12 साल की उम्र में घर से भागा था अशोक चोटिया, जानिए कौन है आनंद गिरि

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12 साल की उम्र में घर से भागा था अशोक चोटिया, जानिए कौन है आनंद गिरि
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12 साल की उम्र में घर से भागा था अशोक, परिवार ने 5 साल बाद टीवी पर देखा तो बना गया था साधू; पढ़ें- आनंद गिरि की पूरी कहानी

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध परिस्थियों में मौत हो गई थी। पुलिस को मौके से कथित सुसाइड नोट भी बरामद हुआ था। कथित सुसाइड नोट में आनंद गिरि पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे। नरेंद्र गिरि ने कथित सुसाइड नोट में लिखा था कि आनंद गिरि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहा था। पुलिस ने इसके आधार पर आनंद गिरि को पहले हिरासत में लिया और फिर गिरफ्तार कर लिया था। आनंद गिरि को शिक्षा महंत नरेंद्र गिरि ने ही दी थी। कुछ विवाद होने के बाद उन्हें अखाड़े से बाहर कर दिया गया था। आइए पहले आपको आनंद गिरि के जीवन की पूरी कहानी बताते हैं। आनंद गिरि मूल रूप से राजस्थान के भीलवाड़ा के सरेरी गांव का रहने वाला है। आनंद गिरि का नाम अशोक चोटिया है और वह चार भाइयों में सबसे छोटा है। अशोक की शुरुआती पढ़ाई भीलवाड़ा में ही हुई थी। साल 1996 में सिर्फ 12 साल की उम्र में वह घर छोड़कर चला गया था। यहां से वह सीधा हरिद्वार पहुंचा था। यहां एक संत के माध्यम से पहली बार अशोक की मुलाकात नरेंद्र गिरि से हुई थी। नरेंद्र गिरि ने अशोक को अपना शिष्य बना लिया था और साल 2000 में अशोक ने संन्यास लेने का फैसला किया था। इसके बाद अशोक ने बाघंबरी मठ को ही अपना ठिकाना बना लिया और नरेंद्र गिरि को अपना गुरु। परिवार ने करीब पांच साल बाद साल 2001 में एक भक्ति चैनल पर प्रवचन देते हुए अशोक चोटिया को पहचाना था। लेकिन तब तक वह संन्यासी बन चुका था। आनंद गिरि इसके बाद लंबे समय तक अपने घर नहीं आया। साल 2012 में नरेंद्र गिरि के साथ पहली बारऔर यहीं दीक्षा दिलवाने के बाद उसका नाम आनंद गिरि किया गया था। हालांकि पिछले दिनों विवाद के बाद नरेंद्र गिरि ने आनंद को मठ से बाहर कर दिया था और वह फिलहाल हरिद्वार में ही रह रहा था।भी पहले बैंक में नौकरी किया करते थे। बैंक ऑफ़ बड़ोदा में नौकरी मिलने के बाद परिवार नरेंद्र की शादी करवाना चाहता था, लेकिन वह इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। परिवार के दबाव से परेशान आकर नरेंद्र ने बैंक के गार्ड को चाभी सौंपी और चले गए। कुछ समय बाद परिवार को जानकारी मिली कि नरेंद्र सिंह अब नरेंद्र गिरि बन गए हैं। नरेंद्र सिंह के पिता भानु प्रताप भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सदस्य थे और सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते थे। चार भाइयों में दूसरे पर नरेंद्र गिरि थे। उनके दो भाई अध्यापक जबकि एक भाई होमगार्ड की नौकरी करता है। नरेंद्र गिरि के निधन की खबर मिलते ही परिवार के सभी लोग स्तब्ध रह गए थे। उनके मामा महेश सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘नरेंद्र ने अपने जीवन में इतने उतार-चढ़ाव देखे थे कि हमें लगता ही नहीं है कि वो आत्महत्या भी कर सकते हैं।’.

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध परिस्थियों में मौत हो गई थी। पुलिस को मौके से कथित सुसाइड नोट भी बरामद हुआ था। कथित सुसाइड नोट में आनंद गिरि पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे। नरेंद्र गिरि ने कथित सुसाइड नोट में लिखा था कि आनंद गिरि उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहा था। पुलिस ने इसके आधार पर आनंद गिरि को पहले हिरासत में लिया और फिर गिरफ्तार कर लिया था। आनंद गिरि को शिक्षा महंत नरेंद्र गिरि ने ही दी थी। कुछ विवाद होने के बाद उन्हें अखाड़े से बाहर कर दिया गया था। आइए पहले आपको आनंद गिरि के जीवन की पूरी कहानी बताते हैं। आनंद गिरि मूल रूप से राजस्थान के भीलवाड़ा के सरेरी गांव का रहने वाला है। आनंद गिरि का नाम अशोक चोटिया है और वह चार भाइयों में सबसे छोटा है। अशोक की शुरुआती पढ़ाई भीलवाड़ा में ही हुई थी। साल 1996 में सिर्फ 12 साल की उम्र में वह घर छोड़कर चला गया था। यहां से वह सीधा हरिद्वार पहुंचा था। यहां एक संत के माध्यम से पहली बार अशोक की मुलाकात नरेंद्र गिरि से हुई थी। नरेंद्र गिरि ने अशोक को अपना शिष्य बना लिया था और साल 2000 में अशोक ने संन्यास लेने का फैसला किया था। इसके बाद अशोक ने बाघंबरी मठ को ही अपना ठिकाना बना लिया और नरेंद्र गिरि को अपना गुरु। परिवार ने करीब पांच साल बाद साल 2001 में एक भक्ति चैनल पर प्रवचन देते हुए अशोक चोटिया को पहचाना था। लेकिन तब तक वह संन्यासी बन चुका था। आनंद गिरि इसके बाद लंबे समय तक अपने घर नहीं आया। साल 2012 में नरेंद्र गिरि के साथ पहली बारऔर यहीं दीक्षा दिलवाने के बाद उसका नाम आनंद गिरि किया गया था। हालांकि पिछले दिनों विवाद के बाद नरेंद्र गिरि ने आनंद को मठ से बाहर कर दिया था और वह फिलहाल हरिद्वार में ही रह रहा था।भी पहले बैंक में नौकरी किया करते थे। बैंक ऑफ़ बड़ोदा में नौकरी मिलने के बाद परिवार नरेंद्र की शादी करवाना चाहता था, लेकिन वह इसके लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। परिवार के दबाव से परेशान आकर नरेंद्र ने बैंक के गार्ड को चाभी सौंपी और चले गए। कुछ समय बाद परिवार को जानकारी मिली कि नरेंद्र सिंह अब नरेंद्र गिरि बन गए हैं। नरेंद्र सिंह के पिता भानु प्रताप भी राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सदस्य थे और सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहते थे। चार भाइयों में दूसरे पर नरेंद्र गिरि थे। उनके दो भाई अध्यापक जबकि एक भाई होमगार्ड की नौकरी करता है। नरेंद्र गिरि के निधन की खबर मिलते ही परिवार के सभी लोग स्तब्ध रह गए थे। उनके मामा महेश सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘नरेंद्र ने अपने जीवन में इतने उतार-चढ़ाव देखे थे कि हमें लगता ही नहीं है कि वो आत्महत्या भी कर सकते हैं।’

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