अमर उजाला के साथ खास बातचीत में पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की शेख हसीना के प्रत्यर्पण की अपील के कुछ खास मायने नहीं हैं। बीएनपी का रुख शुरू से ही भारत के खिलाफ रहा है।
बांग्लादेश के प्रमुख विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है। बीएनपी का कहना है कि बांग्लादेश में शेख हसीना के खिलाफ हत्या समेत कई अन्य मामलों में मुकदमे दर्ज हैं। इसलिए भारत को कानूनी तरीके से बंग्लादेश की सरकार को शेख हसीना को सौंप देना चाहिए। हालांकि इससे पहले बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन भी कुछ ऐसी बात कह चुके हैं। बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद वहां के छात्र संगठन भी अब पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को वापस बांग्लादेश भेजने की मांग करने लगे हैं। हालांकि बांग्लादेश और भारत के बीच प्रत्यपर्ण संधि है, लेकिन बावजूद इसके भारत सरकार किसी दबाव में आने के मूड में नहीं है। वहीं बांग्लादेश में शेख हसीना पर अभी तक 31 मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। शेख हसीना पर 31 मामले दर्ज पांच अगस्त को भारत पहुंची बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना इन दिनों देश में किसी सुरक्षित अज्ञात जगह पर रह रही हैं। बांग्लादेश में मंगलवार को उन पर 9 मामले और दर्ज किए गए। देश में नई अंतरिम सरकार बनने के बाद से उन पर अब तक 31 केस दर्ज हो चुके हैं। इनमें 26 हत्या, 4 नरसंहार और एक किडनैपिंग का मामला है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के जांच प्रकोष्ठ ने भी विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हत्या, यातना और नरसंहार के लिए हसीना समेत दस लोगों के खिलाफ अब तक चार मामले दर्ज हो चुके हैं। ' बीएनपी फैला रही प्रोपेगेंडा' अमर उजाला के साथ खास बातचीत में पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने कहा कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की शेख हसीना के प्रत्यर्पण की अपील के कुछ खास मायने नहीं हैं। बीएनपी का रुख शुरू से ही भारत के खिलाफ रहा है। बीएनपी का मकसद सिर्फ प्रोपेगेंडा फैलाना है और भारत को असहज करना है। उन्होंने कहा कि बीएनपी एक राजनीतिक दल है और वह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करके वह सिर्फ राजनीति कर रही है। वह जानती है कि इस समय जो वहां की अवाम है, वह शेख हसीना का विरोध कर रही है और बीएनपी केवल उसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। 'आर्टिकल 6 का सहारा ले सकता है भारत' पूर्व विदेश सचिव के मुताबिक बड़ी बात यह है कि बांग्लादेश में डॉ.
यूनुस के नेतृत्व में नई अंतरिम सरकार ने शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर कुछ नहीं कहा है। उन्होंने कहा कि भारत और बांग्लादेश की बीच 2013 में प्रत्यर्पण संधि हुई थी। वहीं, 2016 में इसमें कुछ संशोधन किए गए थे। इसके आर्टिकल 6 में कहा गया है कि भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि को उन मामलों में लागू नहीं किया जा सकता जो “राजनीतिक प्रकृति के” हैं। संधि के अनुच्छेद 6 में अपवाद के रूप में राजनीतिक अपराधों की एक सूची है। अगर वहां की सरकार इस आधार पर शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग करती है, तो भारत सरकार प्रत्यर्पण की मांग को खारिज कर सकती है। उन्होंने आगे कहा कि रही बात क्रिमिनल केसों की तो, इसमें लंबा वक्त लगता है। वहीं राजनीतिक व्यक्तियों के खिलाफ बांग्लादेश सरकार को पहले भारत सरकार को उनके खिलाफ सबूत पेश करने होंगे। 