मुंबई जैसे चकाचौंध वाले शहर में इतनी सफलता हासिल करने के बाद भी अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने अपने भीतर एक गांव छुपा रखा है। ये गांव कभी उनकी बातों में, कभी उनके इरादों में
और, इसके लिए आपने एक कमर्शियल सीरीज भी की, ‘मैं मूर्ख नहीं हूं!’ ये आर्थिक धोखाधड़ी इन दिनों समाज के हर तबके के लोगों के साथ हो रही है। कहीं मैंने पढ़ा कि लखनऊ की एक महिला से लोगों ने 80 लाख रुपये डिजिटल अरेस्ट करके ठग लिए। तब मुझे लगा कि ये तो पढ़े लिखे लोगों क साथ भी हो रहा है। जिनको कुछ नहीं पता, वे तो फंसते ही रहते हैं। क्या आपको कभी अपने निजी जीवन में किसी वकील की जरूरत पड़ी? शुरू में तो कभी नहीं पड़ी लेकिन हां अभिनेता बनने के बाद अब तमाम वकील भी मिलने आते रहते हैं। कुछ से जान पहचान भी अच्छी हो गई है। एक बार मुझे पुलिस का सम्मन आया था किसी मुकदमे के सिलसिले में, तो मैंने अपने परिचित वकील फोन किया तो वह बोले आप रहने दीजिए, इसे मैं ही देख लेता हूं। ‘ क्रिमिनल जस्टिस ’ सीरीज का निर्देशन उन रोहन सिप्पी ने किया है जिनके पिता रमेश सिप्पा ने 50 साल पहले फिल्म ‘शोले’ से हिंदी सिनेमा में तहलका मचा दिया था, आपने देखी तो होगी ‘शोले’ बचपन में? नहीं, बचपन में नहीं देखी, बड़े होने के बाद भी नहीं देखी। अभी छह-सात साल पहले पहली बार देखी है मैंने ‘शोले’, जब मेरे ऊपर आरोप लगने लगे कि तुम कैसे आदमी हो, जिसने अब तक ‘शोले’ नहीं देखी। क्या है, मैं 10वीं क्लास तक 93 तक बेलसंड में पढ़ा। न बिजली, न टीवी, न कुछ। अखबार तक दोपहर में 12 बजे पहुंच पाता था। गांव में बस कभी की नौटंकी वगैरह आ गई तो वही देख लेते थे। मतलब उस दौर की फिल्मों का कोटा अब पूरा कर रहे हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। मेरी ऐसी कोई आदत ही नहीं बन पाई है सिनेमा देखने की। अब भी मुझसे कोई फिल्म लगातार दो-तीन घंटे तक नहीं देखी जाती। बीते एक साल में गिनने लगूं तो शायद तीन फिल्में देखी होंगी, वह भी घर में। थियेटर में तो एक भी फिल्म नहीं देखी। सिनेमा का शौक बचपन से लग नहीं पाया। टीवी भी पहली बार तब देखा जब मैं दिल्ली आया। और, जीवन में सिनेमाघर जाकर पहली फिल्म जो देखी होगा, वह याद है? बाबूजी एक सिनेमाघर की पूजा कराने गए थे, वहीं हमने देखी थी पहली फिल्म ‘ जय संतोषी मां ’। बाबूजी हमको गांव से लेकर गए थे। उम्र रही होगी यही कोई 11-12 साल। गांव से 15 किमी दूर ये सिनेमाघर। बड़े शहरों में मेन रिलीज के बाद तब फिल्में छोटे कस्बों में कई कई साल तक घूमती रहती थीं। ये पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं.
और, इसके लिए आपने एक कमर्शियल सीरीज भी की, ‘मैं मूर्ख नहीं हूं!’ ये आर्थिक धोखाधड़ी इन दिनों समाज के हर तबके के लोगों के साथ हो रही है। कहीं मैंने पढ़ा कि लखनऊ की एक महिला से लोगों ने 80 लाख रुपये डिजिटल अरेस्ट करके ठग लिए। तब मुझे लगा कि ये तो पढ़े लिखे लोगों क साथ भी हो रहा है। जिनको कुछ नहीं पता, वे तो फंसते ही रहते हैं। क्या आपको कभी अपने निजी जीवन में किसी वकील की जरूरत पड़ी? शुरू में तो कभी नहीं पड़ी लेकिन हां अभिनेता बनने के बाद अब तमाम वकील भी मिलने आते रहते हैं। कुछ से जान पहचान भी अच्छी हो गई है। एक बार मुझे पुलिस का सम्मन आया था किसी मुकदमे के सिलसिले में, तो मैंने अपने परिचित वकील फोन किया तो वह बोले आप रहने दीजिए, इसे मैं ही देख लेता हूं। ‘क्रिमिनल जस्टिस’ सीरीज का निर्देशन उन रोहन सिप्पी ने किया है जिनके पिता रमेश सिप्पा ने 50 साल पहले फिल्म ‘शोले’ से हिंदी सिनेमा में तहलका मचा दिया था, आपने देखी तो होगी ‘शोले’ बचपन में? नहीं, बचपन में नहीं देखी, बड़े होने के बाद भी नहीं देखी। अभी छह-सात साल पहले पहली बार देखी है मैंने ‘शोले’, जब मेरे ऊपर आरोप लगने लगे कि तुम कैसे आदमी हो, जिसने अब तक ‘शोले’ नहीं देखी। क्या है, मैं 10वीं क्लास तक 93 तक बेलसंड में पढ़ा। न बिजली, न टीवी, न कुछ। अखबार तक दोपहर में 12 बजे पहुंच पाता था। गांव में बस कभी की नौटंकी वगैरह आ गई तो वही देख लेते थे। मतलब उस दौर की फिल्मों का कोटा अब पूरा कर रहे हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। मेरी ऐसी कोई आदत ही नहीं बन पाई है सिनेमा देखने की। अब भी मुझसे कोई फिल्म लगातार दो-तीन घंटे तक नहीं देखी जाती। बीते एक साल में गिनने लगूं तो शायद तीन फिल्में देखी होंगी, वह भी घर में। थियेटर में तो एक भी फिल्म नहीं देखी। सिनेमा का शौक बचपन से लग नहीं पाया। टीवी भी पहली बार तब देखा जब मैं दिल्ली आया। और, जीवन में सिनेमाघर जाकर पहली फिल्म जो देखी होगा, वह याद है? बाबूजी एक सिनेमाघर की पूजा कराने गए थे, वहीं हमने देखी थी पहली फिल्म ‘जय संतोषी मां’। बाबूजी हमको गांव से लेकर गए थे। उम्र रही होगी यही कोई 11-12 साल। गांव से 15 किमी दूर ये सिनेमाघर। बड़े शहरों में मेन रिलीज के बाद तब फिल्में छोटे कस्बों में कई कई साल तक घूमती रहती थीं। ये पूरा इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं
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