अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि आतंकी संगठन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस AI का इस्तेमाल नए सदस्यों की भर्ती करने, डीपफेक तस्वीरों को प्रसारित करने और साइबर हमलों को तेज करने के लिए कर सकते हैं। ISIS जैसे संगठन AI का परीक्षण कर रहे हैं ताकि प्रोपेगेंडा फैला सकें और अपनी पहुंच बढ़ा सकें। इजरायल-हमास युद्ध की नकली तस्वीरों और रूस में हुए आतंकी...
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आज पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए प्रयासरत है और इस कोशिश में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया जैसे आतंकी संगठन भी पीछे नहीं हैं। वे भी इस प्रौद्योगिकी के साथ नित्य प्रयोग कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों और खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि आतंकी संगठनों के लिए एआई नए सदस्यों की भर्ती करने, वास्तविक दिखने वाली डीपफेक तस्वीरों को प्रसारित करने और साइबर हमलों को धार देने हेतु एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है। AI का परीक्षण कर रहा आतंकी संगठन व्यापक स्तर पर प्रोपेगेंडा करने, डीपफेक को बढ़ावा देने में जुटे राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षों पहले इराक और सीरिया में व्यापक क्षेत्र पर कब्जा करने वाला आइसिस अब हिंसक विचारधारा वाले आतंकी संगठनों का एक विकेन्द्रीकृत गठबंधन है। इसने वर्षों पहले यह महसूस किया था कि इंटरनेट मीडिया नए सदस्यों की भर्ती करने और प्रोपेगेंडा के लिए एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है। इसलिए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यह संगठन एआइ का परीक्षण कर रहा है। लचर एवं अपर्याप्त संसाधन वाले आतंकी संगठन या इंटरनेट कनेक्शन की सुविधा प्राप्त कोई एक आतंकी भी एआई का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर प्रोपेगेंडा करने या डीपफेक को बढ़ावा देने, अपनी पहुंच और अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए भी कर सकता है। आतंकी संगठन कर रहे AI का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के पूर्व रिसर्चर तथा साइबर सुरक्षा फर्म क्लियरवेक्टर के सीईओ जान लालिबर्टे ने कहा, ''किसी भी प्रतिद्वंद्वी के लिए ईआइ वास्तव में काम करना बहुत आसान बना देता है। एआइ की मदद से एक छोटा संगठन भी, जिसके पास बहुत अधिक पैसा नहीं है, प्रभाव डालने में सक्षम है।'' इजरायल-हमास युद्ध की नकली तस्वीरों से ध्रुवीकरण को बढ़ावा जैसे ही चैटजीपीटी सरीखे कार्यक्रम व्यापक रूप से सुलभ हो गए, आतंकी संगठनों ने एआइ का उपयोग करना शुरू कर दिया। उसके बाद के वर्षों में उन्होंने वास्तविक दिखने वाली तस्वीरें और वीडियो बनाने के लिए जेनेरिक एआइ कार्यक्रमों का तेजी से उपयोग किया है। यह नकली सामग्री नए सदस्यों को भर्ती करने, दुश्मनों को भ्रमित करने या डराने में मदद कर सकती है और बड़े पैमाने पर प्रोपेगेंडा कर सकती है जो कुछ साल पहले तक अकल्पनीय समझी जाती थी। इन संगठनों ने दो साल पहले इजरायल-हमास युद्ध की नकली तस्वीरें प्रचारित-प्रसारित कीं जिनमें बमबारी में ध्वस्त इमारतों में खून से लथपथ एवं परित्यक्त बच्चों को दिखाया गया था। युद्ध की वास्तविक भयावहता को अस्पष्ट करने वाली इन तस्वीरों ने आक्रोश और ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया। पश्चिम एशिया में हिंसक संगठनों ने नए सदस्यों की भर्ती के लिए इन तस्वीरों का इस्तेमाल किया, जैसा कि अमेरिका और अन्य जगहों पर यहूदी विरोधी संगठनों ने किया। गत वर्ष रूस में ISIS आतंकी के हमले में मारे गए थे 140 लोग पिछले साल भी कुछ ऐसा ही हुआ था जब रूस में एक कन्सर्ट स्थल पर आइसिस के एक आतंकी के हमले में लगभग 140 लोग मारे गए थे। इस जघन्य नरसंहार के बाद एआइ की मदद से तैयार किए गए प्रोपेगेंडा वीडियो इंटरनेट मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित किए गए जिनमें नए सदस्यों की भर्ती की अपील भी की गई थी। आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने वाली और आइसिस द्वारा एआइ के बढ़ते इस्तेमाल की जांच करने वाली कंपनी 'साइट इंटेलिजेंस ग्रुप' के शोधकर्ताओं के अनुसार, आइसिस ने अपने सरगनाओं द्वारा धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हुए डीपफेक आडियो रिकार्डिंग भी बनाई है और संदेशों को कई भाषाओं में तुरंत अनुवाद करने के लिए एआइ का इस्तेमाल किया है। सीआइए के पूर्व एजेंट एवं संघीय सरकार के साथ काम करने वाली साइबर सुरक्षा फर्म डार्कट्रेस फेडरल के सीईओ मार्कस फाउलर ने कहा, खतरा इतना व्यापक है कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और जैसे-जैसे सस्ते एवं शक्तिशाली एआइ का इस्तेमाल बढ़ेगा, खतरों के बढ़ने की आशंका है। ऑस्ट्रेलिया में 150 साल पुरानी है यहूदी विरोध की जड़ें, सिर्फ 45 दिनों में सामने आए 368 मामले.
