Madras High Court Husband Wife Judgement Update;
80 साल का पति, पत्नी से क्रूरता का दोषी; मद्रास हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखीमद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय विवाह प्रणाली को पुरुष वर्चस्ववाद की छाया से निकलकर समानता और आपसी सम्मान के साथ बढ़ना चाहिए। क्योंकि शादी पुरुषों को पत्नी पर निर्विवाद अधिकार नहीं देती। पतियों को महिला के धैर्य को सहमति नहीं समझना चाहिए। जस्टिस एल विक्टोरिया गौरी की बेंच 1965 में विवाहित एक बुजुर्ग दंपती के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में सुनवाई कर रही थी। याचिका एक महिला ने लगाई थी, जिसके पति को IPC आईपीसी की धारा 498ए के तहत पत्नी के प्रति क्रूरता का दोषी ठहराया गया था। कोर्ट ने 31 अक्टूबर को सुनवाई के बाद 80 साल के शख्स को बरी किए जाने का निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि खराब शादीशुदा जीवन में महिलाओं की बेमतलब की सहनशीलता ने पुरुषों की पीढ़ियों को उन पर कंट्रोल करने और उन्हें अपने अधीन रखने का साहस दिया है।अब समय आ गया है कि इस देश के पुरुष इस विरासत में मिली धारणा को भूल जाएं कि विवाह उन्हें निर्विवाद अधिकार का हकदार बनाता है और यह समझना शुरू करें कि उनकी पत्नियों का आराम, सुरक्षा, आवश्यकताएं और सम्मान गौण कर्तव्य नहीं हैं, बल्कि वैवाहिक बंधन के मुख्य दायित्व हैं। कोई भी वैवाहिक बंधन अपमान को सही नहीं ठहरा सकता। महिलाओं, खासकर बुज़ुर्गों के धैर्य को सहमति या मौन स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि उम्र क्रूरता को पवित्र नहीं बनाती। यह महिला उन महिलाओं की पीढ़ी का प्रतीक है जो मानसिक और भावनात्मक क्रूरता को सहना अपना कर्तव्य समझती थीं। इसी सहनशीलता ने पुरुषों की पीढ़ियों को विशेषाधिकार की आड़ में नियंत्रण, प्रभुत्व और उपेक्षा करने की खुली छूट दी है।महिला ने कोर्ट में बताया था कि शादीशुदा जीवन के दौरान, उसके पति ने अवैध संबंध बनाए। जब उसने विरोध किया, तो उसने उसके साथ मारपीट और उत्पीड़न किया और उसे झूठे मामले में फंसाकर तलाक लेने की धमकी भी दी। महिला ने दलील दी कि पति ने पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाले फूलदार पौधे काट दिए, देवी-देवताओं की तस्वीरें फेंक दीं। फोन नहीं करने देता था। पारिवारिक समारोहों में जाने से मना कर दिया। 16 फरवरी 2007 को उसे भोजन व भरण-पोषण से वंचित कर दिया। इस तरह उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। महिला ने आरोप लगाया कि उसके लिए अलग रसोई बना दी गई। पति ने उसे चाकू मारने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह उसे कमरे में बंद करके भाग निकली। बाद में, पति के परिवार ने उसके खाने में जहर मिलाने की भी धमकी दी। इसके बाद महिला ने शिकायत दर्ज कराई। निचली अदालत ने पति को धारा 498ए के तहत दोषी ठहराया। हालांकि, फैसले को पलट दिया गया क्योंकि कोई चश्मदीद नहीं था, केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित सबूत थे। न ही दहेज की कोई मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने पति को 6 महीने के कारावास और 5 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना न भरने पर पर एक महीने के कारावास की सजा भी दी।लखनऊ की हवा जहरीली हुई, तालकटोरा की सबसे खराबनागौर जिले में आज बारिश का अलर्टकोटा में बारिश के बाद मौसम ठंडादौसा में कई इलाकों में बूंदाबांदी.
