पश्चिम बंगाल में चुनाव का अपना इतिहास रहा है जिसमें कांग्रेस से लेकर वामपंथी और फिर तृणमूल कॉन्ग्रेस के वर्चस्व की अलग अलग कहानियां हैं. VerdictWithNews18 BattleForBengal
देश में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के लिए मतगणना जारी है. पश्चिम बंगाल में 292 सीटों के नतीजों को लोगों को बेसब्री से इंतजार है. यहां का चुनाव देश के बाकी चुनावों से हट कर होता है और इसके नतीजे बंगाल को लंबे समय तक प्रभावित भी करते हैं.
यहां एक ही पार्टी के लंबे शासन का रिकॉर्ड बना है. हर चुनाव बंगाल के लोगों की खास तरह की राजनैतिक जागरुकता दिखाई देती है. इस बार बंगाल में कांटे की टक्कर होने की उम्मीद की जा रही है. आइए जानते है कि यहां के चुनाव का इतिहास कैसा रहा है. आजादी के बाद बंगाल के विधानसभा चुनाव में कभी ऐसा नहीं रहा है कि किसी दल ने एक बार सत्ता हासिल करने के बाद दोबारा वापसी ना की हो. यहां पार्टियों का चुनावों में छा जाना एक परिपाटी सी बनती दिखाई देती है. 2. वैसे तो बंगाल में बहुत सारी पार्टियों का मौदान रहा है. लेकिन यहां सरकारें केवल कुछ ही पार्टी और गठबंधन की रह सकीं हैं. प्रमुख पार्टी या गठबंधन के लिहाज से देखें तो यहां पहले कॉन्ग्रेस, फिर यूनाइटेड फ्रंट, उसके बाद वांमपंथी और अंत में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस. 3.इससे पहले पश्चिम बंगाल में 16 बार विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. इसमें तीन-तीन बार कांग्रेस और यूनाइटेड फ्रंट की सरकारें बनी थीं. इसके बाद बंगाल में रिकॉर्ड आठ बार वामपंथी सरकार बनी थी जिसके बाद पिछली दो दफा ममता बनर्जी की अगुआई में तृणमूल कांग्रेस की सरकार बन चुकी है. 4. पश्चिम बंगाल की 16 विधानसभा चुनावों में प्रदेश ने केवल 8 मुख्यमंत्री देखे हैं. इनमें वामपंथी सरकार के ज्योति बसु रिकॉर्ड पांच बार, प्रफुल्ल चंद्र रॉय और अजॉय कुमार मुखर्जी तीन बार, प्रफुल्ल चंद्र घोष और बुद्धदेव भट्टाचार्य के साथ ममता बनर्जी दो बार जबकि सिद्धार्थ शंकर रे एक बार मुख्यमंत्री बने हैं.5. बंगाल में सबसे पहले विधानसभा चुनाव 1952 में हुए थे. इस चुनाव में कांग्रेस बहुमत से जीती थी और उसने अगले दस सालों तक यहां बहुमत से राज किया था. 1967 में कांग्रेस सहित किसी पार्टी को बहुतम नहीं मिल सका. तब एक संयुक्त वाम मोर्चे की सरकार ने आकार लिया जिसमें कम्युनिस्य पार्टी ऑफ इंडिया , संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया, मार्क्सिस्ट फॉरवर्ड ब्लॉक, रिवॉल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया, वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया एंड रिवॉल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी शामिल थीं.6. 1971 में छह पार्टी के सयुंक्त वाम मोर्चे में फूट पड़ गई और इसके बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में 8 पार्टी के गठबंधन ने सरकार बनाई लेकिन 1972 के चुनावों में सिद्धार्थ शंकर रे सीपीआई और कंग्रेस आर गठबंधन की बहुमत वाली सरकारके मुख्यमंत्री बने. 7. 1997 में वाम मोर्च ने बंगाल विधानसभा चुनाव को फिर जीत मिली.नतीजों ने खुद वाममोर्चे के लिए ये नतीजे चौंकाने वाले थी. इसमें ज्योति बसु प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 8. ज्योति बसु की अगुआई में सीपीआई एम ने पश्चिम बंगाल पर 1977 से 2001 तक, 30 साल तक एकछत्र राज किया. इसके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पहले सीपीएम की सरकार चलाई और फिर 2006 से तृणमूल कांग्रेस की सहायता से पांच साल और शासन किया.9.साल 2011 पश्चिम बंगाल के लिए फिर एक बहुत ही बड़ा बदलाव लेकर आया जब दशकों पुराने वामपंथी शासन का अंत हुआ और ममता बनर्जी सीपीआईएम के साथ गठबंधन कर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद उन्होंने 2016 में कांग्रेस के साथ अपनी तृणमूल कांग्रेस की सरकार बनाई.
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