Karnataka political crisis: संकट में एचडीके सरकारः गठबंधन के मुफीद नहीं है कर्नाटक की राजनीति? - another government in crisis proves karnataka politics not designed for coalition | Navbharat Times

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संकट में कुमारस्वामी: गठबंधन सरकार के मुफीद नहीं कर्नाटक?

कर्नाटक सरकार के 31 मंत्रियों के इस्तीफे के बाद राज्य में सियासी संकट गहरा गया हैकर्नाटक के सियासी इतिहास में हालांकि, गठबंधन सरकारें कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई हैंकर्नाटक में मंत्रियों और विधायकों के इस्तीफों की जारी सियासी नौटंकी के बीचकी सरकार के गिरने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। रविवार को कांग्रेस के 13 विधायकों के त्यागपत्र देने के बाद सोमवार को राज्य सरकार के 31 मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया। ऐसे में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार का कार्यकाल पूरा किए बिना गिरना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि,यह पहली बार नहीं है। इतिहास देखें तो राज्य में चुनाव बाद गठबंधन वाली सरकारें कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई हैं।कुमारस्वामी धोखेबाज आदमी है । वो कभी विश्वसनीय नहीं रहे । इसलिए अब उनपर कोई भरोसा नहीं करता । उनका जाना तय है ।राष्ट्रीय पार्टियों के प्रभुत्व और क्षेत्रीय पार्टियों की अपनी ताकत बढ़ाने में असक्षमता की वजह से कर्नाटक में कई बार गठबंधन सरकारें कार्यकाल पूरा होने से पहले ही गिर गईं। पहली बार ऐसा साल 1983 में हुआ था जब विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी ने 95 सीटें जीतकर सरकार बनाने की दावेदारी हासिल की थी। जेएनपी ने बाद में 18 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई और रामकृष्ण हेगड़े सीएम बने।साल 1984 के लोकसभा चुनावों में जेएनपी के शर्मनाक प्रदर्शन के बाद सीएम हेगड़े ने अपनी 354 दिनों की सरकार को भंग कर दिया और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि उनकी पार्टी को लोगों का विश्वास हासिल नहीं है। इसके बाद राज्य में अगली गठबंधन सरकार साल 2004 में बनीं। 65 सीटों वाली कांग्रेस और 58 सीटों वाली जेडीएस ने साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई और धरम सिंह मुख्यमंत्री बने लेकिन दो साल के भीतर ही जेडीएस में फूट के बाद सरकार गिर गई। कहा जाता है कि सरकार गिराने में मौजूदा सीएम एचडी कुमारस्वामी की बड़ी भूमिका थी।इसके ठीक बाद कुमारस्वामी बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने में कामयाब रहे। कुमारस्वामी ने बीजेपी से वादा किया था कि दोनों पार्टियां 20-20 महीने के लिए सीएम पद साझा करेंगी। एग्रीमेंट के मुताबिक, पहले कुमारस्वामी सीएम बने। इसके बाद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनना था लेकिन एचडीके के 20 महीने का कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकार गिर गई। दरअसल, कुमारस्वामी येदियुरप्पा के सीएम बनने के पक्ष में नहीं थे।चुनाव बाद गठबंधन कर बनने वाली सरकारों के कार्यकाल पूरा करने में नाकामी के ऐसे इतिहास के बाद कर्नाटक में 13 महीने पहले कांग्रेस के समर्थन से एचडीके सरकार अस्तित्व में आई थी। सरकार में आंतरिक मतभेदों की लगातार आती खबरों के बीच रविवार से राज्य में इस्तीफों का दौर शुरू हो गया, जिसके बाद कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार का समयपूर्व गिरना तय माना जा रहा है। दरअसल, सच्चाई यही है कि कर्नाटक में चुनाव के बाद गठबंधन से बनने वाली सरकारें कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक के पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में ऐसी सरकारें सफल रही हैं तो इसके पीछे कारण है कि वहां क्षेत्रीय दल मजबूत स्थिति में हैं। इसके अलावा केरल और तमिलनाडु में भी गठबंधन सरकारों ने अपना कार्यकाल सुचारु ढंग से पूरा किया है। हालांकि, इन राज्यों में ज्यादातर बार गठबंधन चुनाव से पहले के रहे हैं।.

