रायबरेली का नाम आते ही जेहन में गांधी परिवार की तस्वीर उभरती है लेकिन इस बार तस्वीर को रंग की प्रतीक्षा है। सोनिया गांधी के राज्यसभा जाने के बाद एक ही सवाल है कि अब कांग्रेस से कौन? सोनिया के जाने से भाजपा की उस महत्वाकांक्षा को बल मिला है जिसकी पूर्ति उसने अमेठी में राहुल को हराकर की। रायबरेली से पुलक त्रिपाठी की रिपोर्ट...
पुलक त्रिपाठी, रायबरेली। प्रचार, रैली, रणनीति और वोटबैंक साधने की जुगत देश की लगभग हर लोकसभा सीट पर दिख रही है, लेकिन कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली रायबरेली शांत है। सेनाएं शिविर में हैं और प्रतीक्षा है कि कब सेनापति की घोषणा हो और रणदुंदुभि बजे। सोनिया ने पिछले साल ही संकेत दिए थे कि उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी खेल ली और इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि वह अपनी विरासत किसी को सौंपेंगी। इसमें सबसे पहले जो नाम आया वह प्रियंका वाड्रा का था, लेकिन चर्चा यह उड़ी कि उन्होंने चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया है। जिला कांग्रेस कमेटी को घोषणा का इंतजार रायबरेली के कांग्रेसी कार्यकर्ता और पदाधिकारी इस इन्कार की पुष्टि नहीं करते। जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पंकज त्रिपाठी स्पष्ट कहते हैं, ‘हमारी तैयारी पूरी है। अब इंतजार भी खत्म होने को है। 20 अप्रैल तक संयम रखना है बस, रायबरेली वासियों को बहुत अच्छा समाचार सुनने को मिलेगा, क्योंकि रायबरेली से प्रियंका गांधी आ रही हैं।’ भाजपा के जिलाध्यक्ष बुद्धिलाल कहते हैं कि हर स्तर पर हमारी तैयार हो चुकी है। पार्टी शीर्ष नेतृत्व की ओर से प्रत्याशी भी तय है, बस घोषणा बाकी है। पार्टी कभी भी टिकट जारी कर सकती है। अमेठी के बाद अब रायबरेली में परिवर्तन की बारी है। अपने दावे को पुष्ट करने के लिए वह रायबरेली से गांधी परिवार की दूरी और केंद्र सरकार का विकास गिनाते हैं, लेकिन प्रत्याशी के नाम पर केवल गहरी मुस्कान। कहते हैं कि पार्टी जिसको लड़ाएगी, उसको जिताया जाएगा। यहां प्रत्याशी के नाम पर नेता ही नहीं, मतदाता भी चुप हैं। वे खामोशी से पहले आपको पढ़ते हैं फिर दो टूक जवाब देते हैं, जो अच्छा काम करेगा, वह जीतेगा। आसानी से गढ़ नहीं छोड़ेगी कांग्रेस ऊंचाहार के राजनारायण कहते हैं कि अभी तो पार्टियों के बीच नफा-नुकसान तौला जा रहा है। वह एक बात जोर देकर कहते हैं कि कांग्रेस इतनी आसानी से अपने गढ़ को तो नहीं छोड़ेगी, क्योंकि अमेठी 2019 में हाथ से जा चुकी है। दोनों पार्टियां एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर रही हैं, यही कारण है कि पार्टी कार्यालयों में सन्नाटा पसरा है। जिले में पांचवें चरण में मतदान होना है। कार्यालयों में पार्टी के बड़े नेता ही कार्यकर्ताओं के साथ कभी-कभी बैठकी कर रहे हैं। दीवानी कचहरी के पास स्थित कांग्रेस कार्यालय तिलक भवन में भी अधिकतर सन्नाटा ही रहता है। वहीं भाजपा की ओर से सिविल लाइन्स में केंद्रीय चुनाव कार्यालय का उद्घाटन किया गया, लेकिन प्रत्याशी की घोषणा न होने के चहल पहल देखने को नहीं मिल रही। भाजपाई कांग्रेस को उम्मीदवार उतारने में कमजोर बता रहे हैं तो कांग्रेसी भाजपा को। राजनीतिक पार्टियों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन इंटरनेट मीडिया पर हर दिन किसी न किसी उम्मीदवार का नाम प्रत्याशी के रूप में उछाल कर लोग चुनावी माहौल को गर्म कर रहे हैं। भाजपा से मनोज पांडये का नाम चर्चा में सोनिया गांधी के राज्यसभा जाने के बाद यह तय था कि प्रियंका वाड्रा यहां से लड़ेंगी, लेकिन अब तक नाम न घोषित होना चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चाएं खूब हो रही हैं। कभी भाजपा से मनोज पांडेय का नाम चर्चा में आता है तो कभी कांग्रेस से आराधना मिश्रा का, लेकिन सब कुछ चर्चाओं में ही है। एक यह भी चर्चा है कि प्रियंका के उतरने पर भाजपा वरुण को सामने करके गांधी बनाम गांधी का मुकाबला करवा सकती है परंतु भाजपा और कांग्रेस दोनों चुप्पी साधे हैं। कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि अमेठी और रायबरेली के नाम न घोषित करना रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस अगर रणनीति के तहत विलंब कर रही है तो भाजपा भी उनके पत्ते खुलने का इंतजार कर रही है। पिछले चुनाव में सोनिया को कड़ी टक्कर देने वाले दिनेश प्रताप सिंह का नाम भी चर्चा में है, लेकिन अदिति सिंह और मनोज पांडेय का त्रिकोण भी इस चर्चा को रोचक बनाता है। इस बार गठबंधन से बहुजन समाज पार्टी बाहर है। 2019 में सपा और बसपा, कांग्रेस के साथ थीं। अबकी बार हालात पहले जैसे नहीं हैं। इस बार चुनावी मैदान में कांग्रेस के सामने भाजपा व बसपा दोनों मैदान में रहेंगी। कांग्रेस इस चुनाव में सपा की साइकिल पर सवार है, बस यहां पार्टी को साइकिल पर सवारी करने वाले उम्मीदवार की घोषणा करनी है। बीएसपी भी भाजपा व कांग्रेस के उम्मीदवारों पर टकटकी लगाए है, यही कारण है कि उसने भी अब तक चुप्पी साध रखी है। इसे भी पढ़ें: यूपी के 35 से अधिक जिलों में बारिश की चेतावनी, पश्चिमी क्षेत्र में तूफान व ओलावृष्टि का अलर्ट जारी.
पुलक त्रिपाठी, रायबरेली। प्रचार, रैली, रणनीति और वोटबैंक साधने की जुगत देश की लगभग हर लोकसभा सीट पर दिख रही है, लेकिन कांग्रेस का गढ़ मानी जाने वाली रायबरेली शांत है। सेनाएं शिविर में हैं और प्रतीक्षा है कि कब सेनापति की घोषणा हो और रणदुंदुभि बजे। सोनिया ने पिछले साल ही संकेत दिए थे कि उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी खेल ली और इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि वह अपनी विरासत किसी को सौंपेंगी। इसमें सबसे पहले जो नाम आया वह प्रियंका वाड्रा का था, लेकिन चर्चा यह उड़ी कि उन्होंने चुनाव लड़ने से इन्कार कर दिया है। जिला कांग्रेस कमेटी को घोषणा का इंतजार रायबरेली के कांग्रेसी कार्यकर्ता और पदाधिकारी इस इन्कार की पुष्टि नहीं करते। जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पंकज त्रिपाठी स्पष्ट कहते हैं, ‘हमारी तैयारी पूरी है। अब इंतजार भी खत्म होने को है। 20 अप्रैल तक संयम रखना है बस, रायबरेली वासियों को बहुत अच्छा समाचार सुनने को मिलेगा, क्योंकि रायबरेली से प्रियंका गांधी आ रही हैं।’ भाजपा के जिलाध्यक्ष बुद्धिलाल कहते हैं कि हर स्तर पर हमारी तैयार हो चुकी है। पार्टी शीर्ष नेतृत्व की ओर से प्रत्याशी भी तय है, बस घोषणा बाकी है। पार्टी कभी भी टिकट जारी कर सकती है। अमेठी के बाद अब रायबरेली में परिवर्तन की बारी है। अपने दावे को पुष्ट करने के लिए वह रायबरेली से गांधी परिवार की दूरी और केंद्र सरकार का विकास गिनाते हैं, लेकिन प्रत्याशी के नाम पर केवल गहरी मुस्कान। कहते हैं कि पार्टी जिसको लड़ाएगी, उसको जिताया जाएगा। यहां प्रत्याशी के नाम पर नेता ही नहीं, मतदाता भी चुप हैं। वे खामोशी से पहले आपको पढ़ते हैं फिर दो टूक जवाब देते हैं, जो अच्छा काम करेगा, वह जीतेगा। आसानी से गढ़ नहीं छोड़ेगी कांग्रेस ऊंचाहार के राजनारायण कहते हैं कि अभी तो पार्टियों के बीच नफा-नुकसान तौला जा रहा है। वह एक बात जोर देकर कहते हैं कि कांग्रेस इतनी आसानी से अपने गढ़ को तो नहीं छोड़ेगी, क्योंकि अमेठी 2019 में हाथ से जा चुकी है। दोनों पार्टियां एक-दूसरे की प्रतीक्षा कर रही हैं, यही कारण है कि पार्टी कार्यालयों में सन्नाटा पसरा है। जिले में पांचवें चरण में मतदान होना है। कार्यालयों में पार्टी के बड़े नेता ही कार्यकर्ताओं के साथ कभी-कभी बैठकी कर रहे हैं। दीवानी कचहरी के पास स्थित कांग्रेस कार्यालय तिलक भवन में भी अधिकतर सन्नाटा ही रहता है। वहीं भाजपा की ओर से सिविल लाइन्स में केंद्रीय चुनाव कार्यालय का उद्घाटन किया गया, लेकिन प्रत्याशी की घोषणा न होने के चहल पहल देखने को नहीं मिल रही। भाजपाई कांग्रेस को उम्मीदवार उतारने में कमजोर बता रहे हैं तो कांग्रेसी भाजपा को। राजनीतिक पार्टियों ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन इंटरनेट मीडिया पर हर दिन किसी न किसी उम्मीदवार का नाम प्रत्याशी के रूप में उछाल कर लोग चुनावी माहौल को गर्म कर रहे हैं। भाजपा से मनोज पांडये का नाम चर्चा में सोनिया गांधी के राज्यसभा जाने के बाद यह तय था कि प्रियंका वाड्रा यहां से लड़ेंगी, लेकिन अब तक नाम न घोषित होना चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चाएं खूब हो रही हैं। कभी भाजपा से मनोज पांडेय का नाम चर्चा में आता है तो कभी कांग्रेस से आराधना मिश्रा का, लेकिन सब कुछ चर्चाओं में ही है। एक यह भी चर्चा है कि प्रियंका के उतरने पर भाजपा वरुण को सामने करके गांधी बनाम गांधी का मुकाबला करवा सकती है परंतु भाजपा और कांग्रेस दोनों चुप्पी साधे हैं। कांग्रेस के नेता कह रहे हैं कि अमेठी और रायबरेली के नाम न घोषित करना रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस अगर रणनीति के तहत विलंब कर रही है तो भाजपा भी उनके पत्ते खुलने का इंतजार कर रही है। पिछले चुनाव में सोनिया को कड़ी टक्कर देने वाले दिनेश प्रताप सिंह का नाम भी चर्चा में है, लेकिन अदिति सिंह और मनोज पांडेय का त्रिकोण भी इस चर्चा को रोचक बनाता है। इस बार गठबंधन से बहुजन समाज पार्टी बाहर है। 2019 में सपा और बसपा, कांग्रेस के साथ थीं। अबकी बार हालात पहले जैसे नहीं हैं। इस बार चुनावी मैदान में कांग्रेस के सामने भाजपा व बसपा दोनों मैदान में रहेंगी। कांग्रेस इस चुनाव में सपा की साइकिल पर सवार है, बस यहां पार्टी को साइकिल पर सवारी करने वाले उम्मीदवार की घोषणा करनी है। बीएसपी भी भाजपा व कांग्रेस के उम्मीदवारों पर टकटकी लगाए है, यही कारण है कि उसने भी अब तक चुप्पी साध रखी है। इसे भी पढ़ें: यूपी के 35 से अधिक जिलों में बारिश की चेतावनी, पश्चिमी क्षेत्र में तूफान व ओलावृष्टि का अलर्ट जारी
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