RSS LIVE: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है. मुंबई में दो दिवसीय 'संघ यात्रा के 100 वर्ष- न्यू होराइजन्स' आयोजित किया गया है. इसके मुख्य संबोधनकर्ता संघसरचलाक मोहन भागवत कर रहे हैं. इस अवसर पर देश विदेश से नामचीन लोग मौजूद हैं. इस अवसर पर फिल्म अभिनेता सालमान खान से लेकर हेमा मालिनी तक मौजूद रहे है.
भागवत ने कहा कि संघ को अच्छी तरह से देखने के बाद विदेशों से आए लोग कई सवाल पूछते हैं. सबसे आखिरी सवाल सभी का एक ही होता है- चाहे वे अफ्रीका से हों, यूरोप से, अमेरिका से, दक्षिण-पूर्व एशिया से या मध्य पूर्व से, वे कहते हैं कि हमारी युवा पीढ़ी में भी ऐसा काम करने की इच्छा है, तो क्या आप हमें यह पद्धति सिखा सकते हैं? इसका मतलब है कि जो हम कर रहे हैं, उसके लिए दूसरी कोई पद्धति नहीं है.
यही पद्धति है. मोहन भागवत ने मंच से सभा को संबोधित किया और संघ के बारे में बात की. उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में ऐसा कोई संगठन नहीं है, जो संघ जैसा काम करता हो. पहले हम यह बात अपनी जानकारी के आधार पर कहते थे, लेकिन अब प्रत्यक्ष अनुभव से पता चल रहा है. देश-विदेश के लोग संघ को देखने आते हैं. पांचों महाद्वीपों से लोग आते हैं. देश की गतिविधियों के केंद्र में संघ का नाम आता है। इसलिए लोग संघ को देखने आते हैं. बता दें कि इस अवसर पर अभिनेता सलमान खान भी मौजूद थे. उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि आदमी किसी चीज को जानने के लिए पहले उसकी तुलना करता है. लेकिन संघ के लिए कोई दूसरी तुलना उपलब्ध नहीं है. जैसे गगन को देखकर कहा जाता है कि गगन, गगन जैसा ही है, दूसरा नहीं. सागर को देखकर कहा जाता है कि सागर के जैसा सागर ही है, दूसरा नहीं. राम-रावण युद्ध को देखकर कहा जाता है कि उसके जैसा दूसरा नहीं है. संघ भी ऐसा है। उसके जैसा दूसरा कोई संगठन नहीं. इसलिए लोग संघ को अन्य संगठनों, पार्टियों या संस्थाओं के साथ बिठाकर देखना चाहते हैं, तो गलतफहमी होती है. ऊपर-ऊपर से या दूर से देखने पर भी गलतफहमी होती है. संघ को जानना है तो अनुभव लेना होगा. अंदर से देखना होगा. चीनी का स्वाद जानने के लिए व्याख्यान, प्रश्नोत्तर या किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं. एक चम्मच चीनी खा लें तो सब समझ आ जाता है. संघ भी ऐसा ही है. इसे अनुभव करने में कोई खतरा नहीं है. इसलिए 100 साल बाद भी हम कह रहे हैं-संघ क्या है? संघ का काम संघ के लिए नहीं, पूरे देश के लिए है. भारतवर्ष के लिए है. संघ को समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि संघ क्या नहीं है? कुर्ता-पायजामा पहनकर मैं यहां बैठा हूं, कल दूसरा पहनूंगा. कपड़ों से मुझे नहीं जाना जा सकता. संघ के स्वयंसेवक रूट मार्च करते हैं, संचलन करते हैं, लेकिन संघ पैरा-मिलिट्री संगठन नहीं है. स्वयंसेवक लाठी-काठी सीखते हैं, लेकिन संघ कोई अखिल भारतीय अखाड़ा नहीं है. संघ में भारतीय राग-रागिनी पर आधारित घोष की धुनें बजती हैं, व्यक्तिगत और सामूहिक गीत गाए जाते हैं, लेकिन संघ कोई संगीत शाला नहीं है. स्वयंसेवक राजनीति में भी हैं, लेकिन