तारीख- 4 जुलाई 1947 जगह- ब्रिटिश संसद। ब्रिटेन के पीएम क्लेमेंट एटली ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में खड़े हुए। उनके सामने रखा था- इंडियन इंडिपेंडेंस बिल 1947 का ड्राफ्ट। वो कानून जिसे पारित करके भारत को स्वाधीनता सौंपी जानी थी। पीएम एटली ने बोलना शुरू किया,India Independence Day (1947) August 15 British Empire History Explained; अमेरिका का अल्टीमेटम- भारत को...
1947 के बाद भी भारत पर कैसे कंट्रोल चाहते थे अंग्रेज; ब्रिटिश नजरिए से आजादी की पूरी कहानीब्रिटेन के पीएम क्लेमेंट एटली ‘हाउस ऑफ कॉमन्स’ में खड़े हुए। उनके सामने रखा था- इंडियन इंडिपेंडेंस बिल 1947 का ड्राफ्ट। वो कानून जिसे पारित करके भारत को स्वाधीनता सौंपी जानी थी। पीएम एटली ने बोलना शुरू किया, 'ये एक्ट हमारे साम्राज्य के इतिहास में एक नया अध्याय है। भारत के लोगों की इच्छा अब और नहीं टाली जा सकती।' भारत को करीब 200 साल से लूट रहे ब्रिटिशर्स अचानक आजादी देने की बात क्यों करने लगे थे? स्वतंत्रता दिवस की 79वीं एनिवर्सरी पर जानिए भारत की आजादी की कहानी, अंग्रेजों के नजरिए से.
..ईस्ट इंडिया कंपनी को 1600 ईस्वी में ब्रिटिश महारानी से कारोबार की इजाजत मिली। 8 साल बाद 1608 में कंपनी का पहला जहाज भारत के सूरत पहुंचा। कंपनी ने मुगल शासकों से टैक्स में छूट प्राप्त कर ली थी। भारत से सूती कपड़े, रेशम, काली मिर्च, लौंग, इलायची और दालचीनी का कारोबार करने लगे। धीरे-धीरे कंपनी के अधिकारियों ने राजनीतिक मामलों में दखल देना शुरू किया। ताकत भी बढ़ाते रहे, जिससे देश के बड़े हिस्से पर उनका कंट्रोल हो गया। 1857 के स्वाधीनता संग्राम के बाद 1858 में ब्रिटिश संसद ने कानून पारित किया और भारत की सत्ता ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ से ब्रिटेन की महारानी के हाथ में चली गई। सभी बड़े पदों पर ब्रिटिशर्स तैनात थे। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई और देशभर में अंग्रेजों का विरोध बढ़ना शुरू हुआ। 1909 में नए वायसराय लॉर्ड मिंटो ने कहा, ‘हमें भारतीयों की मांग को दबाने के बजाय इसे सही दिशा देनी होगी।' जून 1917 में एडविन सैमुअल मोंटेग्यू को भारत का स्टेट सेक्रेटरी बनाया गया। मोंटेग्यू ने ब्रिटिश संसद में कहा, ‘ब्रिटिश सरकार का इरादा भारत में प्रशासन के हर स्तर पर भारतीयों की संख्या बढ़ाना और धीरे-धीरे स्व-शासन विकसित करना है।’ ये पहली बार था, जब भारत को लेकर ब्रिटेन में ‘स्व-शासन’ शब्द का जिक्र हुआ। हालांकि अभी तक पूरी तरह आजादी जैसी कोई बात नहीं थी। 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने पहली बार भारत के लिए ‘डोमिनियन स्टेटस’ की मांग की। यानी ब्रिटिश साम्राज्य के अंदर ही एक देश का दर्जा, जिसकी अपनी सरकार हो। 1928 में मोतीलाल नेहरू ने डोमिनियन स्टेटस के तहत शासन का प्रस्ताव रखा था, इसे 'नेहरू रिपोर्ट' कहा जाता है।कांग्रेस की डोमिनियन स्टेटस की मांग को ब्रिटेन ने खारिज कर दिया। ‘Between Midnight and Republic’ नाम का रिसर्च पेपर लिखने वाले इतिहासकार रोहित डे के मुताबिक, ‘ब्रिटेन की संसद के अलावा कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं ने भी भारत को डोमिनियन स्टेटस देने का विरोध किया। ये देश नहीं चाहते थे कि एक अश्वेत सरकार उनकी बराबरी करे।’ कांग्रेस में जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस जैसे युवा नेता, डोमिनियन स्टेटस की मांग को पर्याप्त नहीं मानते थे। दिसंबर 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 700 शब्दों का प्रस्ताव पारित हुआ। इसमें कांग्रेस ने कहा- ‘भारत को ब्रिटेन से संबंध तोड़कर पूर्ण स्वराज पाना होगा।’ अगले ही साल गांधी ने दांडी में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ के तहत नमक सत्याग्रह शुरू किया। आर. जे. मूर की किताब 'The Crisis of Indian Unity' के मुताबिक, वायसराय लॉर्ड इरविन बोले, 'एक बूढ़ा आदमी समुद्र तट पर नमक बनाकर हमारी सत्ता को चुनौती दे रहा है। भारत को डोमिनियन स्टेटस देना ब्रिटिश साम्राज्य को खतरे में डालेगा।'लंदन पहुंचे गांधी को चर्चिल ने ‘अधनंगा फकीर’ कहा 1931 में जब गांधी गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने लंदन गए, तो जॉर्ज पंचम ने उन्हें बकिंघम पैलेस में चाय पर बुलाया। अंग्रेज ये देखकर दंग थे कि इस औपचारिक मौके पर भी गांधी सिर्फ एक धोती और चप्पल पहने थे। इस पर गांधी ने बाद में कहा था, 'सम्राट ने जितने कपड़े पहने हुए थे, वो हम दोनों के लिए काफी थे।' छह महीने पहले गांधी ऐसे ही धोती पहनकर वायसराय लॉर्ड इरविन से मिले थे। तब विंस्टन चर्चिल ने कहा था, 'ये कितना खतरनाक और घिनौना है कि विदेश से बैरिस्टरी पास शख्स अब राजद्रोही फकीर बनकर अधनंगा वायसराय के महल की सीढ़ियों पर दनदनाता हुआ चला जा रहा है और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन चलाने के बावजूद सम्राट के प्रतिनिधि के साथ बराबरी से बैठकर समझौते की बात कर रहा है।'हालांकि गोलमेज सम्मेलन में किसी समझौते पर बात नहीं बनी। 'फ्रीडम एट मिडनाइट' किताब के मुताबिक, ‘लंदन से लौटने के बाद गांधी ने कहा- मैं खाली हाथ लौटा हूं। भारत को दोबारा सविनय अवज्ञा का रास्ता अपनाना होगा। एक सप्ताह भी नहीं बीता, चाय की दावत पर सम्राट का मेहमान रह चुका शख्स, पूना की यरवडा जेल में मेहमान बना दिया गया।' अगले तीन साल गांधी के जेल आने-जाने का सिलसिला चलता रहा। इधर लंदन में चर्चिल कहते रहे- 'गांधी को और हर उस चीज को जिसके लिए वो लड़ रहे हैं, कुचल देना होगा।'1 सितंबर 1939 को दूसरा वर्ल्ड वॉर शुरू हुआ और 3 सितंबर को ब्रिटिश पीएम नेविल चेम्बरलेन ने जर्मनी के खिलाफ युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। करीब 23 लाख भारतीय सैनिकों को ब्रिटेन की तरफ से युद्ध में झोंक दिया गया। मई 1940 में विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के नए पीएम बने। भारत की स्वाधीनता पर चर्चिल कहते थे- सम्राट ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य खत्म करने के लिए तो मुझे पीएम नहीं बनाया है। भारत को छोड़ना साम्राज्य की हार होगी। सत्ता दुष्टों, बदमाशों और लुटेरों के हाथों में चली जाएगी। सारे भारतीय नेता निम्न स्तर के और घटिया किस्म के होंगे।’ 1942 आते-आते विश्व युद्ध में ब्रिटेन कमजोर पड़ने लगा था। कई मौकों पर जापानी सेना से सामना होने पर ब्रिटिश सैनिकों को पीछे हटना पड़ा। इस दौरान भारतीय सैनिकों की जरूरत थी। इसके लिए चर्चिल ने अपने प्रतिनिधि के तौर पर स्टैनफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।