बीएचयू ने पीएचडी अध्यादेश में बदलाव किया है, जिससे सरकारी नौकरी पाने वाले शोधार्थी अपनी फुल-टाइम पीएचडी को पार्ट-टाइम में बदल सकेंगे।
संग्राम सिंह, जागरण, वाराणसी। बीएचयू ने शोध और करियर के बीच संतुलन बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। पीएचडी अध्यादेश में बदलाव करते हुए उन शोधार्थियों के लिए राहत के द्वार खोल दिए हैं, जो शोध के बीच में ही सरकारी नौकरी पा जाते हैं। अब छात्र अपनी फुल-टाइम पीएचडी को छोड़ने के बजाय उसे पार्ट-टाइम में परिवर्तित करा सकेंगे। यूजीसी रेगुलेशन-2022 के अनुरूप तैयार इस नई नीति को अकादमिक परिषद की हरी झंडी मिल चुकी है और अंतिम मुहर के लिए अप्रैल में कार्यकारी परिषद की बैठक में रखा जाएगा। कई बार शोध के दौरान ही छात्र संघ लोक सेवा आयोग या अन्य उच्च स्तरीय परीक्षाओं में चयनित हो जाते हैं। पुरानी व्यवस्था में उन्हें शोध या नौकरी में किसी एक को चुनना पड़ता था। समिति की इस नई रिपोर्ट के बाद शोधार्थी नौकरी के साथ शोध जारी रख सकेंगे। इससे विश्वविद्यालय की शोध गुणवत्ता और छात्र का करियर दोनों सुरक्षित रहेंगे। परिवर्तन की प्रक्रिया पारदर्शी रखी गई है, इसके लिए शोधार्थी को पर्यवेक्षक के जरिये विभागाध्यक्ष को आवेदन देना होगा। इसके बाद विभागीय शोध समिति दस्तावेजों की गहन जांच करेगी और संकाय प्रमुख की सिफारिश के बाद कुलपति अंतिम निर्णय लेंगे। यह सुधार न केवल अध्ययन की निरंतरता सुनिश्चित करेगा, बल्कि कामकाजी पेशेवरों के लिए उच्च शिक्षा के नए मानक स्थापित करेगा। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की तरफ से पार्ट टाइम पीएचडी व्यवस्था को प्रभावी करने के लिए कहा गया था। ऐसे में बीएचयू देश का पहला विश्वविद्यालय है जो यह नियम प्रभावी करने का मसौदा तैयार हो चुका है। इन शर्तों पर मिलेगा लाभ नियुक्ति किसी सरकारी या मान्यता प्राप्त संस्थान में लेवल-10 या इससे ऊपर के पद पर होनी अनिवार्य है। शोधार्थी के विरुद्ध कोई अनुशासनात्मक मामला लंबित न हो। शोध की न्यूनतम अवधि चार वर्ष और अधिकतम छह वर्ष होगी। प्रति वर्ष कम से कम 45 दिन विभाग में उपस्थित रहना होगा। परिवर्तन के लिए कुल 17 हजार रुपये की फीस देनी होगी। यह भी पढ़ें- यूपी कालेज के छात्र की हत्या में आरोपित मनजीत चौहान को पुलिस ने कोर्ट में पेश कर भेजा जेल.
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