शहीद मजीद के घर से दिखता है पाकिस्तान: पिता बोले- हमारे परिवार के 40 लड़के फौज में, देश की सेवा हमारे खून में

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शहीद मजीद के घर से दिखता है पाकिस्तान: पिता बोले- हमारे परिवार के 40 लड़के फौज में, देश की सेवा हमारे खून में
Nayanthara Special ForceCaptain Suman GuptaIndia-Pakistan Border
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21 नवंबर 2023, शाम का समय है। राजोरी में सेना की व्हाइट नाइट कोर यूनिट को अपने सोर्सेज से ये मैसेज मिला कि गुलाबगढ़ जंगल के कालाकोट इलाके में बीते दो दिन से आतंकी डेरा डाले हुए हैं। जंगल में जाने वाले चरवाहों से आतंकियोंJammu Kashmir Terrorist Encounter; Poonch Legend Havildar Abdul Majid Story 21 नवंबर 2023 को भारतीय सेना को खुफिया जानकारी मिलती...

पिता बोले- हमारे परिवार के 40 लड़के फौज में, देश की सेवा हमारे खून मेंशाम का वक्त। राजौरी में सेना की स्पेशल यूनिट को अपने सोर्सेज से मैसेज मिला कि गुलाबगढ़ जंगल के कालाकोट इलाके में दो दिन से आतंकी डेरा डाले हुए हैं। जंगल में जाने वाले चरवाहों से आतंकियों ने सेना के मूवमेंट के बारे में पूछताछ की थी।इनपुट के बाद यूनिट के कमांडो सर्च ऑपरेशन पर निकल गए। आतंकियों ने कमांडो के अपनी रेंज में आते ही फायरिंग शुरू कर दी। दोनों तरफ से फायरिंग होने लगी। रात करीब 11 बजे फायरिंग बंद हो गई। 22 नवंबर की सुबह आतंकी फिर से गोलाबारी करने लगे। सेना की स्पेशल टुकड़ी के एक अफसर घायल हो गए। हवलदार अब्दुल मजीद ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। इसके बाद मजीद उस गुफा के पास पहुंचे जिसमें एक आतंकी छुपा हुआ था। गुफा के अंदर से आतंकी ने हवलदार मजीद के ऊपर AK-47 से फायरिंग कर दी। मजीद के कमर के नीचे के हिस्से और पैरों में कई गोलियां लगीं। उन्होंने घायल हालत में ही गुफा को निशाना बनाकर एक के बाद एक चार ग्रेनेड फेंके। आतंकी मारा गया। ज्यादा खून बह जाने से अस्पताल में हवलदार अब्दुल मजीद शहीद हो गए। पुंछ के अजोट गांव के रहने वाले हवलदार अब्दुल मजीद पैराशूट रेजिमेंट की नौवीं बटालियन में पदस्थ थे। उन्हें इसी साल 26 जनवरी को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया है।हम लोग देश की रक्षा के लिए एलओसी पर रहने वाले सैनिकों के खानदान से हैं। हमारे परिवार के 40 लड़के फौजी हैं। सेना की सेवा करना हमारे खून में है।के आखिरी एपिसोड के लिए मैं शहीद अब्दुल मजीद के परिवार से मिलने उनके गांव अजोट जा रही हूं। 22 नवंबर 2023 को हवलदार अब्दुल मजीद शहीद हुए थे। दूसरे दिन उनका पूरे सैनिक सम्मान के साथ अजोट में अंतिम संस्कार किया गया था।जंग के दौरान इसी गांव से भारतीय सेना टैंकों से पाकिस्तान पर गोले दागती है। दुश्मन के टैंकों के गोले भी यहीं गिरते हैं। लोग जब खेतों की जुताई करते हैं तो कई बार मोर्टार के गोले मिल जाते हैं। यहां के लोगों के लिए ये आम बात है। 1965 के युद्ध के समय पाकिस्तान ने इसी अजोट गांव में घुसपैठ करते हुए बड़ा हमला किया था। भारतीय सैनिकों ने पूरी रात पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी का सामना किया था। इसी जगह पर नवग्रह मंदिर के बगल से युद्ध स्मारक बनाया गया है। पिछले साल सितंबर में यहां 72 फीट ऊंचा तिरंगा फहराया गया है, जो पाकिस्तान में भी कई किलोमीटर दूर से दिखता है।