क्रिप्स ने युद्ध के बाद भारत को डोमिनियन स्टेटस देने का चर्चिल का प्रस्ताव सुनाया, लेकिन उन्होंने इसे खारिज कर दिया। गांधी ने क्रिप्स से कहा, 'ये प्लान किसी डूबते हुए बैंक के नाम काटा हुआ पोस्ट डेटेड चेक है। अगर आपके पास कोई और सुझाव नहीं है, तो अगले जहाज से अपने देश लौट जाइए।'8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस के सम्मेलन में गांधी के तेवर हमेशा से अलग थे, उन्होंने गुस्से में कहा, 'मुझे तुरंत आजादी चाहिए। हो सके तो आज ही रात को या फिर सुबह होने से पहले।' गांधी ने 'करो या मरो' का नारा दिया था और इसी के साथ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया। अगले ही दिन गांधी को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर पूना में आगा खां महल भेज दिया। इसकी सुरक्षा में 72 पुलिस वाले लगाए गए थे। ब्रिटिश-आयरिश इतिहासकार निकोलस मैंनसर्ग की किताब ‘The Transfer of Power’ के मुताबिक, लॉर्ड लिनलिथगो ने कहा था, 'अहिंसा की आड़ में किया जा रहा ये विद्रोह युद्ध के चलते आई हमारी कमजोरियों को भुनाने की कोशिश है।'अमेरिका का अल्टीमेटम- भारत को 10 साल में आजाद करना ही होगा ब्रिटेन को द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका की सख्त जरूरत थी। अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट ब्रिटेन के साम्राज्यवाद के खिलाफ थे। युद्ध के दौरान रूजवेल्ट और चर्चिल की 11 मुलाकातें हुईं। रूजवेल्ट के बेटे इलियट रूजवेल्ट इनमें से 8 मुलाकातों के दौरान मौजूद थे। 1946 में उन्होंने अपनी किताब 'ऐज ही सॉ इट' में विस्तार से लिखा। एक जगह रूजवेल्ट चर्चिल से कहते हैं- ‘हिटलर और आपमें क्या फर्क है? उसने यूरोप के एक हिस्से पर कब्जा किया है। आप दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर कब्जा रखते हैं।’ चर्चिल ने कहा, ‘1931 के वेस्टमिंस्टर कानून ने कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे हमारे उपनिवेशों को पहले ही आजादी दे दी है।’ इस पर रूजवेल्ट ने कहा, यह काफी नहीं है। भारत को जितना जल्दी हो सके, पांच या ज्यादा से ज्यादा 10 साल में डोमिनियन का दर्जा दिया जाना चाहिए।' चर्चिल भारत का नाम आते ही गुर्राए और कहा, 'मिस्टर प्रेसिडेंट, आपने भारत का जिक्र किया, इंग्लैंड एक भी पल के लिए अपनी सबसे पसंदीदा जगह को गंवाना नहीं चाहता। जहां के व्यापार ने इंग्लैंड को महान बनाया, वह इंग्लैंड के मंत्रियों की शर्तों के हिसाब से चलता रहेगा।’ रूजवेल्ट ने कहा, ‘भारत एक आधुनिक सरकार, अच्छे स्वास्थ्य और शिक्षा का हकदार होगा, लेकिन उसे ये सब कैसे मिले, जब ब्रिटेन हर साल उसकी सारी दौलत छीन रहा है।’ कमरे में मौजूद रूजवेल्ट के करीबी सलाहकार हैरी लॉयड मुस्करा रहे थे। जबकि चर्चिल के सहयोगी कमांडर थॉम्पसन उदास थे। इतिहासकार विशाल मंगलवाडी लिखते हैं, 'इतिहासकारों ने हमें भारत की आजादी में अमेरिका की भूमिका नहीं बताई, लेकिन अमेरिका के इसी दबाव ने ही ब्रिटिश साम्राज्य को पूरी तरह ध्वस्त किया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के हर उपनिवेश को आजादी मिली।’सेकेंड वर्ल्ड वॉर में ब्रिटेन की आर्थिक तबाही, भारत बोझ लगने लगा 1945 तक दूसरा विश्व युद्ध तो खत्म हो गया, लेकिन 5 सालों में ब्रिटेन का खजाना खाली हो गया। ब्रिटेन की जीडीपी 25% गिर गई थी, उस पर अमेरिका का 4 बिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज था। 