'जितना भी तैरता, लगता जैसे एक ही जगह पर अटका हूँ': समुद्र में 26 घंटे तैरकर ऐसे बची शिवमुरुगन की जान

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शिवमुरुगन मछली पकड़ने के दौरान समुद्र में गिर गए थे. पढ़िए किस तरह से बिताए उन्होंने समुद्र में वो 26 घंटे.

'जितना भी तैरता, लगता जैसे एक ही जगह पर अटका हूँ': समुद्र में 26 घंटे तैरकर ऐसे बची शिवमुरुगन की जानलेकिन फ़िसलकर समुद्र में गिर गए. उन्हें 26 घंटे बाद बचाया जा सका.कन्याकुमारी में रहने वाले एक लेखक पॉलीन ने कहा, "शिवमुरुगन के लापता होने की ख़बर तट तक पहुंच गई थी.

उन्हें बचाने के सभी प्रयास विफल रहे, इसलिए हमने सोचा कि उनके बचने की कोई संभावना नहीं है. क्योंकि अगर वह तमिलनाडु के दक्षिण में समुद्र में खो गए, तो उनके ज़िंदा वापस लौटने की उम्मीद बहुत कम थी." कुलाचल मरीन पुलिस के अधिकारियों ने बताया, "जैसे ही शिवमुरुगन के लापता होने की सूचना मिली, पुलिस ने उन्हें बचाने के प्रयास शुरू कर दिए. हालांकि, उनका कोई पता नहीं चला. कूटनकुली गांव के कुछ मछुआरे जब मछली पकड़ने समुद्र में गए, तो उन्होंने शिवमुरुगन को देखा. उन्होंने 22 सितंबर की तड़के उन्हें बचाया और किनारे पर ले आए. बाद में, शिवमुरुगन का इलाज किया गया."उन्होंने कहा, "हम आमतौर पर चेट्टीकुलम से रात 2 बजे निकलते हैं. चिन्नमुत्तम पहुंचने के बाद, हम सुबह 4.30 बजे मछली पकड़ने के लिए नाव से वहां से निकल पड़ते हैं. शनिवार को हम गए, जाल बिछाए और मछलियां पकड़ीं. हम शाम 6 बजे किनारे पर लौटने लगे." उन्होंने कहा, "रात 8 बजे मैं पेशाब करने के लिए नाव के एक तरफ गया. तब हम कन्याकुमारी तट से 15 समुद्री मील दूर थे. अचानक, एक बड़ी लहर नाव से टकराई. नाव हिली और मैं फिसलकर समुद्र में गिर गया. फिर मैं तैरकर नाव के पास गया और चिल्लाया. लेकिन नाव के इंजन के शोर के कारण वे मेरी आवाज़ नहीं सुन सके." शिवमुरुगन ने कहा, "जब मैं 10-15 मिनट तक वापस नहीं लौटा, तो मेरा भाई बाहर आया और मुझे ढूंढ़ने लगा. जब उसे एहसास हुआ कि क्या हुआ है, तो उसने चिल्लाकर सबको बुलाया. जीपीएस डिवाइस की मदद से वे नाव वापस लाए और मुझे ढूंढ़ा. लेकिन लहरें मुझे बहुत दूर तक खींच ले गई थीं." उन्होंने कहा, "वे मुझे विशाल समुद्र और रात के कारण नहीं देख पा रहे थे. मैं हाथ उठाकर चिल्लाता रहा. डीज़ल की समस्या के कारण वे वापस लौट गए. वे कुछ और नावों के साथ मुझे ढूंढ़ते हुए वापस आए. मैंने नावों की लाइटों को देखा, चिल्लाया, हाथ हिलाए. मैं कुछ घंटों तक ऐसा करता रहा, जब तक कि वे वापस नहीं चले गए."शिवमुरुगन तट से 15 समुद्री मील दूर थे, जब समुद्र में गिर गए शिवमुरुगन ने बताया कि लहरों के लगातार उनके चेहरे से टकराने के कारण उनकी त्वचा छिल गई, समुद्र का खारा पानी उनकी आंखों और मुंह में चला गया. इससे उनके गले में घाव हो गए. वह याद करते हैं, "चारों ओर अंधेरा था, मैं समुद्र के बीचों-बीच तैर रहा था. मेरे दिमाग में बस एक ही ख्याल था-किसी तरह किनारे तक पहुंचना है. मुझे चिंता थी कि अगर मेरी जान चली गई तो मेरे परिवार का क्या होगा. मैंने अपना वज़न कम करने के लिए अपनी टी-शर्ट उतार दी ताकि मैं पानी में आसानी से तैर सकूं. तभी, मेरे पूरे शरीर पर किसी चीज़ ने काटना शुरू कर दिया." शिवमुरुगन बताते हैं, "वे जेलीफ़िश जैसे थे. मुझे याद आया कि गांव के कुछ लोगों ने क्या कहा था कि