संघ कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है. ऊपर से देखने पर गलतफहमी होती है. संघ किसी अन्य संगठन से मुकाबला करने के लिए नहीं बना. किसी खास परिस्थिति में प्रतिक्रिया के रूप में नहीं चला. किसी के विरोध में नहीं चला. हमारा काम सर्वेषाम अविरोधेन है. बिना किसी का विरोध किए चलना. संघ को लोकप्रियता नहीं चाहिए. संघ को सत्ता नहीं चाहिए. जितने भी भले काम देश में चल रहे हैं और आगे चलेंगे, वे ठीक से पूरे हो जाएं, इसलिए संघ है. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हमारे पास राजा थे, सेनाएं थीं, पराक्रम था. फिर भी हम हार गए. मुट्ठी भर विदेशी सागर पार से आए और हम पर राज करने लगे. हम सब मिलकर लड़ते हुए भी हार जाते थे. तो विचार-बंधन शुरू हुआ. ऐसा कैसे हुआ? एक मत यह आया कि हार गए तो क्या हुआ, लड़ाई अभी बाकी है. संघ इसी विचार से चला और आज भी उसी दिशा में काम कर रहा है. संघ को समझने के लिए अनुभव जरूरी है. भारत के इतिहास में संभवतः तथागत बुद्ध के बाद ऐसा कोई अखिल भारतीय काम नहीं हुआ है, जिसकी तुलना संघ से की जा सके. इसलिए इसके लिए कोई दूसरा संगठन या उदाहरण उपलब्ध नहीं है. संघ को सही से जानना है तो अनुभव लेना होगा, अंदर से देखना होगा. संघ का काम संघ के लिए नहीं, पूरे देश के लिए है- भारतवर्ष के लिए. क्रांतिकारी आंदोलन ने हमें ऐसे नायकों दिए, जिनकी कहानियां आज भी प्रेरणा देती हैं. 1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद इस धारा का उद्देश्य पूरा हुआ. दूसरी धारा यह थी कि हम इसलिए हार गए क्योंकि लोगों में राजनीतिक जागृति नहीं थी. समाज में स्वतंत्रता की भावना कमजोर थी. इसलिए राजनीतिक आंदोलन चलना चाहिए, जो पूरे समाज को एकजुट करे. सर ओ ह्यूम की प्रेरणा से इंडियन नेशनल कांग्रेस बनी. लोगों ने इसे आजादी का प्रभावी हथियार बनाया/ चरखा चलाकर स्वराज लाने का नारा दिया गया. इससे जनजागृति हुई और लोग स्वतंत्रता के लिए सड़कों पर उतरे. चौथी धारा ने कहा कि हम अपने मूल से भटक गए हैं. हमें अपने आप को फिर से पहचानना होगा. अपने मूल पर वापस लौटना होगा. स्वामी विवेकानंद और स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे महापुरुषों ने इस दिशा में काम किया. यह काम आज भी चल रहा है. लेकिन देश की परिस्थिति में समाज को दिशा देने और सकारात्मक वातावरण बनाने का काम कमजोर पड़ गया. इन चारों धाराओं में काम करने वाले लोग बहुत प्रामाणिक और निस्वार्थ थे, फिर भी पूर्ण सफलता नहीं मिली. इन सबके बीच डॉ. हेडगेवार का जन्म हुआ. वे जन्मजात देशभक्त थे. तीसरी कक्षा में पढ़ते समय महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की शताब्दी मनाई गई. स्कूल में मिठाई बांटी गई, लेकिन उन्होंने मिठाई कूड़ेदान में फेंक दी. कहा कि गुलाम बनाने वालों का उत्सव हमारे लिए शोक का दिन है. 13 साल की उम्र में माता-पिता दोनों एक घंटे के अंतर से प्लेग से चल बसे. घर की स्थिति कठिन हो गई. फिर भी उन्होंने पढ़ाई में हमेशा पहले नंबर लाने और देश के लिए काम करने का संकल्प नहीं छोड़ा.
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