भाजपा का दशहरे से पहले विजयोत्सव मनाने का सपना साकार नहीं हो सका।
भाजपा का दशहरे से पहले विजयोत्सव मनाने का सपना साकार नहीं हो सका। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन ने बहुमत हासिल कर दस साल बाद फिर सरकार बनाने का जनादेश हासिल कर लिया। पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला का दोबारा मुख्यमंत्री बनना तय है। लेकिन, अनुच्छेद-370 रद किए जाने के बाद हुए इस चुनाव के नतीजे बड़े संदेश देने वाले हैं। नतीजों के बाद कई सवाल भी उभरे हैं, जिनके जवाब पर सभी की निगाहें होंगी। छह साल से उपराज्यपाल या एलजी राज देख रहे लोग निर्वाचित और स्थिर सरकार चाहते थे। पूरे चुनाव के दौरान जगह-जगह ब्यूरोक्रेसी के व्यवहार के उलाहने व शिकायतें सुनने को मिलीं। नतीजों का पहला संदेश यही है कि जनता ने स्थिर सरकार के लिए एनसी व कांग्रेस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत से चुना। अपनी ओर से जोड़तोड़ का मौका नहीं दिया। कश्मीर और जम्मू के मतदाताओं ने इस बार भी अलग-अलग मिजाज व मुद्दों पर वोट किया। मुस्लिम बहुल कश्मीर के मतदाता अपने मुख्यमंत्री व संभाग के हितों को ध्यान में रखकर वोट करते आए हैं। अब तक सभी मुख्यमंत्री कश्मीर से ही हुए हैं। इनमें एनसी के अब्दुल्ला परिवार से अकेले छह बार। एनसी सहित कश्मीर घाटी की ज्यादातर पार्टियों ने अनुच्छेद-370 बहाली के मुद्दे पर चुनाव लड़ा। यहां के मतदाताओं ने एकजुट होकर वोट किया और एनसी को 35 व गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस को पांच सीटें देकर उनकी झोली भर दी। दूसरी ओर, हिंदू बहुल जम्मू के मतदाता पार्टी से ज्यादा प्रत्याशियों को देखकर वोट करते आए हैं। वे कश्मीरियों की तरह एकजुट नहीं होते। इस बार भी यही रुख रहा। जम्मू के वोटरों ने न सिर्फ भाजपा को, बल्कि एनसी, कांग्रेस, आप और निर्दलीयों को भी गले लगाया। भाजपा को 29 सीटें दी, तो एनसी को सात, कांग्रेस व आप को 1-1 तथा निर्दलीयों को सात सीटों पर जीत दिलाई। भाजपा को जम्मू की सरकार का नारा देने का फायदा जरूर मिला। जम्मू जिले की 11 सीटों में पार्टी को 10 सीटें मिलीं। पिछली बार जीती कुल 25 सीटों के मुकाबले इस बार 29 सीटें जीत लीं। लेकिन, जम्मू संभाग में उम्मीद के हिसाब से सीटें नहीं पा सकी। भाजपा को यहां से करीब 35 सीटों की उम्मीद थी। कश्मीरियों को रास नहीं आई भाजपा केंद्र सरकार व भाजपा ने कश्मीर में बड़े-बड़े काम गिनाए, मगर कश्मीरियों को पार्टी रास नहीं आई। घाटी के लोग भाजपा को किसी कीमत पर सत्ता में नहीं आने देना चाहते थे। यहां तक कि भाजपा से जुड़ने वाले नाम तक मंजूर नहीं हुए। इस प्रतिक्रिया का सीधा फायदा गठबंधन को मिला। भाजपा ने कश्मीर संभाग में 18 प्रत्याशी उतारे और सभी हार गए। पिछली बार भाजपा के साथ सरकार बनाने वाली महबूबा मुफ्ती की पीडीपी तीन सीटों पर सिमट गई। बेटी इल्तिजा तक हार गईं। इसी तरह, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता सांसद इंजीनियर रशीद व जमात को भाजपा की बी टीम बताते रहे। रशीद और जमात का संगठन उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर पाया, जबकि बीते लोकसभा चुनाव में रशीद ने बारामुला से पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला को जेल से हराकर तहलका मचा दिया था। एनसी-कांग्रेस गठबंधन की सफलता के पीछे त्वरित फैसले एनसी-व कांग्रेस ने भाजपा को अंत तक यह अंदाजा नहीं लगने दिया कि वह चुनाव मैदान में एकसाथ आएंगे। दोनों पार्टियों ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद गठबंधन का एलान किया। प्रत्याशियों के एलान में पांच सीटों पर फ्रेंडली फाइट की स्थिति बनी, लेकिन इसे किसी ओर से दोस्ती में दरार के रूप नहीं लेने दिया। गठबंधन ने रणनीति पूर्वक घाटी में अनुच्छेद-370 और जम्मू में दरबार मूव को मुद्दा बनाया। घाटी के मुस्लिम अनुच्छेद-370 की वापसी, जबकि जम्मू के लोग दरबार मूव की बहाली चाहते हैं। एनसी ने 370 के मुद्दे को, तो दरबार मूव को कांग्रेस ने फोकस किया । इसका असर ये हुआ कि गठबंधन ने घाटी का भरपूर समर्थन हासिल किया और जम्मू संभाग से भी सीटें निकालकर मजबूत सरकार की नींव बना ली। बड़े अहम हो गए ये सवाल एनसी का मुख्य चुनावी वादा है कि वह सत्ता में आने पर अनुच्छेद-370 की बहाली कराएगी। अब वह सत्ता संभालने के लिए तैयार है। गठबंधन में सहयोगी कांग्रेस इस मुद्दे पर पूरे चुनाव चुप रही। अब देखना होगा कि वह अपने इस सबसे बड़े वादे पर अमल कैसे करेगी? सुप्रीम कोर्ट तक इस फैसले पर मुहर लगा चुका है। एनसी ने राज्य को स्वायत्तता दिलाने का वादा किया है। पार्टी ने वर्ष 2000 में विधानसभा से इसके लिए प्रस्ताव भी पारित किया था। तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार इस प्रस्ताव को खारिज कर चुकी है। पार्टी इस वादे पर कैसे अमल करेगी। एनसी ने राजनैतिक कैदियों की रिहाई का वादा किया है। इसकी आड़ में पत्थरबाजों को छोड़ने का आश्वासन दिया गया। एलजी को जिस तरह के अधिकार दिए गए हैं, देखने लायक होगा कि वह इस मुद्दे पर कैसे बढ़ पाती है। एनसी ने 200 यूनिट बिजली व 12 एलीपीजी सिलेंडर मुफ्त देने की बात की है। इसी तरह, गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस ने महिलाओं को 3000 रुपये हर महीने देने को कहा है। नकद भुगतान वाली योजनाओं के जरिए सत्ता में आई कई सरकारें कर्ज के बोझ तले दब चुकी हैं। बिना केंद्र की मदद सैकड़ों करोड़ रुपये सालाना खर्च वाले ये वादे कैसे पूरे किए जाएंगे, इस पर भी नजरें होंगी। केंद्र व राज्य में अलग-अलग सरकारों का होना हमेशा से घाटे का सौदा साबित हुआ है। दिल्ली व केंद्र सरकार के बीच का टकराव सुर्खियां बनती रही है। यहां एलजी को कई ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जिस पर एनसी शुरू से ही सवाल उठाती रही है। अब शासकीय कामकाज में केंद्र सरकार व एलजी से समन्वय बिठाकर राज्य को आगे ले जाना सबसे अहम होगा। भाजपा : दरबार मूव और राज्य के दर्जे पर संतुष्ट नहीं कर पाई भाजपा ने चुनाव पूरी ताकत से लड़ा, लेकिन राज्य के दर्जे की बहाली व दरबार मूव के मुद्दे पर लोगों को आश्वस्त नहीं कर पाई। राज्य के दर्जे की बहाली ऐसा मुद्दा था, जिसका जम्मू