शहरी गांवों में केवल विरासत के आधार पर प्रॉपर्टी के म्यूटेशन की इजाजत क्यों?

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शहरी गांवों में केवल विरासत के आधार पर प्रॉपर्टी के म्यूटेशन की इजाजत क्यों?
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दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें आरोप लगाया गया है कि दिल्ली सरकार की नई एसओपी जमीन मालिकों के बीच भेदभाव करती है। कोर्ट ने राजस्व विभाग को निर्देश दिया है कि वह इस याचिका पर कानून के मुताबिक उचित आदेश पारित करे।

नई दिल्ली : दिल्ली सरकार के रेवेन्यू डिपार्टमेंट ने शहरी गांवों में प्रॉपर्टी के म्यूटेशन के लिए हाल ही में जो मानक संचालन प्रक्रिया जारी की है, उसके जरिए जमीन मालिकों के बीच भेदभाव का आरोप लगाया जा रहा है। इस बारे में दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसने उसे विचार के लिए संबंधित विभाग के पास भिजवा दिया।चीफ जस्टिस मनमोहन और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच ने सेक्रेटरी रेवेन्यू , दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह मौजूदा याचिका को प्रतिवेदन के तौर पर लें और उस पर कानून के मुताबिक, एक उचित आदेश पारित करते हुए जल्द से जल्द उसका निपटारा करें। कोर्ट ने साफ किया कि उसने विवाद के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है। सभी पक्षों के अधिकारों और तर्कों को खुला रखा गया है।क्या है याचिकाकर्ता की मांग? यशपाल सिंह नाम के एक व्यक्ति की ओर से दायर याचिका में कोर्ट से उत्तरदाताओं को केवल विरासत के आधार पर म्यूटेशन के प्रतिबंध को हटाने और इस तरह से रजिस्टर्ड टाइटल डीड्स के आधार पर म्यूटेशन को संभव बनाने का निर्देश देने की मांग की। याचिकाकर्ता के वकील सौरभ कंसल ने दलील दी कि राजस्व विभाग ने 17 सितंबर, 2024 को एक आदेश और मानक संचालन प्रक्रिया जारी की है, जो दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 507 के तहत घोषित शहरी गांवों में केवल विरासत के माध्यम से मिले स्वामित्व में म्यूटेशन का प्रावधान करती है। उनका कहना है कि उक्त एसओपी के तहत, जो लोग रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से जमीन के मालिक बने, उन्हें बिना किसी साफ अंतर के इससे बाहर रखा गया है।संविधान के अनुच्छेद 14 के उल्लंघन का जिक्रउनका कहना है कि अचल संपत्ति में अधिकार, शीर्षक या हित केवल संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 के अनुसार एक रजिस्टर्ड साधन द्वारा हस्तांतरित किया जा सकता है और इसलिए उपरोक्त एसओपी विरासत के अलावा संपत्ति के ट्रांसफर के अन्य सभी प्रावधानों को निरर्थक बना देती है। उनका कहना है कि एसओपी दो श्रेणियों के लोगों जिनमें विरासत द्वारा प्राप्त टाइटल और अन्य कानूनी तरीकों से प्राप्त टाइटल वाले जमीन मालिकों के बीच कोई उचित अंतर किए बिना फर्क पैदा करता है और इस तरह यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।क्या है मामला? उन्होंने आगे कहा कि आदेश और एसओपी भविष्य में स्वामित्व का निर्धारण बहुत कठिन बना देगा, क्योंकि बिक्री के माध्यम से मिले स्वामित्व के लिए जमीन रिकॉर्ड अपडेट नहीं होगा। उनका यह भी कहना है कि इस तरह के प्रतिबंधात्मक म्यूटेशन बड़े धोखाधड़ी के लिए रास्ता बनाएंगे। बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने 3 सितंबर को राष्ट्रीय राजधानी में गांवों के शहरीकरण के बाद गांव वालों को उनकी पुश्तैनी अचल संपत्ति को रेवेन्यू रिकॉर्ड में अपने नाम से दर्ज कराने में आ रही कानूनी समस्याओं की अनदेखी पर केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा था। मामले में अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को होनी है।.

