लोकसभा चुनाव 2019: SC/ST वोट बैंक के सामने तीसरी बार बैकफुट पर सरकार– News18 हिंदी

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एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव के विरोध के बाद सरकार नया बिल लाई वन अधिकार अधिनियम से जुड़े फैसले पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. BJP4India narendramodi

दे दी है. SC/ST और ओबीसी से जुड़े संगठन बीते कई महीनों से इस नए सिस्टम का विरोध कर रहे थे. SC/ST वोट बैंक से जुड़ा ये लगातार तीसरा ऐसा फैसला है जबआ गई है. एससी/एसटी एट्रोसिटी एक्ट में बदलाव के विरोध के बाद सरकार नया बिल लाई और बीते दिनों वन अधिकार अधिनियम से जुड़े फैसले पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई.

दलित, आदिवासी और ओबीसी संगठनों के अलावा डीयू-जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में 13 पॉइंट रोस्टर को लेकर बीते कई महीनों से भारी विरोध हो रहा था. सरकार पर लगातार आरोप लग रहे थे कि विरोध के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखा. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2018 में फ़ैसला सुनाया था कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षक पदों की भर्ती डिपार्टमेंट को इकाई मानते हुए होगी, न कि यूनिवर्सिटी को इकाई माना जाएगा. यह फ़ैसला आते ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इसके प्रभाव का अनुमान लगाए बिना इसे सभी यूनिवर्सिटीज में लागू करने का फ़रमान जारी कर दिया. यूजीसी के नोटिफिकेशन के बाद जब 13 पॉइंट रोस्टर के मुताबिक यूनिवर्सिटी और संस्थाओं में नौकरी के विज्ञापन आए तो इस सिस्टम का विरोध होने लगा. तब सरकार ने कहा था कि वो इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटिशन के ज़रिए चुनौती देगी. इसके बाद यूजीसी ने 19 जुलाई 2018 को सर्कुलर जारी कर तमाम भर्तियां रोकने का आदेश जारी कर दिया था. सरकार देर से ही सही पर इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची लेकिन वहां भी रोस्टर से होने वाले नुकसान के बारे में जब सवाल किया गया तो सिर्फ तीन यूनिवर्सिटीज के आंकड़े पेश कर पाई. कमज़ोर दलीलों के चलते सुप्रीम कोर्ट ने पुराने 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम लागू करने को लेकर मानव संसाधन मंत्रालय और UGC द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटीशन को 22 जनवरी 2019 को ही खारिज कर दिया था. बाद में सरकार ने पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी जिसे कोर्ट ने 28 फरवरी 2019 को खारिज कर दिया था. हालांकि विरोध बढ़ता देख अब इस मामले में अध्यादेश को मंजूरी मिली है.सुप्रीम कोर्ट ने बीते 13 फ़रवरी को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि अनुसूचित वनवासी जनजातियों व अन्य पारंपरिक वनवासियों के जंगलों में रहने के दावे राज्य सरकारों ने ख़ारिज कर दिए, उन्हें 12 जुलाई तक वनों से निकाल दिया जाए. कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ आदिवासी संगठन सड़कों पर आ गए. बाद में पता चला कि कोर्ट ने जिस दिन ये फैसला सुनाया उस दिन केंद्र सरकार के वकील एफ़आरए का पक्ष रखने के लिए अदालत में पेश ही नहीं हुए थे. इसके अलावा उससे पहले की चार सुनवाइयों में भी सरकारी वकीलों की टीम ने वन कानून के पक्ष में कोई दलील नहीं दी थी.