मुझे शहीद मजीद के परिवार से मिलना है। हालांकि वे लोग फोन पर पहले मना कर रहे थे। मीडिया से मिलना नहीं चाहते। कई बार रिक्वेस्ट करने पर वे मान गए। पुंछ पहुंचकर सबसे पहले मजीद के पिता मोहम्मद रशीद को फोन लगाया। उन्होंने कहा, ‘मैं अभी मालेरकोटला में बेटी की ससुराल आया हुआ हूं। आप घर जाइए, वहां मजीद की मां-बच्चे और मेरे बड़े भाई आपको सब बता देंगे।’ मजीद के पिता से बात करते-करते मेरी कार पुंछ सिटी से बाहर आ गई। अजोट के रास्ते में मक्के की फसलें लहलहा रही हैं। पुंछ से अजोट 10 किलोमीटर दूर है। आधा रास्ता तय करते ही बैतार नदी के ऊपर बने नए पुल पर पहुंच गई।ड्राइवर ने कहा, ‘ये नदी पाकिस्तान से होकर भारत आती है। पहले अजोट आने-जाने के लिए झूला पुल था। चार साल पहले आई बाढ़ में बह गया। नया पुल दो-तीन महीने पहले ही शुरू हुआ है।’ पुल पार करने के 15-20 मिनट बाद मैं अजोट पहुंच गई। भारत की सीमा के आखिरी गांव में आकर थोड़ा असहज भी महसूस कर रही थी। ऐसा लग रहा था कि इसके आगे अब हमारा कोई नहीं है। जहां सड़क खत्म हुई, उससे कुछ ही कदमों की दूरी पर अब्दुल मजीद का मकान है। ये बात मजीद के पिता ने फोन पर ही बता दी थी, इसलिए पता पूछने और घर तलाशने में कोई दिक्कत नहीं हुई। घर के बाहर तीन बच्चे खड़े दिखे। वे बार-बार घर के अंदर-बाहर आ जा रहे हैं। मैं समझ गई कि ये शहीद मजीद के ही बच्चे हैं। जैसे ही घर के सामने पहुंची बच्चों से नमस्ते बोली, जवाब देने के बाद वे मुझे घर के अंदर ले गए। पहले कमरे में कालीन बिछी हुई है। घर में दीवारों से लेकर फर्श तक टाइल्स लगी हुई हैं।जैसे ही कालीन पर बैठी, तीनों बच्चे मेरे पास आकर बैठ गए। लग रहा है कि बच्चों ने मुद्दत बाद कोई मेहमान देखा है।कहती है, डॉक्टर। फिर पूछा किसने कहा डॉक्टर बनना है, तो बताती है, ‘अब्बू जी ने।’मजीद का सबसे बड़ा बेटा मोहम्मद साहिल 10 साल का है। उसका सपना साइंटिस्ट बनना है। तीनों बच्चे अब्बू जी यानी अपने शहीद पिता अब्दुल मजीद के सपने को इबादत मान बैठे हैं। दिन-रात यह जज्बा इनमें फूंकती हैं इनकी दादी परवीन अख्तर।परवीन अख्तर कहती हैं, ‘माहिरा के टेस्ट में नंबर कम आते हैं, तो बड़े प्यार और डर से कहती है, अब्बू जी को मत बताना।’ उसे पिता की शहादत या उनके दुनिया में न रहने के बारे में नहीं पता। जब तक मैं अब्दुल मजीद के घर पर रही माहिरा मेरी गोद में ही बैठी रही।अब्दुल मजीद घर में सबसे बड़े थे। छोटे भाई सउदी अरब में टैक्सी ड्राइवर हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि उनकी मां से बातचीत कैसे और कहां से शुरू करूं।कुछ देर बाद आंसू पोंछते हुए कहती हैं, ‘मुझे अम्मी कहने वाला चला गया, वो शुरू से कुछ ऐसा करना चाहता था जिससे उसका परिवार खुश रहे सके।’ इतना कहते ही वे फिर रोने लगीं। मुझे लगा कि इन्हें कुछ वक्त देना चाहिए और मैं साहिल के साथ छत पर चली गई। वहीं बैठ साहिल से बात करने लगी। बातों-बातों में साहिल ने कहा, ‘देखिए वो पाकिस्तान है।’ मजीद के घर से पाकिस्तान की पहाड़ियां साफ-साफ नजर आ रही थीं। इस घर से एलओसी की दूरी 500 मीटर से भी कम है।थोड़ी देर बाद मैं साहिल के साथ नीचे आ गई। परवीन अख्तर वहीं बैठी थीं। बिना कुछ पूछे ही उन्होंने आंसू पोछते हुए कहा, ‘12वीं के बाद ही वो श्रीनगर जाकर फौज में भर्ती हो गया। उसे लगता था कि घर की जिम्मेदारी जितनी जल्द हो संभाल ले। उसने घर बनवाया, चार बहनों की शादी की, अपने बच्चों को पढ़ा रहा था।'