Premanand Ji Maharaj: प्रेमानंद महाराज का क्षेत्र सन्यास उनके जीवन का सबसे बड़ा संकल्प है. खराब किडनियों, कम भोजन और कठिन दिनचर्या के बावजूद वह वृंदावन नहीं छोड़ते. राधा रानी के प्रति समर्पण और हठ योग ही उनकी असली शक्ति है.
Premanand Ji Maharaj : वृंदावन सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि लाखों भक्तों के लिए भाव, आस्था और समर्पण का केंद्र है. इसी वृंदावन की गलियों में रहने वाले प्रेमानंद महाराज आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. उनकी कमजोर देह, खराब किडनियां और सादा जीवन देखकर अक्सर लोगों के मन में एक सवाल उठता है कि आखिर इतनी गंभीर हालत में भी महाराज इलाज के लिए बाहर क्यों नहीं जाते.
क्यों वह न तो देश के बड़े अस्पतालों में जाते हैं और न ही विदेश जाकर इलाज कराते हैं. इस सवाल का जवाब सिर्फ उनकी बीमारी में नहीं, बल्कि उनके लिए गए एक बड़े संकल्प में छुपा है, जिसे वह “क्षेत्र सन्यास” कहते हैं. प्रेमानंद महाराज का जीवन दिखाता है कि जब कोई साधक खुद को पूरी तरह ईश्वर के चरणों में सौंप देता है, तो उसके फैसले भी आम लोगों से अलग हो जाते हैं. महाराज का कहना है कि वृंदावन उनके लिए सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि राधा रानी की साक्षात भूमि है. उन्होंने अपना जीवन, शरीर और सांसें सब कुछ श्रीजी को अर्पित कर दिया है. यही वजह है कि चाहे कितनी भी तकलीफ क्यों न हो, वह वृंदावन छोड़ने का विचार भी मन में नहीं लाते. इस लेख में हम जानेंगे कि क्षेत्र सन्यास क्या होता है, प्रेमानंद महाराज ने इसे क्यों अपनाया और इसका उनके हठ योग से क्या रिश्ता है. 1. राधा नाम की शक्ति से खराब किडनी के बाद भी जीवित हैं महाराज प्रेमानंद महाराज खुद कहते हैं कि उनकी जिंदगी आज भी चल रही है तो उसका कारण दवा नहीं, बल्कि राधा नाम है. दोनों किडनियां फेल होने के बाद भी वह वर्षों से जीवित हैं. उनका मानना है कि राधा रानी का नाम जपने से भीतर ऐसी शक्ति आती है जो शरीर को सहारा देती है. महाराज अपने भक्तों को भी यही समझाते हैं कि नाम जप सिर्फ बोलने की चीज नहीं, बल्कि जीने की ताकत है. यह भी पढ़ें – दवा के बाद भी नहीं उतर रहा फीवर? 3 ग्रह, 3 तरह का अनाज और 3 दिन का उपाय, शाम को इस समय कर लें, छू मंतर हो जाएगा बुखार 2. इलाज के लिए बाहर जाने से क्यों करते हैं इंकार कई भक्त भावुक होकर महाराज से इलाज की गुजारिश करते हैं. कोई बड़े शहर के अस्पताल का नाम लेता है तो कोई विदेश ले जाने की बात करता है. मगर महाराज हर बार शांत स्वर में कहते हैं कि अब उनका सहारा सिर्फ श्रीजी हैं. उनका मानना है कि जब जीवन राधा रानी को सौंप दिया, तो शरीर की चिंता भी उन्हीं पर छोड़ दी. सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी. 3. केवल वृंदावन में ही देते हैं दर्शन और प्रवचन प्रेमानंद महाराज दूसरे संतों की तरह जगह-जगह जाकर प्रवचन नहीं देते. वह सिर्फ वृंदावन में ही रहते हैं. जो भक्त मिलना चाहता है, उसे वृंदावन आना पड़ता है. जब कोई उन्हें अपने शहर बुलाता है तो वह साफ कहते हैं कि उन्होंने क्षेत्र सन्यास लिया है, इसलिए अब वृंदावन छोड़ना संभव नहीं. 4. क्या होता है क्षेत्र सन्यास क्षेत्र सन्यास का मतलब होता है किसी एक स्थान से खुद को जीवनभर के लिए बांध लेना. यानी चाहे कैसी भी परिस्थिति आए, उस जगह को छोड़ा नहीं जा सकता. यह सिर्फ शरीर को बांधना नहीं, बल्कि मन को भी उसी क्षेत्र में स्थिर कर देना होता है. पुराने रिश्ते, पहचान और यादें पीछे छूट जाती हैं और साधक खुद को उस भूमि से जोड़ लेता है जो उसे ईश्वर से जोड़ती है. 5. इसलिए महाराज नहीं छोड़ सकते वृंदावन प्रेमानंद महाराज ने वृंदावन को अपनी अंतिम शरण मान लिया है. उनका कहना है कि चाहे कैसी भी विपदा आए, वह राधा रानी की भूमि नहीं छोड़ सकते. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी श्रीजी के चरणों में सौंप दी है और उसी वचन पर अडिग हैं. 6. क्षेत्र सन्यास एक तरह का हठ योग यहां हठ का मतलब जिद नहीं, बल्कि मजबूत संकल्प है. जब साधक अपने सुख-दुख, जीवन-मृत्यु सब कुछ ईश्वर को सौंप देता है, तब ऐसा हठ अपने आप पैदा होता है. प्रेमानंद महाराज का हठ योग भी यही है कि वह तब तक वृंदावन में रहेंगे, जब तक राधा रानी खुद उन्हें बुलाने नहीं आतीं. 7. आधी रोटी और चम्मच से पानी महाराज की दिनचर्या बेहद सादा है. वह पूरे दिन में सिर्फ आधी रोटी खाते हैं और बहुत कम पानी पीते हैं, वो भी चम्मच से. डायलिसिस जैसी कठिन प्रक्रिया के बाद भी उनके चेहरे पर कभी शिकन नहीं दिखती. उनका संयम लोगों को हैरान कर देता है. 8. कभी नहीं बदलती दिनचर्या प्रेमानंद महाराज की दिनचर्या सालों से एक जैसी है. रात 2 बजे उठना, स्नान के बाद 3 बजे पदयात्रा, फिर कुछ देर विश्राम और सुबह 4:15 बजे से सत्संग और यमुनाष्टक का पाठ. शरीर कमजोर है, मगर अनुशासन में कोई ढील नहीं. 9. कितने घंटे सोते हैं महाराज महाराज दिन में सिर्फ 3 से 4 घंटे ही सोते हैं. अकसर रात 11:30 बजे तक भजन करते हैं और फिर थोड़ी देर विश्राम लेते हैं. उनका मानना है कि जब मन राधा नाम में लगा हो, तो नींद भी अपने आप कम हो जाती है.
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