Interview: मनोज बाजपेयी बोले- ये सिर्फ भ्रम है कि सिनेमा कमाल नहीं कर पा रहा और ओटीटी धमाल मचा रहा

मनोज बाजपेयी फिल्म साइलेंस-2 News

Interview: मनोज बाजपेयी बोले- ये सिर्फ भ्रम है कि सिनेमा कमाल नहीं कर पा रहा और ओटीटी धमाल मचा रहा
मनोज बाजपेयी इंटरव्यूमनोज बाजपेयी ओटीटी पर कहाManoj Bajpayee Film Silence 2
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मनोज बाजपेयी जल्द ही फिल्म साइलेंस-2 में एसीपी अविनाश के रूप में नजर आएंगे। उन्होंने अपने फिल्मी करियर, ओटीटी, बायॉपिक के अलावा फैमिली और अपने सपनों को लेकर खुलकर बातें की। उन्होंने बताया कि उनकी वाइफ भी सिनेमा में कमबैक का इंतजार कर रही हैं।

करीब 30 साल से भी ज्यादा वक्त से ऐक्टिंग इंडस्ट्री में सक्रिय मनोज बाजपेयी वक्त के साथ लगातार गाढ़े होते गए। पढ़ने-लिखने के शौक के साथ वह खुद भी एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं। इसी वजह से दूसरे अपेक्षाएं रखें या ना रखें, लेकिन वह खुद से बहुत अपेक्षाएं रखते हैं। विलेन हो या हीरो, उन्होंने अपनी अदाकारी से हर किरदार को पर्दे पर घोलकर साकार किया है। इन दिनों उन्हें गुत्थियां सुलझाते हुए भी खूब देखा जा रहा है। अब मनोज बाजपेयी जल्द ही फिल्म साइलेंस-2 में एसीपी अविनाश के रूप में फिर से नई गुत्थी सुलझाते दिखेंगे। बीते दिनों वह लखनऊ आए तो उन्होंने अपने फिल्मी करियर, ओटीटी, बायॉपिक से लेकर रंगमंच और खुद की अपेक्षाओं के बारे में हमसे बात की। Exclusive: 'साइलेंस 2' में क्‍या है खास! प्राची देसाई और मनोज बाजपेई ने बताया कब और कैसे बदली जिंदगीमेरा सपना पहाड़ों पर रहने का हैमैं 30 साल से ज्यादा वक्त से फिल्म इंडस्ट्री में हूं। अब मैं चीजें सीख-सीखकर बहुत गाढ़ा हो गया हूं। मुझे पढ़ाई-लिखाई का शौक है। गाढ़े होने की वजह से ही मैं जितना हो सके बेहतर निकालने की कोशिश करता हूं। अभिनय के साथ मुझे ज्ञान जुटाने का शौक है। मगर पहाड़ों पर घर का सपना बुनने का इससे कोई लेना देना नहीं। हां, कोरोना काल में पहाड़ों पर काफी रहना हुआ। आठ महीने वहां रहा था। उस वक्त वहीं शूटिंग चल रही थी, जिसे रोक दिया गया था। मैंने लॉकडाउन के बाद वहीं रुकना उचित समझा था। अब सपना तो है पहाड़ों पर रहने का, देखिए आगे सच हो भी पाता है कि नहीं। मनोज बाजपेयी-प्राची देसाई स्टारर 'साइलेंस 2' का ग्रैंड ट्रेलर लॉन्च इवेंट, देखें वीडियोपत्नी हर तरह के किरदार करने में सक्षममैं और पत्नी नेहा साथ में काम करना चाहते हैं, लेकिन हम दोनों अपनी बात किसी पर थोपते नहीं हैं। हमारी व्यक्तिगत राय अलग हो सकती हैं। कोई ऐसी स्क्रिप्ट जो मुझे पसंद आने के साथ उन्हें भी आ जाए तो हम जरूर उस पर काम करेंगे। मेरे हिसाब से उनके लिए कोई एक जॉनर नहीं है, जिस पर वह फिट बैठें। वह हर तरह के किरदारों को बढ़िया तरीके से निभाने में सक्षम हैं। बच्चे की वजह से उन्होंने ऐक्टिंग से ब्रेक लिया था। अब वह अच्छी स्क्रिप्ट का इंतजार कर रही हैं। जोरम ओटीटी पर बहुत अच्छा कर रही'जोरम' को लेकर कहना चाहूंगा कि लोगों को लगता है कि ऐसी फिल्मों को थिएटर में बेहतर रिस्पॉन्स नहीं मिलता, लेकिन मैं बताना चाहूंगा कि 250 स्क्रीन पर हमने इस फिल्म को प्रतीकात्मक रूप से रिलीज किया था। 