भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की संभावना बढ़ रही है। भारत, ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ को कम करने की कोशिश कर रहा है। अमेरिका-चीन समझौते में अमेरिका के कमजोर पड़ने से भारत को भी उम्मीद है। रूस से तेल खरीद पर भारत का रुख और अमेरिका की शर्तों पर लचीलापन समझौते के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत को व्यापार के साथ देशहित को भी ध्यान में रखना...
रुमनी घोष। भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर चली आ रही लंबी 'तनातनी' कम होने की संभावना नजर आ रही है। भारत की तेल कंपनियों द्वारा रूस से तेल खरीदी से किनारा और यूएस-चीन के बीच हुए समझौते और टैरिफ में कटौती इसके दो अहम संकेत हैं। व्यापार जगत में हलचल है कि नवंबर में भारत की डील भी फाइनल हो सकती है। इस ट्रेड डील के संदर्भ में डब्ल्यूटीओ में भारत के पूर्व राजदूत और स्थायी प्रतिनिधि जयंत दासगुप्ता का आकलन है कि भारत ट्रंप द्वारा लगाए गए पारस्परिक टैरिफ को 10 से 15 प्रतिशत पर ले आने की कोशिश में है। उन्होंने कहा जब तक दोनों देश इस टैरिफ पर सहमति नहीं जताते, तब तक यह व्यापार समझौता शायद ही हो पाएगा और वार्ता चलती रहेगी। दासगुप्ता जनवरी 2009 से प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में सचिव के रूप में कार्यरत रहे हैं। उन्होंने वाणिज्य विभाग में संयुक्त सचिव के रूप में 2006 से 2008 के बीच विश्व व्यापार संगठन में दोहा दौर की वार्ताओं को भी संभाला है। दैनिक जागरण की समाचार संपादक रुमनी घोष ने उनसे आने वाले दिनों में अमेरिका-भारत के बीच चल रही वार्ता के किसी निर्णायक स्थिति तक पहुंचने की संभावना, आने वाले समय की चुनौतियां और अवसर पर आनलाइन चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंशः अमेरिका-चीन के बीच हुए व्यापार समझौते से भारत के लिए क्या संकेत है? - इस समझौते में अमेरिका कुछ कमजोर पड़ता नजर आया है। ट्रंप को कुछ हद तक बैकफुट पर आना पड़ा। रेयर अर्थ मिनरल्स के बदले 57 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 47 प्रतिशत करना पड़ा। यह भारत के लिए भी अच्छे संकेत हैं, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो गया कि टैरिफ लगाने के बाद ट्रंप जिस तरह के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे, वह नहीं मिला। चीन और भारत जैसे देश टैरिफ के सामने नहीं झुके। यही वजह है कि अमेरिका को चीन से वार्ता की पहल करनी पड़ी। भारत की ओर से व्यापार समझौते पर लगातार बातचीत जारी है। हालांकि रेयर अर्थ मिनरल्स की वजह से चीन की स्थिति बहुत मजबूत है, लेकिन भारत के पास भी बड़ा बाजार है। अमेरिका उसे खोने का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं है। इसके अलावा अब ट्रंप पर अमेरिका में ही इसके खिलाफ राजनीतिक दबाव बन रहा है। आप दोहा ट्रेड डील सहित कई व्यापार समझौते के गवाह रहे हैं। किन परिस्थितियों में यह व्यापार समझौता हो सकता है ? - अमेरिका ने भारत पर पहले 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया। उसके बाद रूस से तेल खरीदने पर 25 प्रतिशत जुर्माना लगाया। अमेरिका लगातार यह कहता रहा कि भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा तो वह जुर्माना