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आज पूरी दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए प्रयासरत है और इस कोशिश में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया जैसे आतंकी संगठन भी पीछे नहीं हैं। वे भी इस प्रौद्योगिकी के साथ नित्य प्रयोग कर रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों और खुफिया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि आतंकी संगठनों के लिए एआई नए सदस्यों की भर्ती करने, वास्तविक दिखने वाली डीपफेक तस्वीरों को प्रसारित करने और साइबर हमलों को धार देने हेतु एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है। AI का परीक्षण कर रहा आतंकी संगठन व्यापक स्तर पर प्रोपेगेंडा करने, डीपफेक को बढ़ावा देने में जुटे राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षों पहले इराक और सीरिया में व्यापक क्षेत्र पर कब्जा करने वाला आइसिस अब हिंसक विचारधारा वाले आतंकी संगठनों का एक विकेन्द्रीकृत गठबंधन है। इसने वर्षों पहले यह महसूस किया था कि इंटरनेट मीडिया नए सदस्यों की भर्ती करने और प्रोपेगेंडा के लिए एक मजबूत हथियार साबित हो सकता है। इसलिए, यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यह संगठन एआइ का परीक्षण कर रहा है। लचर एवं अपर्याप्त संसाधन वाले आतंकी संगठन या इंटरनेट कनेक्शन की सुविधा प्राप्त कोई एक आतंकी भी एआई का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर प्रोपेगेंडा करने या डीपफेक को बढ़ावा देने, अपनी पहुंच और अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए भी कर सकता है। आतंकी संगठन कर रहे AI का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के पूर्व रिसर्चर तथा साइबर सुरक्षा फर्म क्लियरवेक्टर के सीईओ जान लालिबर्टे ने कहा, ''किसी भी प्रतिद्वंद्वी के लिए ईआइ वास्तव में काम करना बहुत आसान बना देता है। एआइ की मदद से एक छोटा संगठन भी, जिसके पास बहुत अधिक पैसा नहीं है, प्रभाव डालने में सक्षम है।'' इजरायल-हमास युद्ध की नकली तस्वीरों से ध्रुवीकरण को बढ़ावा जैसे ही चैटजीपीटी सरीखे कार्यक्रम व्यापक रूप से सुलभ हो गए, आतंकी संगठनों ने एआइ का उपयोग करना शुरू कर दिया। उसके बाद के वर्षों में उन्होंने वास्तविक दिखने वाली तस्वीरें और वीडियो बनाने के लिए जेनेरिक एआइ कार्यक्रमों का तेजी से उपयोग किया है। यह नकली सामग्री नए सदस्यों को भर्ती करने, दुश्मनों को भ्रमित करने या डराने में मदद कर सकती है और बड़े पैमाने पर प्रोपेगेंडा कर सकती है जो कुछ साल पहले तक अकल्पनीय समझी जाती थी। इन संगठनों ने दो साल पहले इजरायल-हमास युद्ध की नकली तस्वीरें प्रचारित-प्रसारित कीं जिनमें बमबारी में ध्वस्त इमारतों में खून से लथपथ एवं परित्यक्त बच्चों को दिखाया गया था। युद्ध की वास्तविक भयावहता को अस्पष्ट करने वाली इन तस्वीरों ने आक्रोश और ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया। पश्चिम एशिया में हिंसक संगठनों ने नए सदस्यों की भर्ती के लिए इन तस्वीरों का इस्तेमाल किया, जैसा कि अमेरिका और अन्य जगहों पर यहूदी विरोधी संगठनों ने किया। गत वर्ष रूस में ISIS आतंकी के हमले में मारे गए थे 140 लोग पिछले साल भी कुछ ऐसा ही हुआ था जब रूस में एक कन्सर्ट स्थल पर आइसिस के एक आतंकी के हमले में लगभग 140 लोग मारे गए थे। इस जघन्य नरसंहार के बाद एआइ की मदद से तैयार किए गए प्रोपेगेंडा वीडियो इंटरनेट मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित किए गए जिनमें नए सदस्यों की भर्ती की अपील भी की गई थी। आतंकी गतिविधियों पर नजर रखने वाली और आइसिस द्वारा एआइ के बढ़ते इस्तेमाल की जांच करने वाली कंपनी 'साइट इंटेलिजेंस ग्रुप' के शोधकर्ताओं के अनुसार, आइसिस ने अपने सरगनाओं द्वारा धार्मिक ग्रंथों का पाठ करते हुए डीपफेक आडियो रिकार्डिंग भी बनाई है और संदेशों को कई भाषाओं में तुरंत अनुवाद करने के लिए एआइ का इस्तेमाल किया है। सीआइए के पूर्व एजेंट एवं संघीय सरकार के साथ काम करने वाली साइबर सुरक्षा फर्म डार्कट्रेस फेडरल के सीईओ मार्कस फाउलर ने कहा, खतरा इतना व्यापक है कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और जैसे-जैसे सस्ते एवं शक्तिशाली एआइ का इस्तेमाल बढ़ेगा, खतरों के बढ़ने की आशंका है। ऑस्ट्रेलिया में 150 साल पुरानी है यहूदी विरोध की जड़ें, सिर्फ 45 दिनों में सामने आए 368 मामले
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