वोट प्रतिशत गिरने से राजनीतिक दलों में खलबली, जानें किसका फायदा और किसका नुकसान?

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Lok Sabha Election 2024: लोकसभा चुनाव के लिए प्रथम चरण का मतदान हो चुका है, लेकिन इस बार पिछले चुनावों की अपेक्षा मतदान के प्रतिशत में काफी गिरावट देखने को मिली है.

Lok Sabha Election 2024: देश में बीती 19 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के लिए प्रथम चरण का मतदान हो चुका है. इस बीच मतदान में आई गिरावट से राजनीतिक दलों में खलबली का माहौल है. ऐसे में राजनीतिक पंडित और चुनावी विश्लेषक इस बात के विश्लेषण में जुटे हैं कि कम मतदान से किस दल का फायदा है और किसका नुकसान है? हालांकि सीधे तौर पर नुकसान विपक्षी खेमे का बताया जा रहा है, लेकिन सत्ताधारी दल भी इसको लेकर कुछ कम परेशान नहीं है.

आम धारणा है कि लोकसभा चुनाव में जब भी मतदान ज्यादा होता है तो वह सत्ता के विरुद्ध माना जाता है. जबकि इसके विपरीत कम मतदान को मतदाताओं की उदासीनता समझा जाता है. माना जाता है कि मतदाताओं में सरकार के प्रति उत्साह नहीं है. वो जैसा है, वैसा ही चलते रहना चाहते हैं. भारत में चुनावी इतिहास और उसके नतीजों की बात करें तो देखा गया है कि कम या ज्यादा मतदान के नतीजे मिले-जुले रहते हैं. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 19 अप्रैल को देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 102 सीटों पर केवल 62.37 प्रतिशत ही मतदान हुआ. इस बार सभी सीटों पर मतदाता ने पोलिंग बूथ पर जाने से परहेज किया. पिछले दो लोकसभा चुनावों की बात करें तो यूपी में पहले चरण में 8 सीटों में से 5 पर कम मतदान हुआ. सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिनौर और नगीना के मतदाताओं ने वोटिंग को लेकर कम उत्साह दिखाया. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या कम मतदान से पार्टियों की हार-जीत पर प्रभाव पड़ सकता है. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि यूं तो कम मतदान के कई कारण हो सकते हैं लेकिन शुरुआती समीक्षा में इसके लिए दो कारण जिम्मेदार माने जा रहे हैं. पहला कारण भारतीय जनता पार्टी की टेंशन बढ़ा सकता है, जबकि दूसरा विरोधी खेमे को सोचने पर मजबूर करेगा. पहला कारण यह है कि बीजेपी के 400 पार के नारे ने एनडीए समर्थकों में अतिविश्वास का भाव भर दिया है. वो मान बैठे हैं कि बीजेपी सरकार तो बननी ही है. अगर 400 नहीं तो थोड़ी बहुत कम सीटें आ जाएंगी, लेकिन सरकार तो बन ही जाएगी. ऐसे में वो अपनी सीट के उम्मीदवार की जीत को लेकर भी निश्चिंत हो गए हैं. उनके मन में भाव आया कि जीत के इस माहौल में उनकी एक वोट से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला. इसी सोच ने उनको पोलिंग बूथ तक जाने से रोका. दूसरे कारण का विश्लेषण करें तो सत्ता विरोधी मतदाताओं को भी विपक्ष की जीत पर ज्यादा भरोसा नहीं है. खासकर मुस्लिमों में मतदान के प्रति उदासीनता तो यही बताती है. बीजेपी को हराने के लिए पिछले दो आम चुनावों में बढ़-चढ़कर मतदान के बावजूद भी अपेक्षित नतीजे ने आने से उनके मन में उदासीनता का भाव आ गया है. ऐसे में उनको लगा कि उनके वोट डालने या न डालने से बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला. यही कारण है कि वोटिंग के दिन मुस्लिम मतदाता में भी उत्साह नहीं देखा गया.

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