उनकी आंखों में फिर से आंसू आ गए। खुद को संभालते हुए कहती हैं, ‘मुझसे मत पूछो कुछ भी, दिल में बहुत दुख है, बहुत दर्द है। रोती रहती हूं, हर वक्त उसका चेहरा मेरे सामने रहता है।’वे कहती हैं, ‘वो हमेशा मुझसे ही बातें किया करता था। उसके पिता हमेशा यही शिकायत करते कि उनसे तो कुछ कहता ही नहीं।‘ वो पुंछ शहर में जमीन लेना चाहता था।'अख्तर कहती हैं, ‘आज घर में सब कुछ है, लेकिन मजीद नहीं है। सेना के अफसर जब भी आते हैं, कहते हैं कि मजीद के जाने का इतना दुख उन्हें नहीं है, जितना उनको है। सेना के अफसर कहते हैं, ‘हमारी बाजू नहीं रही।’ अब्दुल मजीद की मां परवीन अख्तर कहती हैं, अल्लाह चाहते हैं कि मैं उसके बच्चों की परवरिश ठीक उसी तरह करूं जिस तरह मजीद की हुई थी। अख्तर कहती हैं, ‘क्या करें, बड़े बेटे पर कितना नाज होता है। उसने छोटी जिंदगी में काम बहुत बड़े किए। उसकी इच्छा थी कि उसके बच्चे अच्छे से पढ़ जाएं। उसने पुंछ में एक कमरा ले रखा था, जहां उसकी पत्नी बच्चों के साथ रहती थी। उसकी शहादत के बाद बच्चों समेत बहू यहां आ गई। अख्तर कहती हैं, ‘जब बच्चे पुंछ पढ़ने के लिए चले गए थे, तो मुझे लगता था कि चलो बच्चे अब बड़े हो गए। जिम्मेदारियों से फारिग हो चुकी हूं।’ मुझे नहीं पता था कि अल्लाह ता’आला ने मुझे फिर से जिम्मेदारी देनी है। अल्लाह का कहना है कि फिर से सब शुरू करना है। जैसे मैंने मजीद और उसके भाई को पाला, ठीक उसी तरह से इन बच्चों को पाल रही हूं? जो जिम्मेदारी वो मेरे लिए छोड़कर गया है मैं उसे निभा रही हूं।मैं परवीन अख्तर से बात कर ही रही थी कि इतने में मजीद के ताऊ मोहम्मद नजीर आकर मेरे सामने बैठ गए। मैंने नजीर से बातचीत शुरू की। नजीर कहते हैं, ‘मजीद बचपन से कहता था कि फौज में जाऊंगा। हमेशा शांत रहता था। छुट्टी पर भी आता तब भी किसी को पता नहीं चलता था। 2009 में वो फौज में गया, उसी साल हमने जमीन खरीदी। उसका सपना था कि उसके बच्चे खूब पढ़ें, गरीब माता-पिता सुखी हो जाएं और खुद देश की सेवा करे। कोई भी बात हो, कोई सलाह लेनी हो, सारा परिवार उसी से बात करता, बहुत अच्छा मशविरा देता था। हमें फख्र है, उसने देश के लिए शहादत दी है।' ये फोटो अब्दुल मजीद के अंतिम संस्कार के समय का है। जिस राष्ट्रीय ध्वज में लपेटकर उनका शव लाया गया था उसे सेना के अधिकारियों ने उनकी पत्नी सगेरा बी को दिया। बड़े बेटे ने पिता को सलामी देकर अंतिम विदाई दी। नजीर कहते हैं, 'मजीद के परिवार को उनकी शहादत के बारे में बाद में पता चला। सबसे पहले सेना ने उनके ससुर को फोन किया। उन्हें बताया गया कि मजीद जख्मी हो गए हैं। उन्होंने ये बात हमें बताई। हम सब इस घर में इकट्ठा हो गए। देर रात तक फौज के अफसर कहते रहे कि मजीद के पैर में गोली लगी है, उनका उधमपुर में इलाज चल रहा है। मजीद के दो साले भी फौज में हैं। दूसरे दिन सुबह उन्होंने सेना के अफसरों से कहा कि जो सही है, वो बात बता दीजिए, तब उन्हें बताया गया कि मजीद शहीद हो गए हैं। 'नजीर का कहना है, ‘संभलते-संभलते ये दिन आ गए हैं, हम बस दिन काट रहे हैं। उसके पिता दिलेर हैं। मां तो उसकी बात शुरू होते ही आपा खो देती हैं। क्या करें, कर भी क्या सकते हैं, जिंदगी के दिन काटने हैं।'अब्दुल मजीद के पिता ने कुछ साल सऊदी अरब में मजदूरी भी की। जब वे लौटकर आते तो मजीद उनसे कहते.