से कश्मीर तक एक जैसा असर दिखा। लोग सवाल पूछते नजर आए कि राज्य का दर्जा बहाल किया जाना है, तो खत्म क्यों किया गया? और पार्टी यदि बहाली की बात करती है, तो चुनाव से पहले बहाल क्यों नहीं किया गया? पीएम मोदी व भाजपा के अन्य नेताओं ने चुनाव में बार-बार राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया, लेकिन लोगों के गले नहीं उतरा। इसी तरह, जम्मू संभाग में दरबार मूव सबसे बड़ा मुद्दा बना। कहा गया कि छह महीने तक जम्मू की अर्थव्यवस्था दरबार मूव से चलती है। यह प्रथा बंद होने से रोजगार के मौके कम हुए हैं। पार्टी की सफाई पर लोग संतुष्ट नहीं हुए। जम्मू शहर के लोगों ने भाजपा का जरूर साथ दिया, लेकिन संभाग में उम्मीद के हिसाब से समर्थन न मिलने के पीछे इसे एक अहम कारण माना जा रहा है। पीडीपी : सपना रह गया किंगमेकर बनना जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी की वैसे ही स्थिति हो गई है, जैसे उत्तर प्रदेश में बसपा की। बसपा सुप्रीमो मायावती पर आरोप लगता रहा है कि वह भाजपा के प्रति नरम रुख रखती हैं। इसके अलावा भाई व भतीजे को आगे बढ़ाना भी लोगों को रास नहीं आया। बसपा आज लोकसभा, राज्यसभा व विधान परिषद से अपना स्थान खो चुकी है। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी भी इसी फॉर्मूले में फंस गई। भाजपा से मिलकर सरकार बनाना उसे भारी पड़ा। कश्मीर के मतदाताओं ने पार्टी को खारिज कर दिया। खुद को पीछे कर बेटी इल्तिजा को आगे बढ़ाने का मंसूबा भी धरा रह गया। इल्तिजा पहला ही चुनाव हार गईं और किंगमेकर बनने की उम्मीदें भी धरी रह गईं।.
भाजपा का दशहरे से पहले विजयोत्सव मनाने का सपना साकार नहीं हो सका। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन ने बहुमत हासिल कर दस साल बाद फिर सरकार बनाने का जनादेश हासिल कर लिया। पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला का दोबारा मुख्यमंत्री बनना तय है। लेकिन, अनुच्छेद-370 रद किए जाने के बाद हुए इस चुनाव के नतीजे बड़े संदेश देने वाले हैं। नतीजों के बाद कई सवाल भी उभरे हैं, जिनके जवाब पर सभी की निगाहें होंगी। छह साल से उपराज्यपाल या एलजी राज देख रहे लोग निर्वाचित और स्थिर सरकार चाहते थे। पूरे चुनाव के दौरान जगह-जगह ब्यूरोक्रेसी के व्यवहार के उलाहने व शिकायतें सुनने को मिलीं। नतीजों का पहला संदेश यही है कि जनता ने स्थिर सरकार के लिए एनसी व कांग्रेस गठबंधन को स्पष्ट बहुमत से चुना। अपनी ओर से जोड़तोड़ का मौका नहीं दिया। कश्मीर और जम्मू के मतदाताओं ने इस बार भी अलग-अलग मिजाज व मुद्दों पर वोट किया। मुस्लिम बहुल कश्मीर के मतदाता अपने मुख्यमंत्री व संभाग के हितों को ध्यान में रखकर वोट करते आए हैं। अब तक सभी मुख्यमंत्री कश्मीर से ही हुए हैं। इनमें एनसी के अब्दुल्ला परिवार से अकेले छह बार। एनसी सहित कश्मीर घाटी की ज्यादातर पार्टियों ने अनुच्छेद-370 बहाली के मुद्दे पर चुनाव लड़ा। यहां के मतदाताओं ने एकजुट होकर वोट किया और एनसी को 35 व गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस को पांच सीटें देकर उनकी झोली भर