कर्नाटक सरकार के 31 मंत्रियों के इस्तीफे के बाद राज्य में सियासी संकट गहरा गया हैकर्नाटक के सियासी इतिहास में हालांकि, गठबंधन सरकारें कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई हैंकर्नाटक में मंत्रियों और विधायकों के इस्तीफों की जारी सियासी नौटंकी के बीचकी सरकार के गिरने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। रविवार को कांग्रेस के 13 विधायकों के त्यागपत्र देने के बाद सोमवार को राज्य सरकार के 31 मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया। ऐसे में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार का कार्यकाल पूरा किए बिना गिरना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि,यह पहली बार नहीं है। इतिहास देखें तो राज्य में चुनाव बाद गठबंधन वाली सरकारें कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई हैं।कुमारस्वामी धोखेबाज आदमी है । वो कभी विश्वसनीय नहीं रहे । इसलिए अब उनपर कोई भरोसा नहीं करता । उनका जाना तय है ।राष्ट्रीय पार्टियों के प्रभुत्व और क्षेत्रीय पार्टियों की अपनी ताकत बढ़ाने में असक्षमता की वजह से कर्नाटक में कई बार गठबंधन सरकारें कार्यकाल पूरा होने से पहले ही गिर गईं। पहली बार ऐसा साल 1983 में हुआ था जब विधानसभा चुनावों में जनता पार्टी ने 95 सीटें जीतकर सरकार बनाने की दावेदारी हासिल की थी। जेएनपी ने बाद में 18 सीटें जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई और रामकृष्ण हेगड़े सीएम बने।साल 1984 के लोकसभा चुनावों में जेएनपी के शर्मनाक प्रदर्शन के बाद सीएम हेगड़े ने अपनी 354 दिनों की सरकार को भंग कर दिया और नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि उनकी पार्टी को लोगों का विश्वास हासिल नहीं है। इसके बाद राज्य में अगली गठबंधन सरकार साल 2004 में बनीं। 65 सीटों वाली कांग्रेस और 58 सीटों वाली जेडीएस ने साथ मिलकर राज्य में सरकार बनाई और धरम सिंह मुख्यमंत्री बने लेकिन दो साल के भीतर ही जेडीएस में फूट के बाद सरकार गिर गई। कहा जाता है कि सरकार गिराने में मौजूदा सीएम एचडी कुमारस्वामी की बड़ी भूमिका थी।इसके ठीक बाद कुमारस्वामी बीएस येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने में कामयाब रहे। कुमारस्वामी ने बीजेपी से वादा किया था कि दोनों पार्टियां 20-20 महीने के लिए सीएम पद साझा करेंगी। एग्रीमेंट के मुताबिक, पहले कुमारस्वामी सीएम बने। इसके बाद येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनना था लेकिन एचडीके के 20 महीने का कार्यकाल पूरा होने के बाद सरकार गिर गई। दरअसल, कुमारस्वामी येदियुरप्पा के सीएम बनने के पक्ष में नहीं थे।चुनाव बाद गठबंधन कर बनने वाली सरकारों के कार्यकाल पूरा करने में नाकामी के ऐसे इतिहास के बाद कर्नाटक में 13 महीने पहले कांग्रेस के समर्थन से एचडीके सरकार अस्तित्व में आई थी। सरकार में आंतरिक मतभेदों की लगातार आती खबरों के बीच रविवार से राज्य में इस्तीफों का दौर शुरू हो गया, जिसके बाद कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार का समयपूर्व गिरना तय माना जा रहा है। दरअसल, सच्चाई यही है कि कर्नाटक में चुनाव के बाद गठबंधन से बनने वाली सरकारें कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक के पड़ोसी राज्यों महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में ऐसी सरकारें सफल रही हैं तो इसके पीछे कारण है कि वहां क्षेत्रीय दल मजबूत स्थिति में हैं। इसके अलावा केरल और तमिलनाडु में भी गठबंधन सरकारों ने अपना कार्यकाल सुचारु ढंग से पूरा किया है। हालांकि, इन राज्यों में ज्यादातर बार गठबंधन चुनाव से पहले के रहे हैं।

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