250 स्क्रीन पर रिलीज होने वाली फिल्म से आप कमाई की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। वो उतनी ही और सीमित कमाई दे पाती है। बस, आपको उतना ही संतोष दे देगी कि आपकी फिल्म थिएटर में रिलीज हुई लेकिन यह तीन-तीन ओटीटी प्लैटफॉर्म पर चल रही है और उसमें जोरम बहुत अच्छा कर रही है। रंगमंच को मिले सरकार का सपोर्टरंगमंच पूरे तरीके से लोगों तक तभी पहुंच पाएगा, जब सरकार का सपोर्ट होगा। जगह-जगह पर कलाकारों को उस तरह की सुविधाएं दी जाएं कि वह शहर या राज्य के अलग-अलग कोनों पर जाकर सरकार की मदद से लगातार परफॉर्मेस दें। ऐसी सांस्कृतिक गतिविधियां हर राज्य के कोने-कोने में होनी चाहिए, जहां पर ना सिर्फ थिएटर बल्कि वहां की लोक संस्कृतियां और लोक संगीत सब पनपे। ये सब थिएटर के एक्सटेंड वर्जन हैं। सरकार इसमें आगे आए तो रंगमंच का हर रंग जगह बिखरेगा। Sunil Pal Exclusive: पैसों के लिए भूखे भेड़िए बन गए हैं मनोज बाजपेयीलखनऊ में शूटिंग का अनुभव शानदार रहाफिल्म ‘भैया जी’ हमने लखनऊ में शूट की थी। यह एक बड़े स्तर की कमर्शल मूवी है। इस तरह की फिल्म मैंने आजतक नहीं की। लखनऊ में शूटिंग को लेकर मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा। किसी भी शहर में शूटिंग करते वक्त अगर स्थानीय कारणों से एक दिन या दो घंटे की भी शूटिंग रद्द नहीं होती तो इसे माना जाएगा कि प्रशासन और लोगों का सपोर्ट बहुत बेहतरीन रहा। ऐसा ही ‘भैया जी’ के साथ भी हुआ था।सबको मशहूर लोगों की बायॉपिक याद रहतीबायॉपिक के सवाल पर मनोज बाजपेयी कहते हैं, 'देखिए, मैंने भी की है लेकिन अफसोसजनक है कि सबको मशहूर लोगों की बायॉपिक ही याद रहती है या उसकी वो बात करते हैं। मैंने फिल्म अलीगढ़ की थी, जिसे बहुत नाम व सम्मान मिला। वह फिल्म किसी प्रफेसर की निजी जिंदगी की कहानी थी। उसको भी मैं बायॉपिक ही बोलता हूं। मेरे लिए जरूरी है कि किरदार मुझे उत्साहित कर रहा या चुनौती दे रहा है कि नहीं। मैं उन किरदारों को नहीं छोड़ता जो ये कहे कि अगर नहीं किया तो अभिनेता का जीवन असफल रह जाएगा। अगर आगे भी किसी की बायॉपिक मिलती है तो मैं उसे करने के लिए तैयार हूं।आम आदमी को नहीं पता कि क्या है फॉरेंसिक जांचसाइलेंस के इस सीजन में मैं फिर से सुपरकॉप के रूप में गुत्थियां सुलझाते नजर आ रहा हूं। वैसे भी, इसमें गुत्थी सुलझाने का मतलब है कि फॉरेंसिक की सारी रिपोर्ट का विश्लेषण करना और जांच को उसके आधार पर करके अपनी पूरी की पूरी खोज को आगे लेकर जाना। यह पुलिसवालों के लिए लंबा-चौड़ा काम होता है क्योंकि जो आम आदमी है, उसे नहीं पता कि फॉरेंसिक होता क्या है, जांच-परिणाम को कैसे पढ़ा जाता है। उसमें कई सारे तकनीकी शब्द होते हैं, जिन्हें सीखना-समझना जरूरी है। यहां तक कि खून के छींटे की दिशा