स्विट्जरलैंड में रहने वाली नताशा ने 38 साल की उम्र में अपनी जैविक माँ को खोज निकाला, जिसे 11 दिन की उम्र में अनाथालय में छोड़ दिया गया था। 15 साल की अथक खोज के बाद, नताशा को पता चला कि उसकी माँ मुंबई में है और वे आखिरकार मिल गए।
पुणे: स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख में रहने वाली नताशा के पास सब कुछ था। प्यार करने वाला परिवार, अच्छी जिंदगी, अच्छा करियर और एक उज्जवल भविष्य, लेकिन एक कमी थी जो उन्हें कचोटती थी। उनके माता-पिता उन्हें बहुत प्यार करते थे, लेकिन नताशा एक बार अपनी जन्म देने वाली माँ से मिलना चाहती थीं। नताशा को जन्म के बाद उनकी माँ ने छोड़ दिया था। उन्हें एक अनाथ आश्रम से एक जोड़े ने गोद लिया था और वे उन्हें लेकर विदेश चले गए थे। 22 साल की उम्र में उन्होंने अपनी खोज शुरू की, सोशल मीडिया को खंगाला, संगठनों से संपर्क
किया, अपने जन्म और गोद लेने से जुड़े सभी दस्तावेज एकत्रित किए और छानबीन की। बिना हार माने लगातार यह खोज जारी रखी। आखिरकार उनकी मेहनत 15 साल बाद सफल हुई। 38 साल की उम्र में लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ को उनकी जैविक माँ का पता चला। नताशा ने बताया कि वह अपने जीवन के अधिकांश समय अपने दिल में एक शांत लालसा रखती थीं। एक उत्सुकता थी, जो अब शांत हो गई। नताशा का जन्म 1987 में हुआ था। वह महज 11 दिन की थीं, जब उन्हें एक अनाथालय में छोड़ दिया गया था। एक साल की होने से पहले एक स्विस जोड़े ने नताशा को गोद ले लिया। चूंकि वह अफ्रीका की एक दत्तक बहन के साथ ज्यूरिख में बड़ी हुईं, उनका बचपन स्कूल, दोस्तों और परिवार के बीच बीता। हालांकि नताशा की चुनौतियां कम नहीं थीं। ज्यादातर श्वेत समाज में एक काली चमड़ी वाली लड़की के रूप में उनके सामने कई असहज क्षण आए। किशोरावस्था तक नताशा को ताने मिलते थे। कई लोग उन्हें टालते थे। उन्हें उन लोगों से अलग होने का दर्द महसूस होता था। नताशा अपने जैविक माता-पिता को ढूंढना चाहती थीं, लेकिन मन में दत्तक परिवार को लेकर संकोच था। उस परिवार, जिसने उन्हें रहने के लिए घर दिया, एक अच्छी जिंदगी दी, एक परिवार दिया, वे उन्हें दुखी नहीं करना चाहती थीं। हालांकि उनकी इस हिचकिचाहट को उनके दत्तक माता-पिता ने महसूस किया। उनकी माँ ने उनका साथ दिया और उनके बारे में सब कुछ बताया। उन्होंने उनकी अफ्रीकी बहन को भी सब बताने की कोशिश की, लेकिन वह अपने अतीत में नहीं जाना चाहती थी। उन्हें अपने माता-पिता से गोद लिए जाने से जुड़े सारे दस्तावेज मिल गए। उन्होंने अपना अभियान शुरू किया। हालांकि उन्हें तब झटका लगा, जब मुंबई में जिस केंद्र से उन्हें गोद लिया गया था, उन्होंने कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया। नताशा ने बताया कि वह उनके जीवन के सबसे बुरे दो साल थे। यह एक चरम भावनात्मक उतार-चढ़ाव था… आशा से निराशा तक, दुख से क्रोध तक – यह वास्तव में कठिन था। एक ईमेल ने सब कुछ बदल दिया। लगा कि अब वह कभी अपनी जैविक माँ से नहीं मिल पाएंगी। जून 2025 में अचानक सब बदला। नताशा को वह ईमेल मिला जिसने सब कुछ बदल दिया। उन्हें पता चला कि उनकी माँ मिल गई। इस खबर ने उन्हें भारत आने के लिए प्रेरित किया। 23 सितंबर को, नताशा मुंबई में अपनी जैविक माँ से मिलीं। उन्होंने भावुक होते हुए बताया कि इस पल को वे शब्दों में बयां नहीं कर सकतीं। अजीब सी फीलिंग थी, बेचैनी थी, वे लगभग सांस नहीं ले पा रही थीं, और कुछ भी कहने में बहुत शर्म आ रही थी। कल्पना कीजिए कि आप अपने जीवन में जो सबसे ज़्यादा चाहते थे वह अचानक सच हो गया। यह मुलाकात केवल 30 मिनट तक चली, क्योंकि उनकी माँ उनसे अपने पति और बेटों से छिपकर मिलने आई थीं। नताशा को पता चला कि उनकी माँ सिर्फ 15 साल की थीं जब उनका जन्म हुआ। वह एक लड़के के साथ रिश्ते में थीं, जिससे वे गर्भवती हुईं थीं। समाज के डर से उन्होंने उन्हें छोड़ दिया। उन्होंने और उनके परिवार ने यह बात सबसे छिपाई। नताशा अपने जैविक पिता के बारे में जानना चाहती थीं, लेकिन उनकी माँ ने बताया कि उस घटना के बाद से उन्होंने उस युवक से कभी संपर्क नहीं रखा और उन्हें उनके बारे में अब ज्यादा कुछ याद भी नहीं। नताशा ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने अपनी माँ और खुद में समानताएं देखीं। उनकी नाक, होंठ, और आँखें उनके जैसी ही हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें अक्सर कहा जाता था कि उनकी आँखें हमेशा गुस्से से भरी रहती हैं और वे लोगों से कहती थीं कि वह ऐसी ही हैं। लेकिन जब उन्होंने अपनी माँ की आँखें देखीं तो पता चला कि यह सब उन्हें अपनी जैविक माँ से मिला है। नताशा ने बताया कि उन्हें सिर्फ यह जानना था कि उनकी माँ ने उन्हें क्यों छोड़ा? उनका यौन उत्पीड़न हुआ था या वे बेटी थीं इसलिए उन्हें छोड़ दिया गया? इस मुलाक़ात ने नताशा के छोड़े जाने के गहरे ग़ुस्से को दूर कर दिया। नताशा ने कहा कि जब उन्होंने अपनी जैविक माँ की परिस्थितियां जानीं तो एक पल में सारा ग़ुस्सा गायब हो गया। इस पुनर्मिलन करवाने वाले पवार ने कहा कि यह मुश्किल था, लेकिन नामुमकिन नहीं। उनकी माँ का पहला नाम लेकर वे इस काम में जुट गए। उन्हें बताया गया था कि गोद लेने वाली एजेंसी ने माँ का पता लगा लिया है, लेकिन वह अपनी बेटी से मिलना नहीं चाहती थीं। वे उनसे व्यक्तिगत रूप से मिले, वे बस यह राज़ रखना चाहती थीं, जिसे वे समझ गए। पहली मुलाक़ात में उन्होंने अपना डीएनए दिया, जो नताशा के डीएनए से मेल खाता था। उन्होंने सावधानी बरतते हुए और सभी निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए मुलाक़ात की व्यवस्था की
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