वक्फ बोर्ड संशोधन बिल पास होने के बाद लालू यादव का MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण मजबूत होता दिख रहा है। उन्होंने ओवैसी की पार्टी को सीधे 'ना' तो नहीं कहा, मगर मैसेज भी साफ-साफ दिला दिया। इससे राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि लालू यादव अब क्या चाल चलने वाले...
पटना: वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के पास होने के बाद और कुछ हुआ हो चाहे नहीं, लेकिन राजद सुप्रीमो लालू यादव के MY समीकरण की कील-कवच तो दुरुस्त होती दिख रही है। इसका अंदाजा लगाना हो तो राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के हालिया निर्णय से समझा जा सकता है। लालू यादव ने ओवैसी पार्टी को सीधे 'ना' तो नहीं कहा, मगर अपने सांसद से 'त्याग' का पाठ जरूर पढ़ा दिया। अब सवाल उठता है कि आखिर लालू यादव कौन-सी चाल चलने वाले हैं?ओवैसी को नहीं मिल रहा भाव!राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने मुस्लिम मत की राजनीति को लेकर अपनी बात खुलकर रख दी। साफ-साफ सेकुलर वोटों का बिखराव रोकने की दलील को 'ना' वाला मैसेज दिला दिया। उन्हें कुछ सीटें देना तो दूर सेकुलर राजनीति का अनोखा पाठ भी पढ़ा डाला। राजद प्रवक्ता मनोज झा ने तो एआईएमआईएम के माथे एक सवाल जड़ दिया कि ओवैसी साहेब भाजपा को हराना चाहते हैं तो वो बिहार चुनाव ना लड़ें। एआईएमआईएम का आधार हैदराबाद में है इसलिए भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का मिशन है तो चुनाव ना लड़ कर भी मदद कर सकते हैं। ऐसा करेंगे तो नफरत की राजनीति को हराया जा सकता है।ओवैसी का हाल सांप-छछूंदर वालीबिहार की राजनीति में एआईएमआईएम विस्तार की राजनीति के तहत वर्ष 2025 को टारगेट कर चुकी थी। पिछले चुनाव में पांच विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करने के बाद हौसला बुलंद भी था। इसलिए, एक खास रणनीति के तहत महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने का मन बनाया और इस आशय का पत्र भी लिखा। लेकिन, राजद सुप्रीमो की तरफ से 'ना' ने ओवैसी की हाल सांप-छछूंदर वाली कर दी। अब ओवैसी अकेले दम या थर्ड फ्रंट की तरह चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी पर भाजपा की 'बी टीम' होने का आरोप और गहरा हो जाएगा। अगर ओवैसी चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो सीमांचल में मुस्लिम वोट के विभाजन का कारण बनेंगे। राजद सीमांचल में जितनी सीट हारेगी वो ठीकरा ओवैसी के माथे फूटेगा। थर्ड फ्रंट या गठबंधन बनाने की संभावना तो है मगर, किस दल के साथ? ये एक सवाल तो है? जनसुराज के गठबंधन होने पर पार्टी का विस्तार संभव है। लेकिन, ये गेम भी प्रशांत किशोर के हाथ में है। ऐसा इसलिए कि जनसुराज गठबंधन नहीं करती बल्कि पार्टी को मर्ज कराती है। आरसीपी सिंह की पार्टी 'आप सबकी पार्टी' का जैसे विलय हुआ था। ऐसे में अगर ओवैसी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ते हैं तो बिहार में बनी बनाई राजनीतिक जमीन से हाथ धोना पड़ेगा। अब ये तो आने वाले दिनों में पता चलेगा कि ओवैसी क्या राजनीतिक स्टैंड लेते हैं।मुस्लिमों को लालू पर विश्वास: अश्कवरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क का मानना है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने ओवैसी की ताकत और कमजोरी को समझ ली है। उन्हें विश्वास है कि अकेले लड़ कर कुछ सीटें जीतते भी हैं तो बाद में उन विधायकों को राजद में शामिल करा लिया जाएगा। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद लालू यादव ने ऐसा ही किया था। दूसरी बात ये है कि वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के बाद मुस्लिम हर हाल में भाजपा के विरुद्ध वोट करेंगे। ऐसे में उनके ऑप्शन महागठबंधन ही होगा। लालू यादव को उम्मीद है कि बिहार के मुस्लिम बंगाल के मुस्लिमों की तरह भाजपा को हराने वाले को वोट करेंगे। बंगाल में मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस और वाम दल को मत न देकर तृणमूल कांग्रेस को दिया था। बिहार में भी मुस्लिम वोट को लेकर यही प्रेडिक्शन भी है।.