पर भी ध्यान दिया जाता है कि किस दिशा में छींटे गईं और किस तरह की छींटे हैं। मुझे भी ये पता नहीं था। मैं जब साइलेंस-1 कर रहा था, तब डायरेक्टर के साथ उठा-बैठा, फॉरेंसिक वालों से बात की, फिर जाकर सारी चीजें साफ होनी शुरू हुईं। इस वजह से ऐसी सीरीज अच्छे से लिखी जाएं तो ना सिर्फ सबको एजुकेट करेंगी बल्कि फिल्मवालों को भी चुनौती देंगी कि इतनी जटिल चीजों को कैसे सरल बनाएं और जो मिस्ट्री-सस्पेंस है, उसको और ज्यादा गाढ़ा बनाकर दर्शकों को सामने परोसें।कहना गलत है कि सिनेमा कमाल नहीं कर पा रहायह कहना पूरी तरह से गलत होगा कि सिनेमा कमाल नहीं कर पा रहा और ओटीटी धमाल मचा रहा है। यह सिर्फ एक भ्रम है, जो लोगों के जेहन में उतर गया है। बहुत सारा ओटीटी का कॉन्टेंट, जिसमें फिल्में व सीरीज आती हैं, वे अच्छा नहीं भी कर पाती हैं। वैसे ही, थिएटर सिनेमा है। उसे बस जरा सा समय चाहिए। थिएटर को कोरोना की ऐसी बुरी मार पड़ी है कि लोग तो आ रहे लेकिन कुछेक चुनिंदा फिल्मों के लिए। हालांकि, अब उन्होंने फिर से जाना शुरू कर दिया है। मेरे खयाल से अगले एक साल में पूरा दर्शक समुदाए फिर से थिएटर की ओर लौट आएगा। बशर्ते, अगर कोई अनहोनी घटना नहीं घटती है तो।मैं खुद से बहुत अपेक्षाएं रखता हूंअभिनेता के अतिरिक्त, मैं खुद में बहुत जिम्मेदार व्यक्ति हूं। मैं खुद से बहुत सी अपेक्षाएं रखता हूं इसलिए दर्शक मुझसे क्या उम्मीद रखते, इस तरह का बाहरी दबाव लेने की मुझे जरूरत नहीं पड़ती। मैं अपनी अपेक्षाओं और ऐक्टर की जिम्मेदारी से स्वयं में इतना दब जाता हूं कि पूरे समय उसके साथ ही न्याय करता रहता हूं। मुझे ऐक्टिंग में मजा आता है। बाहर से प्रेशर लेकर मैं काम नहीं कर पाऊंगा। जो प्रेशर है, वो भीतर से है। वही लेकर मैं पैदा हुआ हूं। बिना किसी समझौते के अच्छा काम करने की ख्वाहिश और उसे अंजाम तक लेकर जाना मेरी नस-नस में है।.

करीब 30 साल से भी ज्यादा वक्त से ऐक्टिंग इंडस्ट्री में सक्रिय मनोज बाजपेयी वक्त के साथ लगातार गाढ़े होते गए। पढ़ने-लिखने के शौक के साथ वह खुद भी एक जिम्मेदार व्यक्ति हैं। इसी वजह से दूसरे अपेक्षाएं रखें या ना रखें, लेकिन वह खुद से बहुत अपेक्षाएं रखते हैं। विलेन हो या हीरो, उन्होंने अपनी अदाकारी से हर किरदार को पर्दे पर घोलकर साकार किया है। इन दिनों उन्हें गुत्थियां सुलझाते हुए भी खूब देखा जा रहा है। अब मनोज बाजपेयी जल्द ही फिल्म साइलेंस-2 में एसीपी अविनाश के रूप में फिर से नई गुत्थी सुलझाते दिखेंगे। बीते दिनों वह लखनऊ आए तो उन्होंने अपने फिल्मी करियर, ओटीटी, बायॉपिक से लेकर रंगमंच और खुद की अपेक्षाओं के बारे में हमसे बात की। Exclusive: 'साइलेंस 2' में क्‍या है खास! प्राची देसाई और मनोज बाजपेई ने बताया कब और कैसे बदली जिंदगीमेरा सपना पहाड़ों पर रहने का हैमैं 30 साल से ज्यादा वक्त से फिल्म इंडस्ट्री में हूं। अब मैं चीजें सीख-सीखकर बहुत गाढ़ा हो गया हूं। मुझे पढ़ाई-लिखाई का शौक है। गाढ़े होने की वजह से ही मैं जितना हो सके बेहतर निकालने