी हिस्ट्री, किसी कैरेक्टर का बैकग्राउंड खुलने से कुछ नया हो जाए, कुछ ऐसा नया निकलकर बाहर आ जाए कि चीजें बिखरनी शुरू हो जाएं। ऐसा काम मैंने किया था नहीं। लेकिन देखने में मजा बहुत आता था। मुझे लगा कि मर्डर मिस्ट्री या थ्रिलर जॉनर ऐसी एक चीज है जिसे देखने में दर्शकों को सबसे ज्यादा मजा आता है। इसीलिए अगर आप शोज देखिए क्राइम पेट्रोल वगैरह, वे बड़े पॉपुलर होते हैं। ये वैसी कहानी है कि जैसे आप सड़क पर जा रहे होते हैं और कोई एक्सीडेंट होता है तो सबकी गर्दनें गाड़ियों के बाहर होती हैं कि हुआ क्या है। कोशिश सिर्फ ये थी कि इसको प्लॉट की कोशिश से बड़ा बनाया जाए और वो सामग्री नॉवेल में आलरेडी थी। उसके करने की गुंजाइश थी। इसीलिए ये कहानी पूरे हिंदुस्तान में घूमती है। और, उस मर्डर का जो डोमिनो रिपल इफेक्ट होता है पूरी सोसाइटी में उसकी ये कहानी है। उसका इफेक्ट क्या होता है। इसीलिए द ग्रेट इंडियन मर्डर है ये। हालांकि, मैं बहुत पक्ष में नहीं था इसके कि इसका नाम द ग्रेट इंडियन मर्डर रखा जाए। आप अपनी ही तारीफ कर रहे हैं। लेकिन बहुत सारे लोगों की, सारे पंचों की सहमति हुई तो फिर इसका नाम रखा गया। आज का युवा अब हुनरमंद होकर जमाने की आंख में आंख डालकर कोई भी बात कर पा रहा है। ‘हासिल’ से लेकर अब तक कितना बदला है परदे पर युवाओं का किरदार? ये जो प्रतीक का किरदार है इस सीरीज में खास तौर से प्रतीक का क्योंकि जो ये बात आप कह रहे हैं जो नौजवानों का एक खास कास्ट का या क्लास का चेंज हुआ है ये इसके किरदार में दिखेगा डिफेनिटली। और बाकी के जो किरदार हैं वे अपनी अपनी सामाजिक परिस्थितियों में फंसे हुए हैं और उनसे भी जूझ रहे हैं। सबके अपने अपने कॉम्पेल्क्सेज हैं लेकिन सूरज यादव का जो किरदार है। 90 की पॉलीटिक्स के बाद जो बदलाव आए हैं। मंडल है, कमंडल है। उसने क्षेत्रीय राजनीति को बहुत बढ़ावा दिया खासतौर से उत्तर भारत की राजनीति में। और वह वर्ग जो पहले सामाजिक समानता से वंचित था, उस वर्ग को एक स्थायित्व मिला है। राजनीतिक ताकत भी मिली है और आर्थिक ताकत भी मिली है। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं.
तो उनको बदलाव तो हुआ है लेकिन प्रोग्रेस स्लो हो गई। फिर जो इनको मिला है वो बहुत तेजी से मिला है। तो उसका बहुत बड़ा प्रतीक है प्रतीक गांधी का कैरेक्ट। और, इसे रचने में आपको उपन्यास से कितनी मदद मिली? ये बहुत दिलचस्प बात हुई कि प्रतीक और ऋचा के जो किरदार हैं वे किताब में नहीं हैं। वे किताब से बाहर हैं। किताब पढ़ते हुए मुझे लगा था कि इन्वेस्टिगेशन कौन करेगा। तो नॉवेलिस्ट जब लिख रहा होता है तो कभी फर्स्ट पर्सन तो कभी थर्ड पर्सन लिख देते हैं कि मैं सोच क्या रहा हूं। जैसे कि रवि सोच रहा था कि उसके जेब में तो सिर्फ दो रुपये हैं तो रात का खाना कहां से खाएगा। पहले फिल्मों या नाटकों में होता था कि किरदार बोलता था आसमान को देखकर कि मेरे मन में ये ख्याल उठ रहा है। पीछे कोई किला हो ना हो, कलाकार बोल देता था कि मैं किले के सामने खड़ा हूं। फिल्मों में ये हो नहीं सकता। ये चल नहीं सकता। जो वह सोच रहा है उसको निकालने को ही अडाप्टेशन कहते हैं। और एक दिलचस्प बात ये हुई कि जब मैं लिख रहा था, ये दोनों किरदार लिख लिए थे। स्क्रिप्टिंग हो गई थी। दूसरा दौर जब पैंडेमिक का जब आया। सब लोग घर पर बैठ गए। तो ओटीटी का कंटेंट देखना या पढ़ना यही रह गया था करने को। पढ़ने का शौक