पटना: वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के पास होने के बाद और कुछ हुआ हो चाहे नहीं, लेकिन राजद सुप्रीमो लालू यादव के MY समीकरण की कील-कवच तो दुरुस्त होती दिख रही है। इसका अंदाजा लगाना हो तो राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के हालिया निर्णय से समझा जा सकता है। लालू यादव ने ओवैसी पार्टी को सीधे 'ना' तो नहीं कहा, मगर अपने सांसद से 'त्याग' का पाठ जरूर पढ़ा दिया। अब सवाल उठता है कि आखिर लालू यादव कौन-सी चाल चलने वाले हैं?ओवैसी को नहीं मिल रहा भाव!राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने मुस्लिम मत की राजनीति को लेकर अपनी बात खुलकर रख दी। साफ-साफ सेकुलर वोटों का बिखराव रोकने की दलील को 'ना' वाला मैसेज दिला दिया। उन्हें कुछ सीटें देना तो दूर सेकुलर राजनीति का अनोखा पाठ भी पढ़ा डाला। राजद प्रवक्ता मनोज झा ने तो एआईएमआईएम के माथे एक सवाल जड़ दिया कि ओवैसी साहेब भाजपा को हराना चाहते हैं तो वो बिहार चुनाव ना लड़ें। एआईएमआईएम का आधार हैदराबाद में है इसलिए भाजपा को सत्ता से बेदखल करने का मिशन है तो चुनाव ना लड़ कर भी मदद कर सकते हैं। ऐसा करेंगे तो नफरत की राजनीति को हराया जा सकता है।ओवैसी का हाल सांप-छछूंदर वालीबिहार की राजनीति में एआईएमआईएम विस्तार की राजनीति के तहत वर्ष 2025 को टारगेट कर चुकी थी। पिछले चुनाव में पांच विधानसभा सीटों पर जीत हासिल करने के बाद हौसला बुलंद भी था। इसलिए, एक खास रणनीति के तहत महागठबंधन के साथ चुनाव लड़ने का मन बनाया और इस आशय का पत्र भी लिखा। लेकिन, राजद सुप्रीमो की तरफ से 'ना' ने ओवैसी की हाल सांप-छछूंदर वाली कर दी। अब ओवैसी अकेले दम या थर्ड फ्रंट की तरह चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी पर भाजपा की 'बी टीम' होने का आरोप और गहरा हो जाएगा। अगर ओवैसी चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो सीमांचल में मुस्लिम वोट के विभाजन का कारण बनेंगे। राजद सीमांचल में जितनी सीट हारेगी वो ठीकरा ओवैसी के माथे फूटेगा। थर्ड फ्रंट या गठबंधन बनाने की संभावना तो है मगर, किस दल के साथ? ये एक सवाल तो है? जनसुराज के गठबंधन होने पर पार्टी का विस्तार संभव है। लेकिन, ये गेम भी प्रशांत किशोर के हाथ में है। ऐसा इसलिए कि जनसुराज गठबंधन नहीं करती बल्कि पार्टी को मर्ज कराती है। आरसीपी सिंह की पार्टी 'आप सबकी पार्टी' का जैसे विलय हुआ था। ऐसे में अगर ओवैसी विधानसभा चुनाव नहीं लड़ते हैं तो बिहार में बनी बनाई राजनीतिक जमीन से हाथ धोना पड़ेगा। अब ये तो आने वाले दिनों में पता चलेगा कि ओवैसी क्या राजनीतिक स्टैंड लेते हैं।मुस्लिमों को लालू पर विश्वास: अश्कवरिष्ठ पत्रकार ओम प्रकाश अश्क का मानना है कि राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने ओवैसी की ताकत और कमजोरी को समझ ली है। उन्हें विश्वास है कि अकेले लड़ कर कुछ सीटें जीतते भी हैं तो बाद में उन विधायकों को राजद में शामिल करा लिया जाएगा। वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद लालू यादव ने ऐसा ही किया था। दूसरी बात ये है कि वक्फ बोर्ड संशोधन बिल के बाद मुस्लिम हर हाल में भाजपा के विरुद्ध वोट करेंगे। ऐसे में उनके ऑप्शन महागठबंधन ही होगा। लालू यादव को उम्मीद है कि बिहार के मुस्लिम बंगाल के मुस्लिमों की तरह भाजपा को हराने वाले को वोट करेंगे। बंगाल में मुस्लिम वोटरों ने कांग्रेस और वाम दल को मत न देकर तृणमूल कांग्रेस को दिया था। बिहार में भी मुस्लिम वोट को लेकर यही प्रेडिक्शन भी है।
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