Madan Lal Dhingra: मदन लाल धींगरा ने ब्रिटिश अफसर कर्ज़न वायली की हत्या कर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गहरी छाप छोड़ी. सिर्फ 46 दिनों में उन्हें फांसी दी गई. उनकी शहादत ने हिंदुस्तानी युवाओं में आज़ादी की आग और जोश भरा.
Madan Lal Dhingra : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 17 अगस्त 1909 का दिन एक अमर गाथा के रूप में दर्ज है, जब मात्र 25 वर्षीय क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा ने सर्वोच्च बलिदान दिया. यह वह दौर था जब हिंदुस्तान की धरती पर स्वतंत्रता की चिंगारी धधक रही थी और शूरवीर क्रांतिकारी अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का प्रण ले चुके थे.
उसी दौर में, उन्होंने खुलेआम अंग्रेज़ अफसर कर्ज़न वायली को गोली मारकर यह संदेश दिया कि भारतवासी अब गुलामी बर्दाश्त नहीं करेंगे. इस घटना से पूरा ब्रिटिश साम्राज्य हिल गया और उन्हें सिर्फ 46 दिनों में फांसी पर चढ़ा दिया गया. मगर उनकी शहादत ने हिंदुस्तानी युवाओं के दिलों में आज़ादी की आग और भड़का दी. अमृतसर से लंदन तक का सफर मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 सितंबर 1883 को पंजाब के अमृतसर में एक संपन्न परिवार में हुआ था. पढ़ाई में तेज होने के कारण उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में दाखिला लिया. वहीं उनकी मुलाकात ‘इंडिया हाउस’ में क्रांतिकारी साथियों से हुई, जहां देश की आज़ादी की योजनाएं बनती थीं. किताब द लाइफ एंड टाइम ऑफ मदन लाल ढींगरा में बताया गया है कि इंडिया हाउस ने ही उन्हें आज़ादी की लड़ाई में झोंक दिया. इसी दौरान वे विनायक दामोदर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा के संपर्क में आए. जब खून खौल उठा लंदन में रहकर वे खुदीराम बोस, कन्हाई लाल दत्त और अन्य क्रांतिकारियों को मिली फांसी से बेहद आहत हुए. उसी दौर में लाला लाजपत राय का भाषण सुनकर उनका खून खौल उठा. विलासिता की ज़िंदगी छोड़कर उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लेने का रास्ता चुना. 1 जुलाई 1909 को उन्होंने कर्नल सर विलियम हट कर्जन वायली को गोली मार दी. वायली भारतीयों पर अत्याचार का प्रतीक माना जाता था. इस घटना ने ब्रिटिश शासन को गहरी चोट दी और दुनिया को दिखा दिया कि भारत के वीर पीछे हटने वाले नहीं हैं. फांसी से पहले आखिरी संदेश वायली की हत्या के बाद अंग्रेज सरकार सकते में आ गई. सिर्फ 46 दिनों में ही मुकदमा चलाकर ढींगरा को फांसी की सज़ा सुना दी गई. 17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटनविले जेल में उन्हें फांसी दे दी गई. इतिहासकारों के मुताबिक यह ब्रिटिश न्यायपालिका का सबसे छोटा मुकदमा था. ढींगरा ने अदालत में साफ कहा था कि उन्हें कोई पछतावा नहीं है, बल्कि भारत की आज़ादी के लिए जान देना उनके लिए सम्मान की बात है. फांसी के दिन जेल के बाहर कई भारतीय क्रांतिकारी जुटे और उन्हें श्रद्धांजलि दी. उनकी शहादत ने न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया के स्वतंत्रता आंदोलनों को नई ऊर्जा दी.
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