Opinion: BJP को क्यों कहा जाता है ‘पार्टी विद डिफरेंस’? नरेंद्र मोदी से लेकर नितिन नबीन तक के नामों से भाजप...

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Opinion: BJP को क्यों कहा जाता है ‘पार्टी विद डिफरेंस’? नरेंद्र मोदी से लेकर नितिन नबीन तक के नामों से भाजप...
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Opinion: भारतीय जनता पार्टी की 1980 में जब स्थापना हुई तो इसके नेताओं के भाषणों में एक वाक्यांश अक्सर सुनाई पड़ता था- पार्टी विद डिफरेंस. भाजपा के आला नेताओं में शुमार भूतपूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी अपने भाषणों में अक्सर इसका उल्लेख करते थे. तब इसका अर्थ शायद ही लोग समझते होंगे. इसलिए कि अमल में आए बगैर इसका मतलब समझना मुश्किल था.

पटनाः भाजपा और इसके नवनियुक्त कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन का उदय संयोगवश एक ही समय में हुआ है. पहले जनसंघ, फिर जनता पार्टी और उसके बाद भाजपा का उदय हुआ. भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई और नितिन नवीन का जन्म 23 मई 1980 को हुआ.

तकरीबन डेढ़ महीने बाद. महीने-दो महीने की मियाद कोई अधिक नहीं होती. इसलिए यह कहना कि भाजपा और नितिन नवीन का जन्म साथ-साथ हुआ, कोई बड़ी भूल नहीं होगी. यह भी कि दोनों की उम्र अभी 45 साल है. नवीन के बारे में किसी को भी अनुमान नहीं था कि भाजपा उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी देगी. शायद उन्हें भी इसकी भनक नहीं थी. ठीक इसी तरह उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी और बिहार में संजय सरावगी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर भाजपा ने सबको चौंका दिया है. 5वीं बार बनी BJP सरकार भाजपा की केंद्र में 5वीं बार सरकार बनी है. 2014 और 2019 के बाद तीसरी बार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने सरकार बनाई है. इससे पहले भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 2 बार सरकार बनाई थी. पहली बार वाजपेयी सरकार 1998 में बनी, जो सिर्फ 13 दिन तक ही चल पाई. वाजपेयी बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए तो सरकार गिर गई. वाजपेयी के नेतृत्व में दूसरी बार भाजपा ने सरकार बनाई. तकरीबन 13 महीने सरकार चली. उसके बाद भाजपा को सत्ता में आने का अवसर 14 वर्ष बाद आया और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार 2014 में बनी. तब से भाजपा का जो उत्थान शुरू हुआ, वह अब तक जारी है. नरेंद्र मोदी का नाम जब भाजपा ने पहली बार पीएम पद के लिए प्रस्तावित किया था, तब भी लोग चौंक गए थे. राजनीति में BJP के प्रयोग राजनीति में अपने नवाचारी प्रयोगों से भाजपा ने साबित किया है कि वह दूसरे राजनीतिक दलों से अलग अहमियत रखती है. खासकर 2014 के बाद. केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बन जाने के बाद यह सिलसिला तेज हुआ. राज्यों में हरियाणा से इसकी शुरुआत 2014 में हुई थी. वहां लोकसभा चुनाव के ठीक बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को परास्त कर जीती भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला. सीएम के लिए चर्चित और स्थापित नेताओं के नाम उभरे. भाजपा ने सबको दरकिनार कर आरएसएस की पृष्ठभूमि वाले मनोहर खट्टर का नाम घोषित किया तो सभी चौंक गए थे. उसके बाद यह सिलसिला महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस, झारखंड में घुवर दास, मध्य प्रदेश में मोहन यादव और छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय तक पहुंचा. नितिन नवीन अभिनव प्रयोग! भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए कई बड़े नामों की साल भर से चर्चा हो रही थी. धर्मेंद्र प्रधान, शिवराज सिंह चौहान जैसे कई नाम लोगों की जेहन में आ रहे थे. भाजपा ने पूर्णकालिक अध्यक्ष के बजाय कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में नितिन नवीन की मुनादी कर सभी के अनुमानों पर पानी फेर दिया. अभी तक भाजपा ने इतनी कम उम्र के किसी व्यक्ति को ऐसी जिम्मेदारी नहीं सौंपी थी. आमतौर पर उम्रदराज और अनुभवी लोगों को ही इतनी बड़ी जिम्मेदारी मिलती रही है. ऐसा पहली बार हुआ है कि 45 साल के अदना विधायक को पार्टी ने राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी सौंपी है. हालांकि, अभी यह कहना कि जल्दबाजी होगी कि नितिन नवीन को कार्यकारी अध्यक्ष बना कर उन्हें पूर्णकालिक अध्यक्ष बनाने का यह उपक्रम तो नहीं है. पर, भाजपा में अब तक का रिकॉर्ड यही कहता है कि अमित शाह के बाद नितिन नवीन तीसरे ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है. अमित शाह और जेपी नड्डा को भी पार्टी ने पहले कार्यकारी अध्यक्ष बनाया, फिर उन्हें पूर्णकालिक अध्यक्ष की जवाबदेही सौंप दी गई. अगर पार्टी की यह परिपाटी बरकरार रहती है तो नितिन नवीन भाजपा के पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकते हैं. नवीन के सामने ये होंगे चैलेंज नितिन नवीन के साथ एक खूबी है कि वे पहले से संगठन में सक्रिय रहे हैं. यानी उन्हें संगठन का अनुभव है. उनके सामने आने वाले 3 वर्षों में कई राज्यों के चुनाव होंगे. अगले साल पश्चिम बंगाल में चुनाव होना है. भाजपा के लिए बंगाल जीतना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है. पिछली बार भाजपा ने कड़ी मेहनत की. उसे 77 सीटों के साथ बड़ी सफलता भी मिली, लेकिन सत्ता पर काबिज होने से पार्टी चूक गई. इस बार अगर भाजपा कामयाब होती है तो इसका सेहरा नितिन नवीन के सिर ही बंधेगा. नितिन के साथ एक धनात्मक बात यह है कि वे जिस कायस्थ जाति से आते हैं, उसी जाति के दो मुख्यमंत्री- विधानचंद्र राय और ज्योति बसु बंगाल में बन चुके हैं. यद्यपि कि बंगाल में कायस्थ आबादी निर्णायक नहीं है. कुल आबादी में इस जाति की हिस्सेदारी तकरीबन 3 प्रतिशत ही है, लेकिन इस जाति के लोग प्रबुद्ध वर्ग में गिने जाते हैं. भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है. बंगाल के साथ ही 4 अन्य राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होंगे. इनमें असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासिमत पुडुचेरी शामिल हैं. 2027 में गुजरात, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होंगे. नए चेहरों से चौंकाती है BJP भाजपा 2014 के बाद से ही अचर्चित चेहरों को सामने लाकर लोगों को चौंकाती रही है. राष्ट्रपति के लिए झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू को सामने लाकर भाजपा ने चौंकाया था. उपराष्ट्रपति के लिए जब कई स्थापित नामों की चर्चा हो रही थी तो भाजपा ने सीपी राधाकृष्णन का नाम आगे कर सबको चौंका दिया था. मुख्यमंत्रियों के नाम भी भाजपा इस तरह तय करती है कि लोग चौंक जाएं. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान को लोग मुख्यमंत्री मान चुके थे, लेकिन डाक्टर मोहन यादव के नाम की घोषणा कर भाजपा ने सारे कयासों पर पानी फेर दिया था. दिल्ली में रेखा गुप्ता का नाम भी चौंकाने वाला था.

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