1944 में ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन कीन्स ने कहा था, 'हम एक गरीब देश हैं, हमें उसी तरह जीना सीखना होगा।' लैरी कॉलिंस और डोमिनिक लैपियर अपनी किताब 'फ्रीडम एट मिडनाइट' में लिखते हैं, 'दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की भारत पर पकड़ कमजोर हो चुकी थी और भारत की आजादी की मांग बहुत उग्र हो गई थी।' 5 जुलाई 1945 को ब्रिटेन में हुए आम चुनाव में लेबर पार्टी ने 393 सीटें जीतीं, जबकि चर्चिल की कंजर्वेटिव पार्टी को सिर्फ 197 सीटें मिलीं। लेबर पार्टी के नेता और चर्चिल की सरकार में डिप्टी पीएम रहे क्लेमेंट एटली नए पीएम बने। ब्रिटेन के इम्पीरियल वॉर म्यूजियम के मुताबिक, ‘चर्चिल को लगता था कि उनके पीएम रहते युद्ध में ब्रिटेन की जीत के कारण वह चुनाव जीत जाएंगे, लेकिन ब्रिटेन की जनता ने लेबर पार्टी के रोजगार और सस्ते घर जैसे चुनावी वादों पर भरोसा किया। नई लेबर सरकार के लिए ब्रिटिश साम्राज्य संभालना मुश्किल था। The Last Thousand Days of the British Empire, 2008 में इतिहासकार पीटर क्लार्क ने लिखा, 'भारत अब वह बोझ था, जिसे हम ढो नहीं सकते थे।’ भारत और पाकिस्तान के बीच बंटवारे की लाइन खींचने वाले रेडक्लिफ ने भी बाद में एक इंटरव्यू में कहा था, दूसरे विश्वयुद्ध में इंग्लैंड लगभग कंगाल हो चुका था। वह लंदन का भार उठाने में कराह रहा था, ऐसे में वह किसी भी तरह से तेजी से भारत से अलग होना चाहता था।’ इसके अलावा एटली, चर्चिल के मुकाबले उदारवादी थे। जब वह साइमन कमीशन के मेंबर के बतौर भारत आए, तो उन्होंने कहा था, ‘ब्रिटिश शासन भारत के लिए विदेशी है, इससे भारत में सुधार नहीं हो सकते।' एटली का मानना था कि उपनिवेशों को अपनी सरकार चलाने का हक होना चाहिए।भारत छोड़ने को मजबूर हो चुकी ब्रिटिश सरकार को एक और झटका भारतीय नौसैनिकों ने दिया। 18 फरवरी 1946 को भारतीय नौसैनिकों ने बंबई में विद्रोह कर दिया। सैनिकों ने कमांडर आर्थर फेडरिक किंग की कार के टायर पंचर कर उस पर अंग्रेजी में ‘क्विट इंडिया’ और सुभाष चंद्र बोस का नारा 'जय हिंद' लिखा। 20 फरवरी तक बंबई में नेवी की 11 यूनिट्स के 20 हजार सैनिक, 78 युद्धपोत, 23 नेवी स्टेशन इस विद्रोह से जुड़ गए। कराची बंदरगाह पर भी नेवी के दफ्तरों में बगावत शुरू हो गई। विद्रोह की अगुआई करने वालों में शामिल रहे बीसी दत्त ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था- हम नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ काम करने वाले सैनिकों की रिहाई चाहते थे, क्योंकि उनका मकसद 'क्रांतिकारी कार्रवाई' था, वे हमारी ही तरह देशभक्त थे। हालांकि सैनिकों ने कांग्रेस नेताओं, खासतौर पर सरदार पटेल के कहने पर 23-24 फरवरी को समर्पण तो कर दिया, लेकिन ब्रिटेन को समझ आ गया था कि भारतीय सेना अब भरोसेमंद नहीं रही।20 फरवरी 1947 को एटली ने कहा, 'हम ब्रिटिश भारत को जून 1948 तक पूर्ण स्वशासन दे देंगे।’ इसी दिन एटली ने लॉर्ड लुई माउंटबेटन को भारत का अंतिम वायसराय बनाने की घोषणा की। माउंटबेटन ने नेहरू, पटेल, जिन्ना और गांधी से मुलाकातें कीं। 3 जून 1947 को उन्होंने 'माउंटबेटन प्लान' पेश किया, जिसमें भारत-पाकिस्तान के विभाजन की योजना थी। माउंटबेटन ने कहा, 'अगर हम 1948 तक इंतजार करेंगे, तो गृहयुद्ध हो जाएगा।' 