हटा लेगा। भारत ने यह पक्ष रखा कि भारत जनहित में रूस से सस्ता तेल खरीदता रहेगा। हाल ही में जब अमेरिका ने रूस की दो तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाया तो भारतीय tel इंडियन ऑइल कॉर्पोरेशन और रिलायंस ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया है। यह कहा जा सकता है कि ये दो भारतीय तेल कंपनियों ने रूस की दोनों प्रतिबंधित कंपनियों से तेल खरीदना 21 नवंबर के बाद से बंद करने की योजना बना रहे हैं । इसके आधार पर भारत अब अमेरिका पर दबाव बनाएगा कि अब वह 25 प्रतिशत जुर्माना हटा ले। उसके बाद शेष 25 प्रतिशत टैरिफ को हटाने या इसे कम करने पर समझौता होगा। हमारी टैरिफ डील में मुख्यत: तीन चीजें हैं। जिन पर आकर बात अटक रही है, वह है सोयाबीन, मक्का और डेयरी प्रोडक्ट। व्यापार समझौता में इसका हल निकालने की ही कोशिश होगी। रूस की तेल कंपनियों पर प्रतिबंध सिर्फ अमेरिका ने लगाया, फिर हम मानने के लिए बाध्य क्यों हैं?- बेशक यह प्रतिबंध सिर्फ अमेरिका ने लगाया है। यदि हम अमेरिका से ट्रेड डील नहीं करना चाहते तो इस प्रतिबंध से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन हम अमेरिका से व्यापार समझौता करना चाहते हैं। इससे हमारी अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है। हम दुनिया में सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को करते हैं। इससे हमारे देश का हित जुड़ा हुआ है। इस वजह से अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को भारत मान रहा है। अगर भारत अमेरिका से व्यापार समझौता नहीं करता है तो हमारे विदेश व्यापार और रोजगार में नुकसान जारी रहेगा। साथ ही अमेरिका इस टैरिफ को और बढ़ा भी सकता है। इससे रूस की तेल खरीदने के तुलना में हमें ज्यादा आर्थिक नुकसान सहना पर सकता है। कारोबारी रिश्ते के अलावा भी अमेरिका से बहुआयामी संबंध है। हमारी सर्विस एक्सपोर्ट सबसे ज्यादा यूएस को ही जाती है। सबसे ज्यादा अप्रवासी भारतीय भी वहीं रहतै हैं। उनके हितों का भी ध्यान रखना होगा। तो क्या माना जाए कि हमें अमेरिका की शर्तों के आगे झुकना पड़ा? - इसे झुकना नहीं कहेंगे बल्कि आप इसे लचीलापन कह सकते हैं। देश हित और व्यापार दोनों के लिए यह जरूरी है। हमारी व्यापार नीति शुरू से ही इसी तरह की रही है। ट्रंप का रवैया चाहे जैसा भी रहा हो, लेकिन भारत सिर्फ एक ही बात कहता रहा है कि हम अपने देश के लोगों के हितों का ध्यान रखेंगे। इसमें कोई दो मत नहीं है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता हमारे लिए जरूरी है। हां, यह अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण है। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि अप्रैल से अक्टूबर तक लगभग 20 अरब डालर एक्सपोर्ट का नुकसान हुआ है। आरोप लग रहा है कि भारत सरकार सख्त जवाब नहीं दे रही है। चीन की तरह भारत ने पलटवार कर अमेरिका पर टैरिफ क्यों नहीं लगाया?- हमें अपनी स्थितियों को देखते हुए ही प्रतिक्रिया देनी होगी । भारत वास्तव में वस्तु व्यापार के मामले में पलटवार नहीं कर सकता, क्योंकि यदि हम उन उत्पादों को देखें, जो भारत अमेरिका से आयात करता है, तो यह अमेरिका को निर्यात किए गए उत्पादों की तुलना में बहुत कम है। जो उत्पाद भारत अमेरिका से खरीदता है.