‘मैं फौज में चला जाऊंगा तो आपको कहीं पर भी जाने की जरूरत नहीं है।’ मैं मजीद के ताऊ से बात कर रही थी, तभी उनके पिता मो. रशीद का फोन आया। उन्होंने मेरे पास बैठे अपने बड़े भाई से मुझे फोन देने को कहा।मोहम्मद रशीद कहते है, 'हम लोग देश की रक्षा के लिए एलओसी पर रहने वाले सैनिकों के खानदान से हैं। हमारे परिवार के 40 लड़के फौजी हैं। सेना में सेवा करना हमारे खून में है।' कुछ रिटायर भी हो चुके हैं। 7 साल पहले मेरे चचेरे भाई नसीर भी आतंकियों से मुकाबला करते हुए शहीद हुए थे। मजीद के चाचा, मामा, साले, ताऊ के बेटे, चाचा के बेटे सेना में हैं। जब कभी-कभार शादी या किसी दूसरे मौके पर सब मिलते हैं तो ऐसा लगता है कि पूरी भारतीय फौज हमारे यहां है। उन्होंने कहा, ‘मजीद को 14 साल हो गए थे फौज में। 12वीं क्लास खत्म ही की थी कि वह खुद से जाकर फौज में भर्ती हो गया था।’ मजीद जब भी छुट्टी पर आता था तो छोटे भाई से कहता था कि देश से प्यार करो, देश के लिए कुछ करो। वो चाहता था कि उसके बच्चे अफसर बन देश की सेवा करें। पिता रशीद के अनुसार इन 14 सालों में मजीद जब भी एक महीने की छुट्टी पर आता, घर पर सिर्फ 15 दिन ही रुकता। उसे उसके देश और काम से इतना प्यार था कि वह 15 दिन बाद ड्यूटी पर वापस लौट जाता था।हम लोग मक्के की फसल काट कर फारिग हुए थे। मजीद अपनी पत्नी से कहने लगा कि घर का और कोई पेंडिंग काम है तो बताओ। इससे पहले वह एक-एक कर सारे काम निपटा चुका था। आखिरी बार उसने कहा कि फाइनल काम बता दो अब।हवलदार अब्दुल मजीद की शहादत के बाद 30 दिसंबर 2023 को उनकी पत्नी सगेरा बी को नियुक्ति पत्र देते जम्मू-कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा।एक दिन पहले उन्होंने मुझे फोन किया और कहा कि वह बहुत जल्द घर आएंगे। मैंने कल उन्हें कई बार कॉल किया, लेकिन उनका मोबाइल बंद जा रहा था। शाम को मुझे सेना की तरफ से कॉल आई और बताया कि वह एक मुठभेड़ में घायल हो गए हैं, अस्पताल में हैं। गांव के पूर्व सरपंच जसबीर सिंह कहते हैं, ‘मजीद गांव का बहुत ही अच्छा बच्चा था। जब भी छुट्टी पर आता था तो घर पर मिलने के लिए जरूर आता। जैसा मजीद था वैसे ही उसके बच्चे हैं। ‘ हम लोगों को मजीद की शहादत की खबर मीडिया से लगी थी। 4500 जनसंख्या वाले इस गांव के 100 लोग फौज में हैं। उसकी एक खूबी थी, अगर किसी गांव या परिवार में किसी की मौत हो गई है तो जब भी वह छुट्टी पर आता, उस घर में जरूर जाता।आखिर में मां परवीन अख्तर कहती हैं, ‘मजीद ने बहुत कोशिश की थी कि उसके गांव तक सड़क आ जाए, लेकिन सेना ने सड़क देने से इनकार कर दिया था।’लेकिन मजीद चारपाई पर बैठा हुआ कहता था कि अम्मी सड़क तो आएगी, सड़क तो आकर रहेगी।अख्तर कहती हैं, ‘मैं कई बार सोचा करती थी कि मजीद ऐसा क्यों कहता है। सड़क आखिर आएगी कैसे, मैं नहीं जानती थी कि सड़क ऐसे आएगी।’कश्मीर के फौजी औरंगजेब की कहानी:आतंकियों ने हाथ-पैर बांध गला रेता, वीडियो वायरल किया; बहन बोलीं- मैं बदला लूंगी कश्मीर की लड़की को रात में लेने आया था आतंकी:रुखसाना ने लश्कर-ए-तैयबा कमांडर की पहले गर्दन काटी, AK-47 से किए 30 फायर बुरहान वानी की हिट लिस्ट में थे लेफ्टिनेंट उमर फैयाज:शादी से किडनैप कर हत्या; मां ने दूसरा बेटा पैदा कर नाम रखा उमर फैयाज कश्मीर का जांबाज शहीद, जो कभी आतंकी था:पत्नी बोली- वो मुझे शेरनी बुलाता था, बेटे के लिए उसकी वर्दी संभालकर रखी हैलखनऊ में रात 11 बजे तक 3 मिलीमीटर हुई बारिशयूपी में जोरदार बारिश, मैनपुरी में हाईवे धंसामहराजगंज में लगातार बारिश, नदियों में ऊफान

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