80 साल का पति, पत्नी से क्रूरता का दोषी; मद्रास हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखीमद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय विवाह प्रणाली को पुरुष वर्चस्ववाद की छाया से निकलकर समानता और आपसी सम्मान के साथ बढ़ना चाहिए। क्योंकि शादी पुरुषों को पत्नी पर निर्विवाद अधिकार नहीं देती। पतियों को महिला के धैर्य को सहमति नहीं समझना चाहिए। जस्टिस एल विक्टोरिया गौरी की बेंच 1965 में विवाहित एक बुजुर्ग दंपती के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में सुनवाई कर रही थी। याचिका एक महिला ने लगाई थी, जिसके पति को IPC आईपीसी की धारा 498ए के तहत पत्नी के प्रति क्रूरता का दोषी ठहराया गया था। कोर्ट ने 31 अक्टूबर को सुनवाई के बाद 80 साल के शख्स को बरी किए जाने का निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि खराब शादीशुदा जीवन में महिलाओं की बेमतलब की सहनशीलता ने पुरुषों की पीढ़ियों को उन पर कंट्रोल करने और उन्हें अपने अधीन रखने का साहस दिया है।अब समय आ गया है कि इस देश के पुरुष इस विरासत में मिली धारणा को भूल जाएं कि विवाह उन्हें निर्विवाद अधिकार का हकदार बनाता है और यह समझना शुरू करें कि उनकी पत्नियों का आराम, सुरक्षा, आवश्यकताएं और सम्मान गौण कर्तव्य नहीं हैं, बल्कि वैवाहिक बंधन के मुख्य दायित्व हैं। कोई भी वैवाहिक बंधन अपमान को सही नहीं ठहरा सकता। महिलाओं, खासकर बुज़ुर्गों के धैर्य को सहमति या मौन स्वीकृति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि उम्र क्रूरता को पवित्र नहीं बनाती। यह महिला उन महिलाओं की पीढ़ी का प्रतीक है जो मानसिक और भावनात्मक क्रूरता को सहना अपना कर्तव्य समझती थीं। इसी सहनशीलता ने पुरुषों की पीढ़ियों को विशेषाधिकार की आड़ में नियंत्रण, प्रभुत्व और उपेक्षा करने की खुली छूट दी है।महिला ने कोर्ट में बताया था कि शादीशुदा जीवन के दौरान, उसके पति ने अवैध संबंध बनाए। जब उसने विरोध किया, तो उसने उसके साथ मारपीट और उत्पीड़न किया और उसे झूठे मामले में फंसाकर तलाक लेने की धमकी भी दी। महिला ने दलील दी कि पति ने पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाले फूलदार पौधे काट दिए, देवी-देवताओं की तस्वीरें फेंक दीं। फोन नहीं करने देता था। पारिवारिक समारोहों में जाने से मना कर दिया। 16 फरवरी 2007 को उसे भोजन व भरण-पोषण से वंचित कर दिया। इस तरह उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। महिला ने आरोप लगाया कि उसके लिए अलग रसोई बना दी गई। पति ने उसे चाकू मारने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह उसे कमरे में बंद करके भाग निकली। बाद में, पति के परिवार ने उसके खाने में जहर मिलाने की भी धमकी दी। इसके बाद महिला ने शिकायत दर्ज कराई। निचली अदालत ने पति को धारा 498ए के तहत दोषी ठहराया। हालांकि, फैसले को पलट दिया गया क्योंकि कोई चश्मदीद नहीं था, केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित सबूत थे। न ही दहेज की कोई मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने पति को 6 महीने के कारावास और 5 हजार रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई। जुर्माना न भरने पर पर एक महीने के कारावास की सजा भी दी।लखनऊ की हवा जहरीली हुई, तालकटोरा की सबसे खराबनागौर जिले में आज बारिश का अलर्टकोटा में बारिश के बाद मौसम ठंडादौसा में कई इलाकों में बूंदाबांदी
Justice L Victoria Gowri Unquestioned Authority
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