कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इससे भारत में ग़रीबी ख़त्म की जा सकती है. वहीं कुछ लोग इसके पालन हो पाने को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं.
के साथ बातचीत में वह कहती हैं,"सैद्धांतिक रूप से ये स्कीम बहुत ही बढ़िया है. जब भी हमारे सामने ग़रीबों को सीधे आय पहुंचाने की स्कीमें आती हैं तो ये योजनाएं कर्जमाफ़ी जैसी दूसरी समाज कल्याण योजनाओं के मुक़ाबले बाहरी कारकों से कम प्रभावित होती हैं.
ऐसे में ये सिद्धांत और रूपरेखा के आधार पर ग़रीबों की मदद करने के लिए सबसे आदर्श योजना है" कर्ज़माफ़ी जैसी योजनाएं तमाम पहलुओं से प्रभावित होती है जिनमें उनके क्रियान्वन के लक्ष्यों की पूर्ति और उनके दीर्घकालिक असर शामिल हैं.हालांकि, अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग ऐसा भी है जो कि इस स्कीम पर सवाल खड़े कर रहा है. कई अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि अगर समस्या इतनी ज़्यादा है तो पैसा कहां से आएगा और क्या इस स्कीम के क्रियान्वयन में दूसरी समाज कल्याण योजनाओं के बजट में तो कटौती नहीं की जाएगी.कई अर्थशास्त्री इस तरह की योजनाओं की प्रकृति पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि किसी देश को आगे बढ़ने के लिए ज़्यादा काम करने की ज़रूरत होती है. लेकिन इसकी जगह अगर लोगों को घर बैठे फ्री में आय होने लगे तो वो काम क्यों करेंगे. रेटिंग्स देने वाली संस्था केयर रेटिंग्स के प्रमुख अर्थशास्त्री मदन सबनवीस इसी बात को उठाते हुए कहते हैं,"लोगों को कैश देने की जगह रोजगार दिया जाना चाहिए. लेकिन इससे पहले भी कई सरकारों ने रोजगार सृजित करने के लिए प्रयास किए हैं लेकिन उनसे वो अपेक्षित लक्ष्य हासिल नहीं हुए हैं. अगर आप मनरेगा की ओर देखें तो वह भी एक हद तक ही प्रभावी है. हमने देखा है कि इससे ग़रीबी में ज़्यादा कमी नहीं आई है. ऐसे में जब सरकार नौकरियां नहीं दे सकती है तो यही सही है." वहीं, कुछ अर्थशास्त्री इस स्कीम के अमलीकरण और 12000 रुपये के आंकड़े को लेकर अपनी चिंताएं ज़ाहिर करते हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाली प्रोफेसर जयती घोष अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में छपे अपने लेख में बताती हैं कि समस्या ये नहीं है कि ये स्कीम अच्छी है या बुरी है. समस्या ये है कि जो आंकड़ा चुना गया है वो बहुत ऊपर का है.
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