नई दिल्ली : दिल्ली सरकार के रेवेन्यू डिपार्टमेंट ने शहरी गांवों में प्रॉपर्टी के म्यूटेशन के लिए हाल ही में जो मानक संचालन प्रक्रिया जारी की है, उसके जरिए जमीन मालिकों के बीच भेदभाव का आरोप लगाया जा रहा है। इस बारे में दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई, जिसने उसे विचार के लिए संबंधित विभाग के पास भिजवा दिया।चीफ जस्टिस मनमोहन और जस्टिस तुषार राव गेडेला की बेंच ने सेक्रेटरी रेवेन्यू , दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह मौजूदा याचिका को प्रतिवेदन के तौर पर लें और उस पर कानून के मुताबिक, एक उचित आदेश पारित करते हुए जल्द से जल्द उसका निपटारा करें। कोर्ट ने साफ किया कि उसने विवाद के मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है। सभी पक्षों के अधिकारों और तर्कों को खुला रखा गया है।क्या है याचिकाकर्ता की मांग? यशपाल सिंह नाम के एक व्यक्ति की ओर से दायर याचिका में कोर्ट से उत्तरदाताओं को केवल विरासत के आधार पर म्यूटेशन के प्रतिबंध को हटाने और इस तरह से रजिस्टर्ड टाइटल डीड्स के आधार पर म्यूटेशन को संभव बनाने का निर्देश देने की मांग की। याचिकाकर्ता के वकील सौरभ कंसल ने दलील दी कि राजस्व विभाग ने 17 सितंबर, 2024 को एक आदेश और मानक संचालन प्रक्रिया जारी की है, जो दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 507 के तहत घोषित शहरी गांवों में केवल विरासत के माध्यम से मिले स्वामित्व में म्यूटेशन का प्रावधान करती है। उनका कहना है कि उक्त एसओपी के तहत, जो लोग रजिस्टर्ड सेल डीड के माध्यम से जमीन के मालिक बने, उन्हें बिना किसी साफ अंतर के इससे बाहर रखा गया है।संविधान के अनुच्छेद 14 के उल्लंघन का जिक्रउनका कहना है कि अचल संपत्ति में अधिकार, शीर्षक या हित केवल संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 के अनुसार एक रजिस्टर्ड साधन द्वारा हस्तांतरित किया जा सकता है और इसलिए उपरोक्त एसओपी विरासत के अलावा संपत्ति के ट्रांसफर के अन्य सभी प्रावधानों को निरर्थक बना देती है। उनका कहना है कि एसओपी दो श्रेणियों के लोगों जिनमें विरासत द्वारा प्राप्त टाइटल और अन्य कानूनी तरीकों से प्राप्त टाइटल वाले जमीन मालिकों के बीच कोई उचित अंतर किए बिना फर्क पैदा करता है और इस तरह यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।क्या है मामला? उन्होंने आगे कहा कि आदेश और एसओपी भविष्य में स्वामित्व का निर्धारण बहुत कठिन बना देगा, क्योंकि बिक्री के माध्यम से मिले स्वामित्व के लिए जमीन रिकॉर्ड अपडेट नहीं होगा। उनका यह भी कहना है कि इस तरह के प्रतिबंधात्मक म्यूटेशन बड़े धोखाधड़ी के लिए रास्ता बनाएंगे। बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने 3 सितंबर को राष्ट्रीय राजधानी में गांवों के शहरीकरण के बाद गांव वालों को उनकी पुश्तैनी अचल संपत्ति को रेवेन्यू रिकॉर्ड में अपने नाम से दर्ज कराने में आ रही कानूनी समस्याओं की अनदेखी पर केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा था। मामले में अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को होनी है।

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