इस बात के सामने आने के बाद विरोध और तेज हो गया और आदिवासी संगठनों ने 'भारत बंद' का एलान कर दिया. इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी सरकार पर आदिवासी हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया था. आदिवासी संगठनों का कहना था कि ज़मीनी स्तर पर एफ़आरए क़ानून को अभी तक सही तरीक़े से लागू ही नहीं किया जा सका है और सरकार को इस तरह की सुनवाई में पक्ष को मजबूती से रखना चाहिए था. आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया कि सरकार 'जानबूझकर' एफ़आरए का बचाव नहीं कर रही थी जिसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फ़ैसला सुनाया जो सीधे-सीधे आदिवासी हितों के खिलाफ है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध 'वनवासी कल्याण आश्रम' ने भी सरकार से इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर करने की अपील जारी की इस आदेश के खिलाफ जब सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे तो उनसे यही सवाल किया गया कि अभी तक सरकार ने मामले से जुड़े इन पहलुओं को सामने क्यों नहीं रखा था, जिनके आधार पर रोक लगाने की मांग की जा रही है. अदालत ने कहा कि ऐसा तब क्यों नहीं किया गया जब कोर्ट आदेश सुना रहा था. वहीं, आदेश पर रोक लगाते हुए उसने कहा कि केंद्र सरकार इतने लंबे समय तक ‘सोती’ क्यों रही. बहरहाल 2 मार्च को कोर्ट ने इस फैसले पर रोक लगा दी और इसकी अगली सुनवाई के लिए 27 जुलाई तारीख दे दी.बीते साल मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई के दौरान एससी-एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज होने पर आरोपितों की तुरंत गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी थी. साथ ही, यह भी कहा था कि इस एक्ट से जुड़े किसी मामले में अगर कोई सरकारी कर्मचारी आरोपित हो तो उसकी गिरफ़्तारी के लिए उसके नियोक्ता प्राधिकारी की और किसी सामान्य नागरिक के आरोपित होने की सूरत में ज़िले के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की लिखित मंज़ूरी अनिवार्य होगी. बाद में आरोप लगे कि इस मामले की सुनवाई के दौरान भी सरकार की तरफ से पक्षकार मौजूद ही नहीं रहे. जब कोर्ट ने सरकार की राय जानने के लिए बुलाया भी तो सरकारी वकील ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट से जुड़े जिन मामलों का ज़िक्र कोर्ट कोर्ट कर रही है उनमें पहले से ज़मानत देने में उसकी तरफ से कोई दिक्कत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का देश भर में दलित-ओबीसी संगठनों ने भारी विरोध किया और 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद बुलाया जिसमें मध्य प्रदेश, यूपी, राजस्थान और बिहार समेत कई राज्यों में हिंसक घटनाएं हुई और 10 लोगों की मौत भी हो गई. विरोध को देखते हुए सरकार ने अदालत में समीक्षा याचिका दायर की लेकिन कोर्ट ने उसे ख़ारिज कर दिया. इसके बाद सरकार ने संसद में कानून लाकर एससी/एसटी एक्ट को फिर से लागू करवाया. हालांकि इस पूरे विवाद का उसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में नुकसान उठाना पड़ा. बता दें कि 2013 के विधानसभा चुनावों में तीनों राज्यों की कुल 78 आरक्षित विधानसभा सीटों में में से 68 सीटें बीजेपी के पास थी लेकिन 2018 में ये आंकड़ा घटकर सिर्फ 31 रह गया है.देश की कुल जनसंख्या में 20.14 करोड़ दलित हैं. देश में कुल 543 लोकसभा सीट हैं. इनमें से 84 सीटें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में इन 84 सीटों में से बीजेपी ने 41 पर जीत दर्ज की थी. दलित आबादी वाला सबसे बड़ा राज्य पंजाब है. यहां की 31.9 फीसदी आबादी दलित है और 34 सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं. यूपी में करीब 20.7 फीसदी दलित आबादी है. राज्य की 17 लोकसभा और 86 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं. बीजेपी ने 17 लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में 76 विधानसभा आरक्षित सीटों पर जीत दर्ज की थी. हिमाचल में 25.2 फीसदी, हरियाणा में 20.2 दलित आबादी है. एमपी में दलित समुदाय की आबादी 6 फीसदी है जबकि यहां आदिवासियों की आबादी करीब 15 फीसदी है. पश्चिम बंगाल में 10.7, बिहार में 8.2, तमिलनाडु में 7.2, आंध्र प्रदेश में 6.7, महाराष्ट्र में 6.6, कर्नाटक में 5.6, राजस्थान में 6.1 फीसदी आबादी दलित समुदाय की है.

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