है मुझे। तो मैंने संजय बारू जिन्होंने एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर लिखा, उनकी एक किताब आई थी इंडियाज पावर एलीट, उसको जब मैंने पढना शुरू किया तो उसमें जो बातें आईं तो मैंने कहा कि अरे, मैंने तो इसको लिख दिया द ग्रेट इंडियन मर्डर में। दोनों में बहुत ही समानता दिखी। मुझे लगा कि मेरी सोच को किसी किताब ने सेकंड कर दिया। और एम्फेसाइज कर दिया और अंडर लाइन कर दिया कि जो मैं सोच रहा हूं वह बात सही है। ये करने में बड़ा मजा आया। सीरीज के ट्रेलर में रघुबीर यादव का किरदार एक जगह कहता है, ‘आई एम गांधी’ और सामने खड़ी महिला उसे थप्पड़ मारती है, इस दृश्य के पीछे का मंतव्य क्या है? मंतव्य तो शायद लेखक विकास स्वरूप ही बेहतर बता पाएंगे लेकिन मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि इस किरदार के दो पहलू हैं। ब्लैक एंड व्हाइट यानी श्याम और श्वेत। तो ये जो श्वेत चेहरा है जो शुद्धता का प्रतीक है। अब भी सच्चाई, ईमानदारी, संघर्ष का जो प्रतीक हैं वह गांधीजी ही हैं। और दूसरी तरफ उनका दूसरा किरदार है मोहन कुमार का किरदार। मुझे नहीं लगता गांधीजी से बड़ा कोई श्वेत चरित्र इंसान हिंदुस्तान की हमारी पूरी सामाजिक जाग्रति में दूसरा कोई होगा। सीरीज की निर्माता प्रीति सिन्हा की पहली ख्वाहिश इस किताब पर फिल्म बनाने की रही, आपने किताब पढ़ी तो आपकी पहली इच्छा क्या थी फिल्म या सीरीज? सीरीज। फिल्म के हिसाब से इसकी सामग्री बहुत ज्यादा थी। कैनवस मैं नहीं कहूंगा क्योंकि कैनवस तो बड़े होते ही है फिल्मों के लेकिन मैं समय की बाध्यता कहूंगा कि इस कहानी को कहने के लिए जो वक्त चाहिए वह बहुत ज्यादा है। दो, सवा दो घंटे में ये कहानी नहीं कही जा सकती थी। सीरीज के भी दो सीजन हैं। और, ओटीटी के आने से कितनी आजादी मिली है फिल्मकारों को? क्या ये सही है कि सिनेमा में जो रचनात्मक आजादी नहीं मिलती वह तमाम फिल्मकारों को ओटीटी में मिल रही है? क्रिएटिव फ्रीडम एक अलग बात हो गई। बड़े निर्देशकों के पास तो ये होता ही है। अब राजामौली हो या रोहित शेट्टी हों या करण जौहर हो, राजू हिरानी हों, ये सक्सेसफुल और अच्छे फिल्ममेकर्स हैं। और इन्होंने कमर्शियल बहुत तरक्की की और बहुत हिट फिल्मे दी हैं। तो इनको थोड़े कोई बोलता है कि ऐसे करो, ऐसे न करो। अगर आप फिल्मों में एक पोजीशन बना लेते हैं अपने काम से अपनी सक्सेस से तो क्रिएटिव फ्रीडम मिलती है आपको अपने काम से आपके व्यहार से। वही चीज है ओटीटी में भी। हां, जो अपना पहला या दूसरा काम कर रहे हैं जो किसी बड़े डायरेक्टर के असिस्टेंट रहे और अपना पहला काम कर रहे हैं तो उनके ऊपर दबाव पड़ेगा ही पड़ेगा। इसी को तो कहते हैं संघर्ष। संघर्ष सिर्फ काम मिलने का ही नहीं होता। संघर्ष काम जारी रहने का भी होता है। फिल्म इंडस्ट्री में करोड़ों कमाना बहुत आसान काम है, पहला लाख कमाना मुश्किल होता है। ओटीटी और बहुत चीजों की आपको फ्रीडम देता है। आजादी देता है। नई कहानियों को कहने की आजादी देता है। नए लोगों के साथ काम करने की बहुत आजादी देता है। नए टेक्नीशियनों के साथ, बॉम्बे के स्टूडियो सिस्टम से बाहर निकलकर काम करने की आजादी देता है। नई नई लोकेशन पर जाकर काम करने का मौका मिलता है। नौ शहरों में शूटिंग हुई है इसकी। पूरा भारत दर्शन है। इस इंटरव्यू का पूरा वीडियो आप यहां देख सकते हैं:
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