रविवार को मगध एक्सप्रेस के दो हिस्सों में बंटने के बाद रेल यात्रियों के मन में कई सवाल खड़े हो गए हैं। इस हादसे में कपलिंग सिस्टम के टूटने के लिए फैक्ट्री को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। इस लेख में हम इस घटना के कारणों कोच के रखरखाव और रेलवे सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे। नीचे पढ़िए पूरी...
शुभ नारायण पाठक, बक्सर। Buxar News : बीते रविवार को नई दिल्ली से पटना लौट रही मगध एक्सप्रेस के दो हिस्सों में बंटने की घटना ने रेल यात्रियों के साथ ही आमजन के मन में कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं। 20802 डाउन की एस-छह बोगी का कपलिंग उखड़ जाने के कारण यह हादसा हुआ था। घटना तब हुई, जब ट्रेन टुड़ीगंज और रघुनाथपुर रेलवे स्टेशन के बीच से गुजर रही थी। इस मामले में दक्षिण पूर्व रेलवे के रांची मंडल के अंतर्गत हटिया डिपो पर सवाल उठ रहे हैं। इसके अलावा कोच बनाने वाली फैक्ट्री भी सवाल के घेरे में आ सकती है। दरअसल कपलिंग सिस्टम किसी भी कोच का बहुत ही मजबूत हिस्सा है। इसका टूटना सामान्य बात नहीं है। ऐसे मामले में संबंधित कोच को बनाने वाली कंपनी और उसका देखरेख करने वाले रेलवे मंडल की जवाबदेही तय होती है। इस कोच की ओवरहालिंग हटिया में होती थी। अर्धवार्षिक शेड्यूल के अनुसार इसकी डी-3 सर्विसिंग बीते जून महीने में हुई थी। वहीं 18 महीने पर होने वाली एसएस-1 ओवरहालिंग नौ नवंबर 2023 को पूरी की गई थी। ट्रेन के कोच को रोलिंग स्टॉक कहा जाता है रेलवे की भाषा में ट्रेन के कोच को रोलिंग स्टॉक कहा जाता है। इसमें फ्रेट स्टाक और कोचिंग स्टाक अलग-अलग होते हैं। हर कोच को एक खास नंबर दिया जाता है। कोच पर उसकी देखरेख के लिए जिम्मेदार रेल मंडल का नाम भी अंकित होता है। मगध एक्सप्रेस के जिस कोच के साथ यह हादसा हुआ, वह वर्ष 2018 में बना था। इस पर निर्माण तिथि 13 नवंबर 2018 अंकित है। यह कोच एलडब्ल्यूएचसीएन श्रेणी का है। इसका मतलब होता है लिंक हाफमैन बुश टाइप का 80 सीटों वाला थ्री टियर सामान्य शयनयान कोच। इसकी देखरेख का जिम्मा दक्षिण पूर्व रेलवे का है, जिसका मुख्यालय कोलकाता में है। इस ट्रेन में जिस कोचिंग रैक का इस्तेमाल होता है, वही दक्षिण-पूर्व रेलवे के रांची मंडल से हटिया-इस्लामपुर एक्सप्रेस के रूप में चलती है। हर यात्रा से पहले किसी भी रैक की उसके आरंभिक स्टेशन पर प्राथमिक जांच की जाती है। इसके अलावा नियमित अंतराल पर कोच की ओवरहालिंग भी होती है। हर आरंभिक स्टेशन पर होती है पूरी रैक की जांच किसी भी ट्रेन की रैक अलग-अलग कोच को जोड़कर तैयार होती है। आरंभिक स्टेशन पर हर बार रैक की जांच स्टेशन मास्टर इंजीनियरिंग विभाग से कराता है। इसमें जांच की जाती है कि रैक के सभी कोच चलने के लिए पूरी तरह फिट हैं। इंजीनियरिंग विभाग ट्रेन के खुलने से पहले उसके लोको पायलट और गार्ड से इस बात की पुष्टि करता है कि ब्रेकिंग सिस्टम 100 प्रतिशत काम कर रहा है और एयर प्रेशर बिल्कुल दुरुस्त है। मध्यवर्ती स्टेशनों पर भी होती है जांच ट्रेन के चलते समय मध्यवर्ती स्टेशनों के पास ट्रैक के किनारे नीचे की तरफ तेज जलती लाइट आपने देखी होगी। यहां से दिन-रात गुजरने वाली सभी ट्रेनों के निचले हिस्से की निगरानी की जाती है। यहां तैनात स्टाफ इस बात को देखता है कि कोच के निचले हिस्से में कोई गड़बड़ी या अनापेक्षित आवाज तो नहीं है। यह जांच चलती हुई ट्रेन की होती है, जिसकी रफ्तार 30 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक नहीं हो। इसके लिए बड़े रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्म के ठीक सटे व्यवस्था होती है। एक्सल बाक्स का तापमान इलेक्ट्रानिक डिवाइस से मापा जाता है। कोचिंग डिपो में तीन तरह की जांच ट्रेन जिस डिपो से खुलती है, वहां तीन तरह की जांच होती है। इनमें एक जांच हर ट्रिप से पहले या साप्ताहिक होती है। दूसरी जांच मासिक और तीसरी अर्धवार्षिक आधार पर होती है। वर्कशाप में होती तीन तरह की सर्विसिंग देशभर में फैले रेलवे के करीब 44 वर्कशाप में हर कोच की नियमित सर्विसिंग होती है। ऐसी जांच क्रमश: 18, 36 और 72 महीने पर होती है। हर जांच के लिए चेकलिस्ट निर्धारित है। हर बार बोगी फ्रेम की जांच जरूर होती है। स्टील से बने एलएचबी कोच की निर्धारित सेवा अवधि 35 वर्ष है। ये कोच परंपरागत आइसीएफ कोच के मुकाबले किसी भी हादसे की स्थिति में क्षति को न्यूनतम कर देते हैं। ये भी पढ़ें Special Trains: छठ-दीवाली में घर जाने में नहीं होगी दिक्कत, दिल्ली से बिहार के लिए चलेंगी स्पेशल ट्रेनें Magadh Express : बक्सर जिले में हादसे का शिकार हुई मगध एक्सप्रेस, देखते ही देखते दो हिस्सों में बंट गई ट्रेन.
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