..जैसे रसायन, अनपालिश और अनकट हीरे, बहुत सारे पूंजीगत सामान, कुछ खनिज तेल, और खाद्य तेल आदि का आयात वास्तव में पिछले वर्षों में बढ़ रहे हैं। यदि सभी उत्पाद हमारे उद्योगों के पहियों को चलाने के लिए हैं। यदि हम पलटवार करते हैं, तो हमें नुकसान उठाना पड़ेगा और हम apne उद्योग को प्रतिस्पर्धी बनाने में असमर्थ रहेंगे। दूसरी बात, सेवाओं, एच1-बी वीजा और कई अन्य क्षेत्रों में, हम अमेरिका पर बहुत निर्भर हैं। हमारे लाखों पेशेवर अमेरिका में काम करते हैं, और यदि आप उस देश को देखें जो सबसे अधिक फारेन इनवर्ड रेमिटेंस का स्रोत है, जो हमें चालू खाता घाटे को पार करने में मदद करता है, तो वह यूएस है। फारेन इनवर्ड रेमिटेंसयानी, विदेश से भरत में स्थित खाते में धनराशि प्राप्त करने की प्रक्रिया है। इसका उपयोग विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जैसे परिवार का भरण-पोषण, शिक्षा या व्यावसायिक भुगतान। यह धनराशि आमतौर पर विदेशी मुद्रा में भेजी जाती है, जिसे प्रचलित विनिमय दर पर भारतीय रुपये में परिवर्तित किया जाता है और प्राप्तकर्ता के बैंक खाते में जमा कर दिया जाता है। ट्रंप सरकार ने भारत पर दबाव बनाने के लिए कुछ हद तक एच-1बी वीजा नियमों में कढ़ाई बरतने के कदम उठाए हैं। ये सभी कारक हैं जिन्हें हमें आगे बढ़ने के तरीके पर निर्णय लेते समय ध्यान में रखना पड़ रहा है। इन परिस्थितियों की वजह से हम पलटवार करने वाले टैरिफ के बारे में इस समय नहीं सोच सकते हैं। व्यापार में दूसरों की देखा-देखी या जिद में कोई कदम नहीं उठाया जाता है, बल्कि हमेशा अपने ओवरआल प्राफिट यानी दूरगामी संपूर्ण लाभ को देखा जाता है। भारत वही कोशिश कर रहा है। क्या नवंबर में भारत-अमेरिका व्यापार समझौता हो जाएगा और भारत टैरिफ दरों को किस स्तर तक घटाने की कोशिश करेगा?- मैं यह तो नहीं कह सकता कि नवंबर में डील फाइनल हो जाएगा, लेकिन इसके होने के बहुत सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। हमारी पूरी कोशिश होगी कि सोयाबीन, मक्का और डेयरी प्रोडक्ट के क्षेत्र में कोई समझौता किए बगैर 25 प्रतिशत टैरिफ को घटाकर 10-15 प्रतिशत पर ले आए। अमेरिका ने चीन के टैरिफ में भी लगभग 10 प्रतिशत की कटौती की है। उस लिहाज से उम्मीद है कि भारत के लिए भी कुछ सकारात्मक कदम देखने को मिलेगा। अमेरिका व्यापार समझौता हो जाने के बाद भी भारत को किन बातों पर सचेत रहने की जरूरत है ?- बेशक ट्रंप द्वारा लगाया गया टैरिफ भारत के लिए बड़ा झटका है, लेकिन इसकी वजह से भारत ने अन्य देशों के साथ व्यापार के दायरे को बढ़ाया है। चीन से भी व्यापार संबंध सुधरे हैं। डब्ल्यूटीओ का गठन बहुदेशीय व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए हुआ था। अब सारे व्यापार दो देशों के बीच हो रहे हैं। टैरिफ युद्ध पर कोई नियंत्रण नहीं है। क्या डब्ल्यूटीओ उद्देश्य से भटक गया है?- यह सही है कि डब्ल्यूटीओ इस पूरे मामले में निष्क्रिय नजर आया। यूएन की तरह ही ट्रंप ने इसके औचित्य और नियम-शर्तों को मानने से इन्कार कर दिया और मनमाने ढंग से टैरिफ लगाया। डब्ल्यूटीओ का गठन बहुदेशीय व्यापार को बढ़ावा देने और विकासशील व विकसित देशों के बीच टैरिफ को नियंत्रित रखने के लिए किया गया था। भारत जैसे विकासशील देशों पर कम टैरिफ लगाने का प्रविधान रखा गया था, ताकि उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम व आत्मनिर्भर होने में मदद मिले। इसका फायदा मिला और भारत ने व्यापार के क्षेत्र में अच्छी बढ़त ली। अमेरिका यह आरोप लगाता रहा कि भारत अमेरिका को ऊंची दरों पर माल बेचता है और कम दरों में खरीदी करता है। यह आरोप इसलिए निराधार है, क्योंकि भारत ने डब्ल्यूटीओ द्वारा तय दरों व नियमों के तहत ही व्यापार शर्तें लागू की। जबकि ट्रंप ने आने के बाद इन सभी नियमों को तोड़ दिया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक देश की मोनोपॉली को चुनौती देने के लिए क्या कोई ऐसा अपीलीय प्राधिकरण है?