Amarnath Yatra 2025: सालों से बर्फ की चादर में लिपटी एक रहस्यमयी गुफा, जहां आज भी हर सावन में लाखों शिवभक्त 'बोल बम' की गूंज के साथ पहुंचते हैं. अमरनाथ की यह यात्रा सिर्फ एक तीर्थ नहीं, बल्कि विश्वास, भक्ति और चमत्कार का प्रतीक बन चुकी है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पवित्र गुफा की खोज आज से लगभग 500 साल पहले एक मुस्लिम गड़ेरिए ने की थी.
अमरनाथ यात्रा 3 जुलाई यानी आज से शुरू हो गई है. हिंदू धर्म में अमरनाथ यात्रा का विशेष महत्व है और हर शिव भक्त के लिए बाबा बर्फानी के दर्शन करना किसी सपने से कम नहीं है. लेकिन क्या आपको पता है कि 500 साल पहले एक मुस्लिम व्यक्ति ने अमरनाथ गुफा की खोज की थी.
यह यात्रा भले ही हिंदू करते हों लेकिन इस यात्रा को सफल बनाने में सबसे बड़ा योगदान कश्मीरी मुसलमानों का होता है. इसलिए अमरनाथ यात्रा को हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बताया जाता है. यह कथा न सिर्फ ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है, बल्कि जम्मू-कश्मीर के लोककथाओं में भी बार-बार सुनाई जाती है और यह हमें बताती है कि आस्था किसी जाति, धर्म या भाषा की मोहताज नहीं होती… कहानी है कि बुटा मलिक नामक एक स्थानीय मुस्लिम चरवाहा पहलगाम के पास अपने पशुओं को चराने निकला था. एक दिन भेड बकरी चराते चराते एक साधु मिला, जिससे उनकी दोस्ती हो गई. एक बार बुटा मलिक को ठंड लगी तो साधु उनको गुफा में ले गया. गुफा में भी बहुत ठंड लगी तो साधु ने उनको एक कांगड़ी दी, जो सुबह सोने की कांगड़ी में बदल गई. जब सुबह बुटा मलिक गुफा से बाहर निकले तो उनको कई साधु मिले और भगवान शिव को खोज रहे थे. मलिक ने साधुओं से कहा कि शिवजी का तो पता नहीं लेकिन उपर एक गुफा में एक चमत्कारी साधु जरूर रहते हैं, आप कहें तो मैं आपको उस गुफा में ले चलूं. मलिक की बात सुनकर सभी साधु गुफा में पहुंचे तो वहां बर्फ की एक विशाल शिवलिंग मिली, जहां उनके साथ माता पार्वती और भगवान गणेश भी बैठे हुए थे. इस घटना के बाद से अमरनाथ यात्रा शुरू हो गई. बाद में कई साधु गुफा के पास पहुंचकर जान देने लगे तो महाराजा रणजीत सिंह ने इसे बंद कर दिया. बताया जाता है कि हिंदुओं की धार्मिक भावना का ध्यान रखते हुए यहां के मुसलमान अमरनाथ यात्रा के दौरान दो महीने तक मांस नहीं खाते हैं. समुद्र तल से 12,756 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा तक कश्मीरी मुसलमान अपनी पालकी और खच्चर पर बैठाकर श्रद्धालुओं की यात्रा पूरी करवाते हैं. अमरनाथ गुफा तक पहुंचने के लिए दो रास्ते हैं, एक पहलगाम से होकर जाता है जो 46 किमी लंबा है, दूसरा रास्ता बालटाल से है जो 16 किमी लंबा लेकिन कठिन चढ़ाई वाला है. अमरनाथ यात्रा का समापन छड़ी मुबारक के साथ होता है, यह असल में चांदी की एक पवित्र छड़ी है जिसे लेकर साधू रक्षाबंधन के दिन अमरनाथ पहुंचते हैं और इसकी पूजा की जाती है. कश्मीरी मुसलमान यात्रा शुरू होते ही ‘छड़ी मुबारक’ का इंतजार करते हैं कि वह पवित्र छड़ी कब उनके गांव पहुंचेगी. वे उसकी झलक पाने के लिए कई दिन पहले से तैयारी करते हैं. बुटा मलिक की खोज को नमन करते हुए आज भी अमरनाथ श्राइन बोर्ड में उनके वंशजों की विशेष भूमिका होती है. कहा जाता है कि अमरनाथ यात्रा की हर साल की शुरुआत में बुटा मलिक परिवार को विशेष मान दिया जाता है. उनकी पीढ़ियां आज भी अमरनाथ यात्रा के पवित्र दायित्व में सहभागी हैं. साल 2002 तक अमरनाथ गुफा में भक्तों से होने वाली कमाई का एक तिहाई हिस्सा बूटा मलिक के परिवार को मिलता था, श्राइन बोर्ड बनने के बाद यह व्यवस्था बंद हो गई.
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