दी। दूसरी ओर, हिंदू बहुल जम्मू के मतदाता पार्टी से ज्यादा प्रत्याशियों को देखकर वोट करते आए हैं। वे कश्मीरियों की तरह एकजुट नहीं होते। इस बार भी यही रुख रहा। जम्मू के वोटरों ने न सिर्फ भाजपा को, बल्कि एनसी, कांग्रेस, आप और निर्दलीयों को भी गले लगाया। भाजपा को 29 सीटें दी, तो एनसी को सात, कांग्रेस व आप को 1-1 तथा निर्दलीयों को सात सीटों पर जीत दिलाई। भाजपा को जम्मू की सरकार का नारा देने का फायदा जरूर मिला। जम्मू जिले की 11 सीटों में पार्टी को 10 सीटें मिलीं। पिछली बार जीती कुल 25 सीटों के मुकाबले इस बार 29 सीटें जीत लीं। लेकिन, जम्मू संभाग में उम्मीद के हिसाब से सीटें नहीं पा सकी। भाजपा को यहां से करीब 35 सीटों की उम्मीद थी। कश्मीरियों को रास नहीं आई भाजपा केंद्र सरकार व भाजपा ने कश्मीर में बड़े-बड़े काम गिनाए, मगर कश्मीरियों को पार्टी रास नहीं आई। घाटी के लोग भाजपा को किसी कीमत पर सत्ता में नहीं आने देना चाहते थे। यहां तक कि भाजपा से जुड़ने वाले नाम तक मंजूर नहीं हुए। इस प्रतिक्रिया का सीधा फायदा गठबंधन को मिला। भाजपा ने कश्मीर संभाग में 18 प्रत्याशी उतारे और सभी हार गए। पिछली बार भाजपा के साथ सरकार बनाने वाली महबूबा मुफ्ती की पीडीपी तीन सीटों पर सिमट गई। बेटी इल्तिजा तक हार गईं। इसी तरह, नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता सांसद इंजीनियर रशीद व जमात को भाजपा की बी टीम बताते रहे। रशीद और जमात का संगठन उल्लेखनीय सफलता हासिल नहीं कर पाया, जबकि बीते लोकसभा चुनाव में रशीद ने बारामुला से पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला को जेल से हराकर तहलका मचा दिया था। एनसी-कांग्रेस गठबंधन की सफलता के पीछे त्वरित फैसले एनसी-व कांग्रेस ने भाजपा को अंत तक यह अंदाजा नहीं लगने दिया कि वह चुनाव मैदान में एकसाथ आएंगे। दोनों पार्टियों ने चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद गठबंधन का एलान किया। प्रत्याशियों के एलान में पांच सीटों पर फ्रेंडली फाइट की स्थिति बनी, लेकिन इसे किसी ओर से दोस्ती में दरार के रूप नहीं लेने दिया। गठबंधन ने रणनीति पूर्वक घाटी में अनुच्छेद-370 और जम्मू में दरबार मूव को मुद्दा बनाया। घाटी के मुस्लिम अनुच्छेद-370 की वापसी, जबकि जम्मू के लोग दरबार मूव की बहाली चाहते हैं। एनसी ने 370 के मुद्दे को, तो दरबार मूव को कांग्रेस ने फोकस किया । इसका असर ये हुआ कि गठबंधन ने घाटी का भरपूर समर्थन हासिल किया और जम्मू संभाग से भी सीटें निकालकर मजबूत सरकार की नींव बना ली। बड़े अहम हो गए ये सवाल एनसी का मुख्य चुनावी वादा है कि वह सत्ता में आने पर अनुच्छेद-370 की बहाली कराएगी। अब वह सत्ता संभालने के लिए तैयार है। गठबंधन में सहयोगी कांग्रेस इस मुद्दे पर पूरे चुनाव चुप रही। अब देखना होगा कि वह अपने इस सबसे बड़े वादे पर अमल कैसे करेगी? सुप्रीम कोर्ट तक इस फैसले पर मुहर लगा चुका है। एनसी ने राज्य को स्वायत्तता दिलाने का वादा किया है। पार्टी ने वर्ष 2000 में विधानसभा से इसके लिए प्रस्ताव भी पारित किया था। तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार इस प्रस्ताव को खारिज कर चुकी है। पार्टी इस वादे पर कैसे अमल करेगी। एनसी ने राजनैतिक कैदियों की रिहाई का वादा किया है। इसकी आड़ में पत्थरबाजों को छोड़ने का आश्वासन दिया गया। एलजी को जिस तरह के अधिकार दिए गए हैं, देखने लायक होगा कि वह इस मुद्दे पर कैसे बढ़ पाती है। एनसी ने 200 यूनिट बिजली व 12 एलीपीजी सिलेंडर मुफ्त देने की बात की है। इसी तरह, गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस ने महिलाओं को 3000 रुपये हर महीने देने को कहा है। नकद भुगतान वाली योजनाओं के जरिए सत्ता में आई कई सरकारें कर्ज के बोझ तले दब चुकी हैं। बिना केंद्र की मदद सैकड़ों करोड़ रुपये सालाना खर्च वाले ये वादे कैसे पूरे किए जाएंगे, इस पर भी नजरें होंगी। केंद्र व राज्य में अलग-अलग सरकारों का होना हमेशा से घाटे का सौदा साबित हुआ है। दिल्ली व केंद्र सरकार के बीच का टकराव सुर्खियां बनती रही है। यहां एलजी को कई ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जिस पर एनसी शुरू से ही सवाल उठाती रही है। अब शासकीय कामकाज में केंद्र सरकार व एलजी से समन्वय बिठाकर राज्य को आगे ले जाना सबसे अहम होगा। भाजपा : दरबार मूव और राज्य के दर्जे पर संतुष्ट नहीं कर पाई भाजपा ने चुनाव पूरी ताकत से लड़ा, लेकिन राज्य के दर्जे की बहाली व दरबार मूव के मुद्दे पर लोगों को आश्वस्त नहीं कर पाई। राज्य के दर्जे की बहाली ऐसा मुद्दा था, जिसका जम्मू से कश्मीर तक एक जैसा असर दिखा। लोग सवाल पूछते नजर आए कि राज्य का दर्जा बहाल किया जाना है, तो खत्म क्यों किया गया? और पार्टी यदि बहाली की बात करती है, तो चुनाव से पहले बहाल क्यों नहीं किया गया? पीएम मोदी व भाजपा के अन्य नेताओं ने चुनाव में बार-बार राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया, लेकिन लोगों के गले नहीं उतरा। इसी तरह, जम्मू संभाग में दरबार मूव सबसे बड़ा मुद्दा बना। कहा गया कि छह महीने तक जम्मू की अर्थव्यवस्था दरबार मूव से चलती है। यह प्रथा बंद होने से रोजगार के मौके कम हुए हैं। पार्टी की सफाई पर लोग संतुष्ट नहीं हुए। जम्मू शहर के लोगों ने भाजपा का जरूर साथ दिया, लेकिन संभाग में उम्मीद के हिसाब से समर्थन न मिलने के पीछे इसे एक अहम कारण माना जा रहा है। पीडीपी : सपना रह गया किंगमेकर बनना जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी की वैसे ही स्थिति हो गई है, जैसे उत्तर प्रदेश में बसपा की। बसपा सुप्रीमो मायावती पर आरोप लगता रहा है कि वह भाजपा के प्रति नरम रुख रखती हैं। इसके अलावा भाई व भतीजे को आगे बढ़ाना भी लोगों को रास नहीं आया। बसपा आज लोकसभा, राज्यसभा व विधान परिषद से अपना स्थान खो चुकी है। जम्मू-कश्मीर में पीडीपी भी इसी फॉर्मूले में फंस गई। भाजपा से मिलकर सरकार बनाना उसे भारी पड़ा। कश्मीर के मतदाताओं ने पार्टी को खारिज कर दिया। खुद को पीछे कर बेटी इल्तिजा को आगे बढ़ाने का मंसूबा भी धरा रह गया। इल्तिजा पहला ही चुनाव हार गईं और किंगमेकर बनने की उम्मीदें भी धरी रह गईं।
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