की कोशिश करता हूं। अभिनय के साथ मुझे ज्ञान जुटाने का शौक है। मगर पहाड़ों पर घर का सपना बुनने का इससे कोई लेना देना नहीं। हां, कोरोना काल में पहाड़ों पर काफी रहना हुआ। आठ महीने वहां रहा था। उस वक्त वहीं शूटिंग चल रही थी, जिसे रोक दिया गया था। मैंने लॉकडाउन के बाद वहीं रुकना उचित समझा था। अब सपना तो है पहाड़ों पर रहने का, देखिए आगे सच हो भी पाता है कि नहीं। मनोज बाजपेयी-प्राची देसाई स्टारर 'साइलेंस 2' का ग्रैंड ट्रेलर लॉन्च इवेंट, देखें वीडियोपत्नी हर तरह के किरदार करने में सक्षममैं और पत्नी नेहा साथ में काम करना चाहते हैं, लेकिन हम दोनों अपनी बात किसी पर थोपते नहीं हैं। हमारी व्यक्तिगत राय अलग हो सकती हैं। कोई ऐसी स्क्रिप्ट जो मुझे पसंद आने के साथ उन्हें भी आ जाए तो हम जरूर उस पर काम करेंगे। मेरे हिसाब से उनके लिए कोई एक जॉनर नहीं है, जिस पर वह फिट बैठें। वह हर तरह के किरदारों को बढ़िया तरीके से निभाने में सक्षम हैं। बच्चे की वजह से उन्होंने ऐक्टिंग से ब्रेक लिया था। अब वह अच्छी स्क्रिप्ट का इंतजार कर रही हैं। जोरम ओटीटी पर बहुत अच्छा कर रही'जोरम' को लेकर कहना चाहूंगा कि लोगों को लगता है कि ऐसी फिल्मों को थिएटर में बेहतर रिस्पॉन्स नहीं मिलता, लेकिन मैं बताना चाहूंगा कि 250 स्क्रीन पर हमने इस फिल्म को प्रतीकात्मक रूप से रिलीज किया था। 250 स्क्रीन पर रिलीज होने वाली फिल्म से आप कमाई की अपेक्षा नहीं कर सकते हैं। वो उतनी ही और सीमित कमाई दे पाती है। बस, आपको उतना ही संतोष दे देगी कि आपकी फिल्म थिएटर में रिलीज हुई लेकिन यह तीन-तीन ओटीटी प्लैटफॉर्म पर चल रही है और उसमें जोरम बहुत अच्छा कर रही है। रंगमंच को मिले सरकार का सपोर्टरंगमंच पूरे तरीके से लोगों तक तभी पहुंच पाएगा, जब सरकार का सपोर्ट होगा। जगह-जगह पर कलाकारों को उस तरह की सुविधाएं दी जाएं कि वह शहर या राज्य के अलग-अलग कोनों पर जाकर सरकार की मदद से लगातार परफॉर्मेस दें। ऐसी सांस्कृतिक गतिविधियां हर राज्य के कोने-कोने में होनी चाहिए, जहां पर ना सिर्फ थिएटर बल्कि वहां की लोक संस्कृतियां और लोक संगीत सब पनपे। ये सब थिएटर के एक्सटेंड वर्जन हैं। सरकार इसमें आगे आए तो रंगमंच का हर रंग जगह बिखरेगा। Sunil Pal Exclusive: पैसों के लिए भूखे भेड़िए बन गए हैं मनोज बाजपेयीलखनऊ में शूटिंग का अनुभव शानदार रहाफिल्म ‘भैया जी’ हमने लखनऊ में शूट की थी। यह एक बड़े स्तर की कमर्शल मूवी है। इस तरह की फिल्म मैंने आजतक नहीं की। लखनऊ में शूटिंग को लेकर मेरा अनुभव बहुत अच्छा रहा। किसी भी शहर में शूटिंग करते वक्त अगर स्थानीय कारणों से एक दिन या दो घंटे की भी शूटिंग रद्द नहीं होती तो इसे माना जाएगा कि प्रशासन और लोगों का सपोर्ट बहुत बेहतरीन रहा। ऐसा ही ‘भैया जी’ के साथ भी हुआ था।