अगर वे कुछ देर तक वहां रहें तो शरीर से चिपक जाते हैं और त्वचा में छेद कर देते हैं. मैंने उन्हें एक-एक करके हटाया. मैं तैरता रहा, हाथ-पैर हिलाता रहा. मेरा शरीर थकने लगा था. कभी-कभी, अगर मैं डूब भी जाता, तो मैं तैरकर पानी की सतह पर आ जाता. अगली सुबह जब मैंने सूरज देखा, तो मुझे उम्मीद जगी कि मैं किसी तरह किनारे तक तैरकर पहुंच जाऊंगा." जब शिवमुरुगन किनारे की ओर तैरने लगे, तो लहरें उन्हें परेशान करने लगीं. वे जिस भी दिशा में तैरते, लहरें और हवा उन्हें दूसरी दिशा में धकेल देतीं. पकड़ने के लिए एक भी लकड़ी नहीं थी, और वे लहरों के प्रभाव से दूर बहते जा रहे थे. इस पर शिवमुरुगन ने आगे बढ़ने की कोशिश करना छोड़ दिया. शिवमुरुगन कहते हैं, "मैं चाहे जितना भी तैरता, मुझे ऐसा लगता जैसे मैं एक ही जगह पर अटका हुआ हूँ. ठंड से मेरे पैर सुन्न हो गए थे. जैसे-जैसे सूरज डूबता गया और अंधेरा छाने लगा, मेरे शरीर की सारी ताकत और हिम्मत ख़त्म हो गई. आखिरकार मुझे समझ आया कि ऐसा क्यों कहा जाता है कि दक्षिणी समुद्र में खो जाने वाला कोई भी ज़िंदा नहीं बचता. दर्द बर्दाश्त न कर पाने के कारण, मैं आत्महत्या करना चाहता था. उस समय तक, गांव वालों को भी लग गया था कि मैं मर चुका हूँ." वह बताते हैं, "जब मैं डूब रहा था तो मैं साँस नहीं ले पा रहा था. लेकिन मैं ऊपर आता रहा. मैंने ढेर सारा समुद्री पानी पी लिया. इस बार, जब मुझे लगा कि मैं ज़रूर डूब जाऊंगा, तो मैंने दूर से एक रोशनी देखी."पॉलीन ने कहा कि शिवमुरुगन का बचना एक चमत्कार था. उनका मानना है कि दक्षिणी सागर अन्य समुद्रों से ज़्यादा ख़तरनाक है.शिवमुरुगन ने जो प्रकाश देखा, उसे 'नाव की हेडलाइट' बताया. वह कहते हैं, "मैंने अपनी ताकत जुटाई और हाथ हिलाए. उन्होंने मुझे देखा और नाव मेरी ओर मोड़ दी. मैं भी नाव की ओर तैर गया. लगभग 30 मिनट तक, मैं समझ नहीं पाया कि मुझे समुद्र से किसने बचाया था या वे क्या कह रहे थे. मैं चाय और बिस्कुट खाने के बाद ही अपनी आंखें खोल पाया. यह कूटनकुजी गांव के अरुलप्पन की नाव थी. " तट पर पहुंचने के बाद शिवमुरुगन को मेडिकल सहायता दी गई. शिवमुरुगन विवाहित हैं और उनका एक पांच साल का बेटा है. शिवमुरुगन ने कहा, "पिछले क़रीब एक महीने से मैंने समुद्र में कदम नहीं रखा है. मेरे बेटे और परिवार ने मुझे अब समुद्र में न जाने की सलाह दी है. मैं अभी भी चैन से सो नहीं पाता. मेरे साथ ऐसा होने के बाद, मेरा भाई काम के सिलसिले में विदेश चला गया." शिवमुरुगन ने कहा, "मैं कभी-कभी किनारे पर खड़ा होकर समुद्र को देखता हूँ. मुझे आज भी वह समुद्र याद है जो मैंने उस रात देखा था. मेरे शरीर पर जेलीफ़िश, मेरे सिर के चारों ओर जुगनू मंडरा रहे थे. मैं तब तक अपने पैर समुद्र के पानी में नहीं डाल सकता जब तक कि मैं उस दृश्य को भूल न जाऊँ."स्थानीय लेखक पॉलीन का मानना ​​है कि दक्षिण सागर अन्य समुद्रों की तुलना में अधिक खतरनाक हैइस बारे में ब्रिटेन के रॉयल नेशनल लाइफ़बोट इंस्टीट्यूशन की सलाह है. इस सलाह के मुताबिक पानी में तैरते रहें, धीरे-धीरे सांस लेने की कोशिश करें. स्थिरता बढ़ाने के लिए अपनी बाहों और पैरों को फैलाएं. अगर आपका पूरा शरीर तैर नहीं रहा है, तब भी आपको पानी के ऊपर रहना चाहिए, आपका सिर पीछे की ओर झुका होना चाहिए और चेहरा आसमान की ओर होना चाहिए." 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