4 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। तभी एक सवाल आया कि 'अगर सभी लोग इस बात को मानते हैं कि सत्ता जल्दी से जल्दी सौंप देनी चाहिए, तो सर आपने इसकी कोई तारीख भी सोच रखी होगी?'माउंटबेटन ने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाने शुरू किए, क्योंकि उन्होंने कोई तारीख तय नहीं की थी। तभी उनके दिमाग में अपने जीवन की सबसे गौरवशाली जीत की याद आई, जब उनके नेतृत्व में जापान की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया था। माउंटबेटन की आवाज अचानक रुंध गई और उन्होंने ऐलान कर दिया कि भारतीय हाथों में सत्ता 15 अगस्त, 1947 को सौंप दी जाएगी। इस घटना को लॉर्ड माउंटबेटन ने बाद में याद करते हुए कहा, 'मैं ठान चुका था कि मैं ये साबित कर दूंगा कि सब मेरा ही किया धरा है।' हालांकि अचानक अपनी मर्जी से तय और घोषित की गई आजादी की तारीख पर लंदन तक जैसे विस्फोट हो गया था।18 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में माउंटबेटन प्लान के आधार पर पारित हुए ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ के तहत देश का बंटवारा हो गया और 15 अगस्त को सत्ता हस्तांतरण की तारीख तय हुई। हालांकि भारत और पाकिस्तान अभी सिर्फ डोमिनियन स्टेट बने थे, न कि पूरी तरह आजाद मुल्क। इसके पहले 1 जुलाई 1947 को चर्चिल ने एटली को पत्र लिखकर 'इंडियन इंडिपेंडेंस बिल' के नाम पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, 'आप इसको 'इंडियन इंडिपेंडेंस बिल' कह रहे हैं। यह डोमिनियन स्टेटस है, न कि पूर्ण आजादी।'जब भारत आजाद हुआ तो, ब्रिटेन के ‘द टाइम्स’ अखबार ने लिखा,’ भारत की स्वतंत्रता साम्राज्य की हार नहीं, बल्कि ब्रिटिश नीतियों की परिपक्वता है।’ लंदन में इंडिया हाउस में एक छोटा समारोह हुआ। जहां भारतीय और ब्रिटिश ऑफिसर्स के बीच आजादी के डॉक्यूमेंट्स सौंपे गए। कुछ ब्रिटिश परिवार, जिनके रिश्तेदार भारत में सेना या किसी कार्यालय में काम कर रहे थे। उनकी ब्रिटेन वापसी हो रही थी। एक ICS ऑफिसर की पत्नी ने कहा, 'मेरा दिल दिल्ली में है, जहां हमारा घर था, लेकिन अब वह हमारा नहीं रहा।'Freedom at Midnight by Larry Collins and Dominique LapierreThe Last Thousand Days of the British Empire by Peter Clarkeकहानी के अगले हिस्से में कल यानी 15 अगस्त को पढ़िए- भारत और पाकिस्तान का बंटवारा कैसे हुआ, जब जिन्ना और नेहरू दोनों पूर्ण आजादी मांग रहे थे तो डोमिनियन स्टेटस के दर्जे पर क्यों तैयार हुए?बंटवारे में 98% मुस्लिम सैनिकों ने पाकिस्तान चुना:कैसे हुई हिंदू-सिख और मुस्लिम जवानों की अदला-बदली; बंटवारे के किस्से, पार्ट-2 मौत तो देर-सवेर आनी ही है, लेकिन मैदान-ए-जंग में मरने से बेहतर और क्या हो सकता है। मैं मर रहा हूं, लेकिन जिस इलाके के लिए हम लड़े, उसे दुश्मन के हाथ में न जाने देना।' ये शब्द इंडियन आर्मी के ब्रिगेडियर उस्मान ने अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी कबाइलियों से लड़ते हुए कहे थे।भोपाल- नर्मदापुरम में बारिशसपा विधायक बोले- ऊर्जा मंत्री UP ठेल दिए गएहिमाचल के कई भागों में रातभर बारिशलखीसराय में बाढ़ में नाव पलटी;पानी में कूदे लोग; VIDEOबिहार दिनभर, 15 बड़ी खबरेंआगरा में तेज बारिश, सड़कों पर भरा पानी...VIDEO
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