सबको मशहूर लोगों की बायॉपिक याद रहतीबायॉपिक के सवाल पर मनोज बाजपेयी कहते हैं, 'देखिए, मैंने भी की है लेकिन अफसोसजनक है कि सबको मशहूर लोगों की बायॉपिक ही याद रहती है या उसकी वो बात करते हैं। मैंने फिल्म अलीगढ़ की थी, जिसे बहुत नाम व सम्मान मिला। वह फिल्म किसी प्रफेसर की निजी जिंदगी की कहानी थी। उसको भी मैं बायॉपिक ही बोलता हूं। मेरे लिए जरूरी है कि किरदार मुझे उत्साहित कर रहा या चुनौती दे रहा है कि नहीं। मैं उन किरदारों को नहीं छोड़ता जो ये कहे कि अगर नहीं किया तो अभिनेता का जीवन असफल रह जाएगा। अगर आगे भी किसी की बायॉपिक मिलती है तो मैं उसे करने के लिए तैयार हूं।आम आदमी को नहीं पता कि क्या है फॉरेंसिक जांचसाइलेंस के इस सीजन में मैं फिर से सुपरकॉप के रूप में गुत्थियां सुलझाते नजर आ रहा हूं। वैसे भी, इसमें गुत्थी सुलझाने का मतलब है कि फॉरेंसिक की सारी रिपोर्ट का विश्लेषण करना और जांच को उसके आधार पर करके अपनी पूरी की पूरी खोज को आगे लेकर जाना। यह पुलिसवालों के लिए लंबा-चौड़ा काम होता है क्योंकि जो आम आदमी है, उसे नहीं पता कि फॉरेंसिक होता क्या है, जांच-परिणाम को कैसे पढ़ा जाता है। उसमें कई सारे तकनीकी शब्द होते हैं, जिन्हें सीखना-समझना जरूरी है। यहां तक कि खून के छींटे की दिशा पर भी ध्यान दिया जाता है कि किस दिशा में छींटे गईं और किस तरह की छींटे हैं। मुझे भी ये पता नहीं था। मैं जब साइलेंस-1 कर रहा था, तब डायरेक्टर के साथ उठा-बैठा, फॉरेंसिक वालों से बात की, फिर जाकर सारी चीजें साफ होनी शुरू हुईं। इस वजह से ऐसी सीरीज अच्छे से लिखी जाएं तो ना सिर्फ सबको एजुकेट करेंगी बल्कि फिल्मवालों को भी चुनौती देंगी कि इतनी जटिल चीजों को कैसे सरल बनाएं और जो मिस्ट्री-सस्पेंस है, उसको और ज्यादा गाढ़ा बनाकर दर्शकों को सामने परोसें।कहना गलत है कि सिनेमा कमाल नहीं कर पा रहायह कहना पूरी तरह से गलत होगा कि सिनेमा कमाल नहीं कर पा रहा और ओटीटी धमाल मचा रहा है। यह सिर्फ एक भ्रम है, जो लोगों के जेहन में उतर गया है। बहुत सारा ओटीटी का कॉन्टेंट, जिसमें फिल्में व सीरीज आती हैं, वे अच्छा नहीं भी कर पाती हैं। वैसे ही, थिएटर सिनेमा है। उसे बस जरा सा समय चाहिए। थिएटर को कोरोना की ऐसी बुरी मार पड़ी है कि लोग तो आ रहे लेकिन कुछेक चुनिंदा फिल्मों के लिए। हालांकि, अब उन्होंने फिर से जाना शुरू कर दिया है। मेरे खयाल से अगले एक साल में पूरा दर्शक समुदाए फिर से थिएटर की ओर लौट आएगा। बशर्ते, अगर कोई अनहोनी घटना नहीं घटती है तो।मैं खुद से बहुत अपेक्षाएं रखता हूंअभिनेता के अतिरिक्त, मैं खुद में बहुत जिम्मेदार व्यक्ति हूं। मैं खुद से बहुत सी अपेक्षाएं रखता हूं इसलिए दर्शक मुझसे क्या उम्मीद रखते, इस तरह का बाहरी दबाव लेने की मुझे जरूरत नहीं पड़ती। मैं अपनी अपेक्षाओं और ऐक्टर की जिम्मेदारी से स्वयं में इतना दब जाता हूं कि पूरे समय उसके साथ ही न्याय करता रहता हूं। मुझे ऐक्टिंग में मजा आता है। बाहर से प्रेशर लेकर मैं काम नहीं कर पाऊंगा। जो प्रेशर है, वो भीतर से है। वही लेकर मैं पैदा हुआ हूं। बिना किसी समझौते के अच्छा काम करने की ख्वाहिश और उसे अंजाम तक लेकर जाना मेरी नस-नस में है।

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