'इतना आसान नहीं है शेख हसीना का प्रत्यर्पण' पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने बताया कि शेख हसीना का प्रत्यर्पण इतना आसान नहीं है। उनके खिलाफ चल रहे मामलों को लेकर बांग्लादेश की अदालत में चुनौती दी जाएगी। शेख हसीना के वकील नहीं चाहेंगे कि बांग्लादेश सरकार उनका प्रत्यर्पण करे। वे उनके खिलाफ सबूतों की मांग करेंगे और बांग्लादेश में भी हाई कोर्ट के अलावा सुप्रीम कोर्ट भी है, वहां भी शेख हसीना का पक्ष सामने रखा जाएगा। इसमें लंबा वक्त लगेगा। अपनी दलील में शेख हसीना यह भी कह सकती हैं कि उनके खिलाफ साजिश रची गई और सैन्य विद्रोह के जरिए सत्ता पलटी गई। वह कहते हैं कि उनके खिलाफ क्रिमिनल अपराधों को साबित करना इतना आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि अगर बांग्लादेश सरकार बीएनपी के कहने पर शेख हसीना का प्रत्यर्पण करने के लिए कहती है, तो यह खुद बांग्लादेश सरकार के लिए शर्म की बात होगी। उन्होंने कहा कि यह एक अंतरिम सरकार है। वहां जब पूर्ण सरकार होगी, तब उसके साथ भारत दीर्घावधि में जुड़ना चाहेगा और इसलिए इस पर ध्यान देगा। साथ ही अभी तक सिर्फ एफआईआर ही दर्ज की गई है। मामले की जांच करनी होगी, आरोप पत्र दायर करना होगा और फिर अदालत संज्ञान लेगी। इसके बाद प्रत्यर्पण प्रक्रिया शुरू होगी। नजर बनाए हुए है विदेश मंत्रालय वहीं सरकार के जुड़े सूत्रों का कहना है कि बांग्लादेश में मौजूदा स्थिति पर विदेश मंत्रालय नजर बनाए हुए है। यह सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को हसीना के भारत में रहने पर कोई आपत्ति न हो। रही बात प्रत्यर्पण की, तो जब वहां सरकार की तरफ से अनुरोध आएगा, तब देखा जाएगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि मामला अभी प्रारंभिक चरण में है और प्रत्यर्पण प्रक्रिया समय के साथ डेवलप होगी। यह पूछे जाने पर कि अगर भारत शेख हसीना के प्रत्यर्पण से इनकार करता है, तो क्या होगा? इस पर सूत्रों ने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं जहां प्रत्यर्पण अनुरोध लंबित होने के बावजूद दो देशों के बीच संबंध अच्छे बने हुए हैं। उन्होंने संकेत दिया कि ऐसे मामलों में राष्ट्रीय हित आमतौर पर कानूनी औपचारिकताओं से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। पीएम मोदी ने डॉ. यूनुस को दी बधाई, फोन पर की बात बता दें कि 8 अगस्त को डॉ. मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में नई अंतरिम सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखकर मोहम्मद यूनुस को शुभकामनाएं दीं। साथ ही, प्रधानमंत्री मोदी ने बांग्लादेश में सामान्य स्थिति के शीघ्र बहाल होने की उम्मीद जताई थी और देश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और संरक्षण की अपील की थी। वहीं उनके शपथग्रहण समारोह में ढाका में मौजूद भारतीय उच्चायुक्त प्रणय वर्मा ने भी हिस्सा लिया था। वहीं शपथ ग्रहण समारोह के बाद डॉ. मोहम्मद यूनुस ने पीएम मोदी से फोन पर बातचीत भी हो चुकी है। दोनों के बीच वहां के मौजूदा हालात को लेकर बातचीत हुई। पीएम मोदी ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा था कि मोहम्मद यूनुस ने लोकतांत्रिक, स्थिर, शांतिपूर्ण और प्रगतिशील बांग्लादेश के लिए भारत के समर्थन को दोहराया। उन्होंने बांग्लादेश में हिंदुओं और सभी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, संरक्षा और संरक्षा का आश्वासन दिया। इससे पहले मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार में विदेश मामलों के सलाहकार मोहम्मद तौहीद हुसैन ने कहा था कि उनकी सरकार जल्द ही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण पर फैसला लेगी। उन्होंने कहा कि शेख हसीना कई मामलों का सामना कर रही हैं। उनके प्रत्यर्पण का अंतिम फैसला देश के गृह और कानून मंत्री पर निर्भर है। 