Fighter Jet Engine Project: दुनिया के साथ ही देश के सामरिक हालात लगातार बदल रहे हैं. ऐसे में भारत के लिए डिफेंस सेक्टर को और मजबूत और उन्नत बनाना बेहद जरूरी है. भारत ने 5th जेनरेशन का फाइटर जेट बनाने का प्रोजेक्ट लॉन्च किया है. इसमें शक्तिशाली देसी इंजन का इस्तेमाल किया जाएगा.
Fighter Jet Engine Project : ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने पूरे डिफेंस सिस्टम को अपग्रेड करने के लिए अभियान के स्तर पर काम करना शुरू कर दिया है. तेजस फाइटर जेट के उन्नत संस्करण को डेवलप करने के साथ ही पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट को लेकर भी प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई है.
इसके अलावा एक और बड़ा कदम उठाया गया है. देस में ही शक्तिशाली जेट इंजन बनाने की प्रक्रिया को भी रफ्तार दे दी गई है. फ्रांस की डिफेंस कंपनी साफ्रान इसमें डीआरडीओ की सहयात्री होगी. DRDO के तहत आने वाले गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टेब्लिशमेंट और साफ्रान मिलकर हाई-पावर जेट इंजन डेवलप करेंगे. शुरुआत में 120 Kn क्षमता वाला इंजन बनाया जाएगा, उसके बाद 140 Kn के इंजन डेवलप किए जाएंगे. बता दें कि फिलहाल F-35, Su-57 और राफेल जैसे फाइटर जेट में भी 140 Kn जितना पावरफुल इंजन नहीं है. इस बात की पूरी संभावना है कि देसी इंजन से बनाए जाने वाले 5th जेनरेशन फाइटर जेट में ब्रह्मोस या उससे भी खतरनाक मिसाइल्स इंटीग्रेट किए जाएंगे. भारत जल्द ही फ्रांसीसी कंपनी Safran S.A. और GTRE के बीच एक संयुक्त परियोजना को मंजूरी देने जा रहा है. इस परियोजना का उद्देश्य 120 किलो न्यूटन क्षमता वाला इंजन विकसित करना है, जो भारत के ट्विन-इंजन एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट को शक्ति देगा. AMCA प्रोजेक्ट के तहत पांचवीं पीढ़ी का फाइटर जेट डेवलप किया जाएगा. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी हाल में संकेत दिया था कि भारत जल्द ही लड़ाकू विमानों के लिए इंजन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाएगा. सूत्रों के अनुसार, Safran और GTRE मिलकर 12 साल में 9 प्रोटोटाइप इंजन तैयार करेंगे. शुरुआती चरण में इंजन की क्षमता 120 KN होगी. इसे बाद में बढ़ाकर 140 KN तक किया जाएगा. फ्रांस की साफ्रान और डीआरडीओ मिलकर 120KN और 140KN क्षमता वाले जेट इंजन डेवलप करेंगे. AMCA प्रोजेक्ट के तहत डेवलप जेट में इसका इस्तेमाल होगा. 100% टेक्नोलॉजी ट्रांसफर सबसे बड़ी बात यह है कि यह इंजन भारत में ही IPR के तहत तैयार होगा. ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, Safran DRDO को इंजन निर्माण की पूरी तकनीक ट्रांसफर करेगा. यह तकनीक हाई टेम्प्रेचर और प्रेशर को झेलने वाले सुपर-एलॉय से बनी एकल क्रिस्टल ब्लेड पर आधारित होती है. हालांकि, DRDO के पास बुनियादी तकनीक पहले से मौजूद है, लेकिन लड़ाकू विमानों के लिए इसे विकसित करना कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है. पिछले दो सालो से यह परियोजना लंबित थी, लेकिन अब केंद्र सरकार ने DRDO को प्रस्ताव आगे बढ़ाने के लिए हरी झंडी दी है. इस इंजन के विकास के साथ ही निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियां AMCA प्रोग्राम में भागीदारी के लिए तैयार हैं. फिलहाल केवल अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और फ्रांस ही ऐसे इंजन बनाने की क्षमता रखते हैं. चीन भी अभी अपने विमानों में रूस के इंजन या कॉपी किए गए इंजन का इस्तेमाल करता है. देसी इंजन मौजूदा एफ-35, Su-57 और राफेल फाइटर जेट में लगे इंजन से शक्तिशाली होगा. कावेरी इंजन प्रोजेक्ट भारत ने पहले कावेरी इंजन परियोजना पर काम किया था लेकिन वह सफल नहीं हो सकी. मौजूदा समय में अमेरिका की कंपनी GE भारत को 212 F-404 इंजन दे रही है और GE-414 इंजन की आंशिक तकनीक भी ट्रांसफर कर रही है, लेकिन यह तकनीकी ट्रांसफर केवल 70% तक सीमित है. इसके विपरीत, फ्रांस ने भारत के साथ रक्षा साझेदारी में हमेशा भरोसेमंद रुख अपनाया है. साल 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद भी फ्रांस ने भारत पर प्रतिबंध नहीं लगाए और मिराज-2000 लड़ाकू विमान तथा मिसाइल प्रणालियों के लिए आवश्यक तकनीक और स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति जारी रखी. राफेल और F-35 जेट के इंजन वर्तमान में भारतीय वायुसेना के 36 राफेल विमानों में 73 KN क्षमता वाले M-88 Snecma इंजन लगे हैं. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब 114 अतिरिक्त लड़ाकू विमानों के निर्माण के लिए दसॉ एविएशन से साझेदारी कर सकता है. साथ ही 120-140 KN इंजन का विकास भारत की सामरिक क्षमताओं को नया आयाम देगा और वायुसेना को किसी तीसरे देश पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा. दूसरी तरफ, अमेरिका के पांचवीं पीढ़ी के F-35 फाइटर जेट में 125 Kn इंजन लगे हैं, जो 140 केएन से कहीं कम है. बता दें कि देसी जेट इंजन का लाभ इंडियन नेवी को भी मिलेगा, क्योंकि इससे उसके ट्विन-इंजन डेक आधारित लड़ाकू विमान शक्ति प्राप्त करेंगे. आने वाले दशकों में यही इंजन भारत के अग्रिम मोर्चे के लड़ाकू विमानों की रीढ़ साबित होगा.
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