- बिलकुल है। डब्ल्यूटीओ का खुद का अपीलीय प्राधिकरण है। वर्ष 1995 में स्थापित, अपीलीय प्राधिकरण को विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों के बीच व्यापार विवादों में अस्थायी पैनलों द्वारा जारी रिपोर्टों पर अपीलों की सुनवाई हेतु सात सदस्यों की एक स्थायी समिति के रूप में डिजाइन किया गया था। डब्ल्यूटीओ की विवाद निपटान निकाय द्वारा अपनाए जाने के बाद इसकी रिपोर्टें अंतिम और संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होती थीं। हालांकि अब यह संस्था निष्क्रिय है, क्योंकि उसने ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही नए सदस्यों की नि्युक्ति पर रोक लगा रखी है। तो फिर भारत जैसे देशों ने इस अपीलीय प्राधिकरण में अमेरिका द्वारा लगाए गए मनमाने टैरिफ के खिलाफ अपील क्यों नहीं की? - आमतौर पर लोग कहते हैं कि ट्रंप बगैर सोचे-समझे एकाएक फैसले लेते हैं, लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। ट्रंप अपने पिछले कार्यकाल से ही इसकी तैयारी कर रहे थे। जरा तारीखों पर गौर कीजिए...11 दिसंबर, 2019 से डब्ल्यूटीओ अपीलीय निकाय किसी भी अपील पर सुनवाई के लिए आवश्यक न्यूनतम तीन सदस्यों की संख्या के अभाव में निर्णय जारी करने में असमर्थ रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने निकाय के अतिक्रमण और प्रक्रियात्मक मुद्दों के बारे में विभिन्न दीर्घकालिक चिंताओं का हवाला देते हुए, नए सदस्यों की नियुक्ति को लगातार अवरुद्ध किया है। अंतिम सदस्य का कार्यकाल दिसंबर 2019 में समाप्त हो गया, जिससे निकाय में कोई भी कार्यरत सदस्य नहीं बचा। वैसे इस मामले में सिर्फ ट्रंप सरकार को ही नहीं, बल्कि अमेरिकी सरकार को जिम्मेदार ठहराना ज्यादा उचित होगा। क्योंकि 2021 से 2024 तक बाइडन प्रशासन रहा। उन्होंने भी निकायों के naye सदस्यों की नियुक्ति नहीं होने दी। आप लंबे समय तक सीआइआइ से जुड़े रहे हैं। भारतीय उद्योगों को आपकी क्या सलाह है?- भारत को मैन्यूफैक्चरिंग के क्षेत्र में बड़ा काम करना होगा। इस मामले में चीन हमसे बहुत आगे है। हमारी ओर से नवाचार, उत्पादकता में बढ़ोत्तरी, गुणवत्ता सुधार, नई तकनीक और निवेश की जरूरत है। आपका बयान है कि टैरिफ को लेकर ट्रंप ने अपनी 'सोच' राजनीति में आने से पहले तय कर ली थी। इसका आधार क्या है? - टैरिफ को लेकर ट्रंप की सोच आज की नहीं है। राजनीति में आने से पहले उन्होंने ओपरा विन्फ्रे के एक शो में कहा था कि टैरिफ ही दुनिया की अनेक समस्याओं का समाधान है। इस साक्षात्कार को सुनकर यह महसूस किया जा सकता है कि ट्रंप की टैरिफ नीति अचानक लिया गया निर्णय नहीं है, बल्कि वह मानते हैं कि इसके जरिये दबाव बनाकर किसी से भी कुछ करवाया जा सकता है। अपने पिछले कार्यकाल में भी उन्होंने यह बातें कही थीं, हालांकि उस समय वह इसे पूरी तरह से लागू नहीं कर पाए थे। इस कार्यकाल में उन्होंने इसे मनमाने ढंग से लागू किया।
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