2013 में हुई थी प्रत्यर्पण संधि भारत और बांग्लादेश ने 2013 में एक प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसे भगोड़ों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया को सुचारू बनाने के लिए 2016 में संशोधित किया गया था। यह संधि बांग्लादेश में छिपे भारतीय विद्रोहियों, विशेषकर पूर्वोत्तर के विद्रोहियों और बांग्लादेशी उग्रवादियों के चलते अमल में लाई गई थी। संधि के प्रमुख प्रावधान 1- भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि के अनुसार दोनों देशों को ऐसे व्यक्तियों को प्रत्यर्पित करना होगा जो, उन पर आरोप लगाया गया है, उन्हें दोषी पाया गया है, या अनुरोधकर्ता देश की अदालत द्वारा प्रत्यर्पण योग्य अपराध करने के लिए वांछित हैं। 2- संधि के अनुसार, प्रत्यर्पणीय अपराध वह है जिसके लिए न्यूनतम एक वर्ष के कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसमें वित्तीय अपराध भी शामिल हैं। 3- किसी अपराध को प्रत्यर्पण योग्य माने जाने के लिए, दोहरी आपराधिकता का सिद्धांत लागू होना चाहिए, अर्थात अपराध दोनों देशों में दंडनीय होना चाहिए। 4- यह संधि किसी प्रत्यर्पणीय अपराध को करने का प्रयास करने, सहायता करने, उकसाने, उकसाने या उसमें सहयोगी के रूप में भाग लेने से संबंधित मामलों में प्रत्यर्पण की भी अनुमति देती है। 5- वहीं क्रिमिनल मामलों में संधि के अनुच्छेद 10 में 2016 के संशोधन ने अनुरोध करने वाले देश के लिए किए गए अपराध के सबूत पेश करने की जरूरत को खत्म कर दिया है। अब, प्रत्यर्पण की प्रक्रिया के लिए अनुरोध करने वाले देश की सक्षम अदालत द्वारा केवल गिरफ्तारी वारंट की जरूरत होगी। संधि में ये हैं अपवाद 1- भारत और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि के तहत, यदि अपराध राजनीतिक प्रकृति का हो तो प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है। 2- हालांकि, यह छूट अपराधों की एक विस्तृत सूची तक सीमित है, जिन्हें राजनीतिक के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता। 3- इनमें गंभीर अपराध जैसे हत्या, हत्या, हमला, विस्फोट करना, जीवन को खतरे में डालने के इरादे से विस्फोटक या हथियार रखना, गिरफ्तारी का विरोध करने के लिए आग्नेयास्त्रों का उपयोग, जीवन को खतरे में डालने के इरादे से संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, अपहरण, बंधक बनाना, हत्या के लिए उकसाना और आतंकवाद से संबंधित कोई भी अपराध शामिल हैं। क्या अनुरोध मिलने पर भारत को हसीना को वापस भेजना होगा? 1- हालांकि, भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि को उन मामलों में लागू नहीं किया जा सकता जो “राजनीतिक प्रकृति के” हैं। संधि के अनुच्छेद 6 में अपवाद के रूप में राजनीतिक अपराधों की एक सूची है। इसमें भारत हसीना के प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है। 2- वहीं अनुच्छेद 7, जो व्यक्ति पर अनुरोधित राज्य में मुकदमा चलाए जाने की स्थिति में इनकार करने की अनुमति देता है, हसीना के मामले में लागू नहीं होता है। अनुच्छेद 8 में इनकार के लिए कई आधारों की सूची दी गई है, जिनमें निम्नलिखित मामले शामिल हैं 1- न्याय के हित में सद्भावनापूर्वक आरोप नहीं लगाया गया है। 2- सैन्य अपराधों के मामले में, जो सामान्य आपराधिक कानून के अंतर्गत अपराध नहीं हैं। 3- भारत के पास इस आधार पर हसीना के प्रत्यर्पण से इनकार करने का विकल्प है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप "न्याय के हित में सद्भावनापूर्ण" नहीं हैं।
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